
karmanasa : उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में एक कहानी शामिल थी, जिसका नाम कर्मनाशा (karmanasa) की हार है। यह रचना प्रसिद्ध रचनाकार शिव प्रसाद सिंह की है। शिव प्रसाद सिंह ने अपनी रचना कर्मनाशा (karmanasa) की हार में जिस नदी का जिक्र किया है, वह नदी उत्तर प्रदेश में बहती है। कहा जाता है कि सांप काटा बच सकता है, हलाहल जहर का सेवन करने वाले की मौत टल सकती है, लेकिन जिस पौधे को एक बार कर्मनाशा का जल छू जाए, वह कभी हरा नहीं हो सकता है। ऐसा ही मनुष्यों के लिए भी कहा गया है कि कर्मनाशा का पानी छूने वाला व्यक्ति कभी भी पुण्य फल प्राप्त नहीं कर सकता है।
भारत देश में नदियों को मां और देवी का दर्जा दिया गया है। नदियों को बेहद पवित्र माना गया है। उनकी पूजा होती है। पूजा-पाठ, शुभ कार्यों में पवित्र नदियों के जल का खासतौर पर उपयोग होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में एक ऐसी नदी भी है, जिसके पानी को लोग हाथ तक लगाने से बचते हैं।
सरस्वती, नर्मदा, यमुना, क्षिप्रा आदि नदियों का भी बेहद महत्व है। इन नदियों में स्नान के महापर्व कुंभ आयोजित किए जाते हैं। वहीं उत्तर प्रदेश की एक नदी कर्मनाशा के पानी को लोग छूते तक नहीं हैं। कर्मनाशा दो शब्दों से बना है। पहला कर्म और दूसरा नाशा। माना जाता है कि कर्मनाशा नदी का पानी छूने से काम बिगड़ जाते हैं और अच्छे कर्म भी मिट्टी में मिल जाते हैं। इसलिए लोग इस नदी के पानी को छूते ही नहीं हैं। ना ही किसी भी काम में उपयोग में लाते हैं।
कर्मनाशा नदी बिहार और उत्तर प्रदेश में बहती है। इस नदी का अधिकांश हिस्सा यूपी में ही आता है। यूपी में यह सोनभद्र, चंदौली, वाराणसी और गाजीपुर से होकर बहती है और बक्सर के पास गंगा में मिल जाती है। मान्यता है कि जब इस नदी के आसपास पीने के पानी का इंतजाम नहीं था, तब लोग फल खाकर गुजारा कर लेते थे लेकिन इस नदी का पानी उपयोग में नहीं लाते थे। जबकि कर्मनाशा नदी आखिर में जाकर गंगा में ही मिलती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा हरिशचंद्र के पिता सत्यव्रत ने एक बार अपने गुरु वशिष्ठ से सशरीर स्वर्ग में जाने की इच्छा जताई, लेकिन गुरु ने इनकार कर दिया। फिर राजा सत्यव्रत ने गुरु विश्वामित्र से भी यही आग्रह किया। वशिष्ठ से शत्रुता के कारण विश्वामित्र ने अपने तप के बल पर सत्यव्रत को सशरीर स्वर्ग में भेज दिया। इसे देखकर इंद्रदेव क्रोधित हो गये और राजा का सिर नीचे की ओर करके धरती पर भेज दिया।
विश्वामित्र ने अपने तप से राजा को स्वर्ग और धरती के बीच रोक दिया और फिर देवताओं से युद्ध किया। इस दौरान राजा सत्यव्रत आसमान में उल्टे लटके रहे, जिससे उनके मुंह से लार गिरने लगी। यही लार नदी के तौर पर धरती पर आई। वहीं गुरु वशिष्ठ ने राजा सत्यव्रत को उनकी धृष्टता के कारण चांडाल होने का श्राप दे दिया। माना जाता है कि लार से नदी बनने और राजा को मिले श्राप के कारण इसे शापित माना गया।