जयंती : भारत के लिए ध्वज की सर्वप्रथम कल्पना की थी 'भगिनी निवेदिता' ने
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 12:29 AM
विनय संकोची
एक विदेशी महिला ने स्वामी विवेकानंद के देखरेख में ब्रह्मचर्य अंगीकार किया, उनसे विधिवत दीक्षा ली और भारतीय पंथ को अपनाने वाली पहली पश्चिमी महिला बनी। यह महिला स्वामी विवेकानंद को अक्सर 'राजा' कहकर संबोधित करती और अपने आप को उनकी आध्यात्मिक पुत्री कहती थी। स्वामी विवेकानंद ने अपनी इस शिष्या को नाम दिया 'निवेदिता'। आज उसी निवेदिता की जन्म जयंती है।
निवेदिता का जन्म आयरलैंड में हुआ था और उनका असली नाम था - 'मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल'। शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता भारत की स्वतंत्रता की जबरदस्त समर्थक थीं और अरबिंदो घोष जैसे राष्ट्रवादियों से उनका घनिष्ठ संपर्क था। निवेदिता ने सीधे तौर पर तो कभी किसी राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने व्याख्यानों और लेखों के माध्यम से प्रेरित अवश्य किया। सन 1905 में निवेदिता ने राष्ट्रीय कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में भाग लिया था।
भारत में आज भी जिन विदेशियों को बेहद सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, उनमें भगिनी निवेदिता का नाम सबसे ऊपर है। यह जानना रोचक होगा कि मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल कैसे स्वामी विवेकानंद की शिष्या बनी, कैसे भारत आईं और यहीं की होकर रह गईं। हुआ यूं कि 1895 में इंग्लैंड में नोबेल को एक निजी संगठन द्वारा एक हिंदू योगी का भाषण सुनने के लिए बुलाया गया था। योगी के विचारों से नोबेल बेहद प्रभावित हुईं। इस योगी ने जीवन के संदर्भ में नोबेल के उन तमाम उलझे सवालों को सुलझाया, जिनकी उन्हें लंबे समय से तलाश थी। योगी ने गरीबों जरूरतमंदों की सहायता करने और लोगों की भलाई करने पर जोर दिया। योगी की बात नोबल के मन को छू गई। ये योगी कोई और नहीं स्वामी विवेकानंद थे।
नोबल स्वामी विवेकानंद के विचार और व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित थी, तो दूसरी ओर स्वामी जी को लगा कि नोबेल भारतीय महिलाओं के उत्थान में योगदान कर सकती हैं। नोबेल ने भी उसी समय मन ही मन भारत को अपनी कर्मभूमि बनाने के बारे में निश्चय कर लिया। इसके तीन वर्ष उपरांत जनवरी 1898 में नोबेल भारत आ गईं। स्वामी विवेकानंद ने उन्हें 25 मार्च 1898 को दीक्षा देकर भगवान बुद्ध के करुणा पथ पर चलने की प्रेरणा दी और उन्हें नया नाम दिया - 'निवेदिता', जिसका अर्थ होता है समर्पित।
दीक्षा प्राप्त कर निवेदिता कलकत्ता के बाग बाजार में बस गईं। यहीं उन्होंने लड़कियों के लिए कि स्कूल खोला, जिसका उद्घाटन स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की पत्नी मां शारदा ने किया। देखते ही देखते निवेदिता का घर उस समय के प्रतिष्ठित भारतीयों रवींद्रनाथ टैगोर, जगदीश चंद्र बसु, गोपाल कृष्ण गोखले और अरबिंदो घोष के लिए विचारों का बन गया।
निवेदिता ने रमेश चंद्र दत्त और यदुनाथ सरकार को भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लिखने की प्रेरणा दी। स्वतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले ने निवेदिता से भेंट के उपरांत कहा था - 'उनसे मिलना प्रकृति की कुछ महान शक्ति के संपर्क में आने जैसा था।' महान तमिल राष्ट्रवादी कवि सुब्रमण्य स्वामी ने केवल एक बार निवेदिता से मुलाकात की और उन्हें अपने गुरु के रूप में माना। भारती ने लिखा - 'उन्होंने मुझे भारत माता की पूर्णता को दिखाया और मुझे अपने देश से प्यार करना सिखाया।'
जब ब्रिटिश सरकार ने वंदेमातरम गाए जाने पर प्रतिबंध लगाया, तब भी निवेदिता ने अपने स्कूल में उसका गायन जारी रखा। साल 1905 में भारत के लिए प्रतीक और ध्वज की कल्पना तथा उसका डिजाइन सर्वप्रथम निवेदिता ने ही किया था। निवेदिता द्वारा डिजाइन किए गए ध्वज को 1906 में कलकत्ता में कांग्रेस द्वारा आयोजित एक प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया था।
निवेदिता ने भारतीय कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए 'बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट' की स्थापना की। साल 1899 में कलकत्ता में प्लेग प्रकोप के समय निवेदिता ने मरीजों के इलाज के लिए अपने जीवन की भी परवाह नहीं की। महान विभूति भगिनी निवेदिता को सादर नमन।