क्या योगी बनने के लिए गृहस्थ जीवन छोड़ना जरूरी है? लाहिड़ी महाशय का जीवन इस धारणा को नई दृष्टि देता है। परिवार, नौकरी और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच रहते हुए उन्होंने योग और आध्यात्मिक साधना का मार्ग अपनाया।

सच्चिदानंद वर्मा के लेख पर आधारित संपादकीय
Editorial: आध्यात्मिकता को लेकर हमारे समाज में एक धारणा लंबे समय से चली आ रही है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए संसार का त्याग करना आवश्यक है। घर-परिवार छोड़ना होगा, मोह-माया से दूर किसी आश्रम या हिमालय की गुफा में जाना होगा और सांसारिक जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त करना होगा। लेकिन क्या वास्तव में ईश्वर की प्राप्ति का रास्ता केवल संन्यास से होकर जाता है? उन्नीसवीं शताब्दी के महान योगी लाहिड़ी महाश का जीवन इस धारणा के सामने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है। वह संन्यासी नहीं थे। उनके पास परिवार था, पत्नी थीं, संतानें थीं और नौकरी की जिम्मेदारियां थीं। वह वाराणसी में एक सामान्य गृहस्थ की तरह जीवन जीते रहे। लेकिन इसी सामान्य जीवन के भीतर उन्होंने ऐसी असाधारण आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त की, जिसके कारण उन्हें योग परंपरा में ‘योगावतार’ के रूप में सम्मानित किया गया। यही लाहिड़ी महाशय के जीवन का सबसे बड़ा संदेश है- आध्यात्मिकता जीवन से पलायन नहीं है। आध्यात्मिकता जीवन को सही दृष्टि से जीने की कला है।
30 सितंबर 1828 को बंगाल के घुरणी में जन्मे श्यामाचरण लाहिड़ी आगे चलकर लाहिड़ी महाशय के नाम से प्रसिद्ध हुए। 1846 में उनका विवाह काशीमणि देवी से हुआ और उन्होंने गृहस्थ जीवन स्वीकार किया। उनके परिवार में संतानें हुईं और उन्होंने नौकरी भी की। लेकिन उनके जीवन की दिशा निर्णायक रूप से तब बदली, जब 1861 में रानीखेत के हिमालयी क्षेत्र में उनकी भेंट महावतार बाबाजी से हुई। परंपरा के अनुसार, बाबाजी ने उन्हें क्रियायोग की दीक्षा दी और उन्हें आदेश दिया कि वे हिमालय में रहकर संसार से अलग न हों, बल्कि वापस जाकर गृहस्थ जीवन जीते हुए योग का संदेश दें। यह आदेश अपने आप में एक आध्यात्मिक क्रांति था। क्योंकि इसका अर्थ साफ था—योग केवल उन लोगों के लिए नहीं है जिन्होंने संसार छोड़ दिया है। योग उस व्यक्ति के लिए भी है जो परिवार चलाता है, नौकरी करता है, समाज में रहता है और अपनी जिम्मेदारियां निभाता है।
लाहिड़ी महाशय के जीवन को समझने के लिए ‘वैराग्य’ शब्द को समझना जरूरी है। वैराग्य का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने परिवार, नौकरी, समाज और जिम्मेदारियों से भाग जाए। वास्तविक वैराग्य उस मानसिक स्थिति का नाम है जिसमें मनुष्य अपने कर्तव्यों को निभाते हुए भी उनके भीतर अपना सम्पूर्ण अस्तित्व नहीं खो देता। कमल की उपमा इसलिए अत्यंत सार्थक है। कमल पानी में रहता है, लेकिन पानी उसके अस्तित्व पर अधिकार नहीं कर पाता। लाहिड़ी महाशय भी संसार में रहे, लेकिन संसार उनके भीतर नहीं बसा। आज के मनुष्य के लिए इससे बड़ा संदेश क्या हो सकता है? हम अक्सर अपनी आध्यात्मिक कमजोरी के लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। कहते हैं—समय नहीं मिलता, नौकरी बहुत व्यस्त है, परिवार की जिम्मेदारियां बहुत हैं, व्यापार में व्यस्तता है, बच्चों की चिंता है। लाहिड़ी महाशय का जीवन पूछता क्या समस्या वास्तव में समय की है या प्राथमिकताओं की?
लाहिड़ी महाशय के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने आध्यात्मिक साधना को सामान्य मनुष्य के जीवन से जोड़ दिया। उन्होंने यह संदेश दिया कि साधना के लिए जीवन की परिस्थितियों के पूरी तरह बदल जाने की प्रतीक्षा मत कीजिए। जो व्यक्ति परिवार में है, वह परिवार में रहते हुए साधना करे। जो नौकरी करता है, वह नौकरी करते हुए अपने भीतर की यात्रा प्रारंभ करे। जो व्यवसाय करता है, वह व्यवसाय करते हुए अपने कर्म और चेतना को शुद्ध करने का प्रयास करे। यानीआध्यात्मिक जीवन और सांसारिक जीवन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। विरोध तब पैदा होता है जब मनुष्य सांसारिक उपलब्धियों को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेता है।
लाहिड़ी महाशय की आध्यात्मिक विरासत का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष क्रियायोग है। उन्होंने इसे किसी विशेष वर्ग, जाति या सामाजिक हैसियत तक सीमित रखने के बजाय सच्चे साधकों तक पहुंचाने का प्रयास किया। उनके शिष्यों में सामान्य गृहस्थ भी थे और समाज के प्रतिष्ठित लोग भी। यहां उनका दृष्टिकोण आधुनिक समय के लिए भी महत्वपूर्ण दिखाई देता है। आध्यात्मिकता किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान से बड़ी चीज है। राजा हो या सामान्य व्यक्ति, धनवान हो या गरीब—यदि भीतर ईश्वर की खोज है तो साधना का अधिकार सबको है। यही विचार भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की उस मूल भावना से जुड़ता है जिसमें आत्मा की गरिमा जन्म, पद और संपत्ति से ऊपर मानी जाती है।
लाहिड़ी महाशय की आध्यात्मिक परंपरा उनके जीवनकाल के साथ समाप्त नहीं हुई। उनके प्रमुख शिष्यों में स्वामी श्रीयुक्तेश्वर थे, जो आगे चलकर परमहंस योगानन्द के गुरु बने। योगानन्द ने 1946 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘योगी कथामृत’ के माध्यम से लाहिड़ी महाशय सहित भारतीय योग परंपरा को विश्व के बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचाया। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की शक्ति केवल उसके प्राचीन होने में नहीं है। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में है कि वह अलग-अलग युगों में मनुष्य के जीवन से संवाद करने की क्षमता रखती है। लाहिड़ी महाशय का संदेश भी इसी कारण आज प्रासंगिक है
आज मनुष्य के पास सुविधाएं पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन मानसिक शांति कम होती जा रही है। मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया हाथ में है, लेकिन अपने भीतर झांकने का समय नहीं है। करियर है, प्रतिस्पर्धा है, आर्थिक लक्ष्य हैं, सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता है, बच्चों के भविष्य की चिंता है और लगातार बढ़ती अपेक्षाएं हैं।
ऐसे समय में लाहिड़ी महाशय का जीवन किसी चमत्कार की कहानी मात्र नहीं है। यह आधुनिक मनुष्य के सामने रखा गया एक गंभीर प्रश्न है—क्या हम अपनी बाहरी जिंदगी को व्यवस्थित करने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने भीतर की जिंदगी को भूल गए हैं?
यदि उत्तर हां है तो समस्या संसार में नहीं, हमारी चेतना में है।
योगी वह नहीं जो केवल वस्त्र बदल ले। योगी वह भी नहीं जो समाज से दूर चला जाए। योगी वह है जो अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करे। जो अपने कर्तव्य से भागे नहीं। जो परिवार के प्रति जिम्मेदार रहे। जो अपने कर्म को ईमानदारी से करे। जो सफलता में अहंकार और असफलता में निराशा का दास न बने। और सबसे महत्वपूर्ण—जो बाहरी जीवन की हलचल के बीच अपने भीतर शांति का केंद्र खोज सके। इस अर्थ में लाहिड़ी महाशय का जीवन आधुनिक गृहस्थ के लिए एक जीवंत पाठशाला है।
लाहिड़ी महाशय की 198वीं जयंती पर उन्हें स्मरण करना केवल उनकी जन्मतिथि याद कर लेना नहीं होना चाहिए। उनके जीवन का वास्तविक सम्मान तभी होगा जब हम उनके संदेश को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। आज हमें यह पूछना होगा कि क्या हमारी आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों तक सीमित है या वह हमारे व्यवहार में भी दिखाई देती है? क्या हम परिवार में अधिक शांत हैं? क्या हम अपने कर्तव्यों के प्रति अधिक ईमानदार हैं? क्या हम लालच, क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या पर नियंत्रण पाने का प्रयास कर रहे हैं? क्या हम अपने भीतर उस मौन से जुड़ने का प्रयास करते हैं, जहां बाहरी संसार का शोर समाप्त हो जाता है? यदि नहीं, तो हमें लाहिड़ी महाशय की कहानी सुनने से आगे बढ़कर उनके जीवन के संदेश को समझना होगा।
लाहिड़ी महाशय की महानता शायद इसी में है कि उन्होंने किसी सामान्य गृहस्थ को यह कहने का अवसर नहीं दिया कि आध्यात्मिक उन्नति केवल संन्यासियों के लिए है। उन्होंने अपने जीवन से दिखाया किघर में रहकर भी हिमालय जैसी साधना संभव है। उनका जीवन कहता है—कर्तव्य छोड़ो मत, लेकिन कर्तव्य के भीतर स्वयं को खोओ भी मत। परिवार से प्रेम करो, लेकिन आसक्ति को अपना स्वामी मत बनने दो। धन कमाओ, लेकिन धन को अपना भगवान मत बनाओ। संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने भीतर का स्वामी मत बनने दो। और सबसे बढ़कर—बाहर की दुनिया को जीतने से पहले भीतर की दुनिया को जीतने का प्रयास करो।
यही लाहिड़ी महाशय की सबसे बड़ी आध्यात्मिक विरासत है। आज जब मनुष्य बाहरी सफलता की दौड़ में लगातार आगे बढ़ रहा है, तब लाहिड़ी महाशय का जीवन उसे एक क्षण रुककर अपने भीतर देखने का निमंत्रण देता है। शायद यही कारण है कि सदियों बाद भी महान संतों की प्रासंगिकता समाप्त नहीं होती। वे हमें संसार से भागना नहीं सिखाते। वे हमे संसार के बीच स्वयं को पहचानना सिखाते हैं। Editorial:
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