धर्म क्या है? श्रीमद्भगवद्गीता की दृष्टि से समझिए असली अर्थ

लेकिन क्या धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित है? क्या वह किसी पहचान का नाम है? यदि ऐसा होता, तो कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़े अर्जुन की दुविधा का समाधान इतने गहरे और सार्वकालिक रूप में संभव न होता। गीता धर्म को संकीर्ण परिभाषाओं से निकालकर जीवन की धुरी बना देती है।

गीता के अनुसार धर्म
गीता के अनुसार धर्म
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar26 Feb 2026 01:38 PM
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What is Dharma according to the Gita? : धर्म - यह शब्द सुनते ही हमारे मन में पूजा-पाठ, आचार-विचार या किसी विशेष संप्रदाय की छवि उभर आती है। लेकिन क्या धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित है? क्या वह किसी पहचान का नाम है? यदि ऐसा होता, तो कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़े अर्जुन की दुविधा का समाधान इतने गहरे और सार्वकालिक रूप में संभव न होता। गीता धर्म को संकीर्ण परिभाषाओं से निकालकर जीवन की धुरी बना देती है।

भूमिका ही तय करती है उत्तरदायित्व

गीता में धर्म का सबसे सशक्त अर्थ है स्वधर्म, अर्थात अपनी प्रकृति और भूमिका के अनुरूप कर्तव्य। जब अर्जुन मोहवश युद्ध से पीछे हटना चाहते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें याद दिलाते हैं कि उनके सामने खड़ा प्रश्न केवल रिश्तों का नहीं, न्याय और अन्याय का है। यहाँ धर्म किसी कर्मकांड का आग्रह नहीं करता, बल्कि यह पूछता है आपकी भूमिका क्या है और उस भूमिका में आपका उत्तरदायित्व क्या है? स्वधर्म का अर्थ है अपने सत्य से समझौता न करना। यह भी स्पष्ट किया गया है कि परधर्म, चाहे वह कितना ही आकर्षक क्यों न लगे, अंततः व्यक्ति को भ्रमित करता है। अपनी प्रकृति के विपरीत चलना ही अधर्म की शुरुआत है। इसलिए गीता का धर्म बाहरी प्रदर्शन से अधिक आंतरिक ईमानदारी पर बल देता है।

धर्म और निष्काम कर्म

गीता का धर्म कर्म से जुड़ा है, लेकिन वह कर्म के परिणाम से बंधा नहीं है। “कर्मण्येवाधिकारस्ते” यह सूत्र केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है। धर्म वह है जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूर्ण समर्पण से निभाए, किंतु फल की चिंता से मुक्त रहे। आज के प्रतिस्पर्धी युग में सफलता को ही धर्म समझ लिया गया है। लेकिन गीता कहती है सफलता या असफलता धर्म का मापदंड नहीं; निष्ठा और नैतिकता ही उसका आधार हैं। जब कर्म स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक हित से जुड़ता है, तभी वह धर्म बनता है।

धर्म बनाम मोह

अर्जुन की दुविधा केवल युद्ध की नहीं थी वह मोह और करुणा के बीच उलझे थे। गीता इस सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करती है। करुणा धर्म का अंग है, पर मोह धर्म को धुंधला कर देता है। यदि न्याय के स्थान पर संबंधों को प्राथमिकता दी जाए, तो वह धर्म नहीं रह जाता। इस दृष्टि से धर्म का अर्थ कठोरता नहीं, बल्कि संतुलन है। धर्म वह है जो व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर व्यापक सत्य का साथ दे। यह संतुलन ही गीता की विशेषता है।

धर्म और आत्मबोध

गीता का एक गहरा आयाम आत्मा की अमरता से जुड़ा है। जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर या भूमिका तक सीमित समझता है, तब धर्म भी सीमित हो जाता है। किंतु जब वह स्वयं को व्यापक चेतना का अंश मानता है, तब उसका धर्म भी व्यापक हो जाता है। आत्मबोध व्यक्ति को भय से मुक्त करता है और भय से मुक्त होकर ही धर्म का पालन संभव है। धर्म, इस अर्थ में, बाहरी नियमों का पालन मात्र नहीं; यह भीतर की जागरूकता है। जब निर्णय आत्मकेंद्रित न होकर सत्यकेंद्रित होते हैं, तभी धर्म जीवित रहता है।

आधुनिक संदर्भ में धर्म

आज धर्म अक्सर पहचान की राजनीति और बहसों का विषय बन जाता है। गीता हमें याद दिलाती है कि धर्म विभाजन नहीं, समन्वय की शक्ति है। यह हमें सिखाती है कि अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठा यही धर्म है। कार्यालय में कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी, न्यायपूर्ण निर्णय लेने वाला प्रशासक, निष्पक्ष शिक्षक, संवेदनशील नागरिक ये सब गीता की दृष्टि में धर्म के पालनकर्ता हैं। धर्म कोई मंच नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। What is Dharma according to the Gita?


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चाणक्य की सख्त चेतावनी: ये पांच गलतियां आपको बना रही है कंगाल

Chanakya Niti: चाणक्य के अनुसार इंसान की सफलता सिर्फ उसकी प्रतिभा या डिग्री से नहीं बल्कि उसकी रोजमर्रा की आदतों और सोच से तय होती है। कई बार छोटी-छोटी गलत आदतें हमारी तरक्की, पैसों और मानसिक शांति को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

Chanakya Niti in Hindi
आचार्य चाणक्य की नीतियां
locationभारत
userअसमीना
calendar26 Feb 2026 03:21 AM
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हर इंसान अपने जीवन में सफलता चाहता है लेकिन अक्सर हम छोटी-छोटी आदतों और गलतियों की वजह से पीछे रह जाते हैं। प्राचीन भारत के महान विचारक और रणनीतिकार चाणक्य ने सिखाया कि इंसान की कामयाबी सिर्फ प्रतिभा या डिग्री से नहीं बल्कि उसकी रोजमर्रा की आदतों, सोच और फैसलों से तय होती है। चाणक्य की नीतियां हमें बताती हैं कि किन-किन छोटी गलत आदतों से हमारी तरक्की, पैसों और मानसिक शांति पर असर पड़ सकता है। अगर आप भी अपनी जिंदगी में तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं तो इन बातों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।

आलस है सफलता की सबसे बड़ी रुकावट

चाणक्य कहते हैं कि आलस सबसे बड़ा दुश्मन है। जो लोग अपने काम को टालते रहते हैं वे समय के साथ पीछे रह जाते हैं। समय किसी के लिए नहीं रुकता। इसलिए अपनी जिम्मेदारियों को समय पर निभाना और मेहनत करना बेहद जरूरी है।

गलत लोगों की संगति

हम जैसा बनते हैं, हमारी संगति भी वैसी ही होती है। नकारात्मक सोच वाले और गलत आदतों में फंसे लोग हमारी तरक्की में रुकावट बन सकते हैं। जो लोग हमेशा शिकायत करते हैं या आपको हतोत्साहित करते हैं उनसे दूरी बनाना ही बेहतर है। इसके बजाय मेहनती और सकारात्मक लोगों के साथ समय बिताना सफलता की दिशा में पहला कदम है।

सीखने से किनारा करना

चाणक्य नीति में ज्ञान को सबसे बड़ा धन माना गया है। जो व्यक्ति नई चीजें सीखने में रुचि नहीं रखता उसका आगे बढ़ना रुक जाता है। आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। किताबें पढ़ना, नई स्किल सीखना और खुद को अपडेट रखना आपको दूसरों से आगे रखता है।

पैसों को बेफिजूल उड़ाना

पैसा मुश्किल समय में सबसे बड़ा सहारा बनता है। जो लोग बिना सोचे-समझे खर्च करते हैं बचत नहीं करते या भविष्य की योजना नहीं बनाते वे संकट के समय अकेले पड़ जाते हैं। चाणक्य के अनुसार समझदारी यही है कि अपनी आमदनी से कम खर्च करें और हमेशा बचत पर ध्यान दें।

गुस्सा और अधैर्य

गुस्सा इंसान की सोचने-समझने की शक्ति को खत्म कर देता है। जल्दबाजी या गुस्से में लिया गया फैसला अक्सर बाद में पछतावे का कारण बनता है। धैर्य ही वह ताकत है जो मुश्किल हालात में सही रास्ता दिखाती है। शांत दिमाग से सोचकर बनाए गए फैसले ही असली जीत दिलाते हैं।

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चाणक्य की इन बातों को घोलकर पी लें, आपके कदमों में झुकेगा जमाना

Chanakya Niti: यह लेख चाणक्य की नीतियों पर आधारित है जिसमें बताया गया है कि जीवन में सच्चा सम्मान कैसे कमाया जा सकता है। पैसा और पद पाना आसान हो सकता है लेकिन समाज में इज्जत पाने के लिए मजबूत चरित्र, सही व्यवहार और स्पष्ट सोच की जरूरत होती है।

Chanakya Niti
जीवन में सम्मान कैसे पाएं?
locationभारत
userअसमीना
calendar26 Feb 2026 02:57 AM
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आज के समय में हर कोई पैसा, पद और शोहरत पाना चाहता है लेकिन एक चीज है जो इन सब से ऊपर है और वो है आपका सम्मान। पैसा मेहनत से मिल सकता है, सफलता भी हासिल की जा सकती है लेकिन सच्ची इज्जत कमानी पड़ती है। यह किसी दुकान में नहीं मिलती और न ही किसी की सिफारिश से मिलती है। आचार्य चाणक्य का मानना था कि इंसान की असली पहचान उसके चरित्र और व्यवहार से होती है। अगर व्यक्ति के पास सब कुछ हो लेकिन लोग उसे दिल से सम्मान न दें तो उसकी सफलता अधूरी है। इज्जत बाहर से नहीं आती यह हमारे सोचने के तरीके, बोलचाल और कर्मों से बनती है। आइए जानते हैं ऐसी 5 आदतें जिन्हें सुधारकर कोई भी व्यक्ति समाज में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है।

खुद की इज्जत करना सीखें

अगर आप खुद को ही कम समझते रहेंगे तो दुनिया भी आपको उसी नजर से देखेगी। जो व्यक्ति हर समय खुद पर शक करता है या अपनी कीमत नहीं समझता उसे लोग गंभीरता से नहीं लेते। अपने समय की कद्र कीजिए, अपनी मेहनत को महत्व दीजिए और अपने फैसलों पर भरोसा रखिए। जब आप खुद को सम्मान देंगे तभी लोग भी आपको महत्व देंगे।

अपनी बात से न फिरें

इंसान की असली पहचान उसके शब्दों से होती है। जो लोग बार-बार वादा करके मुकर जाते हैं उनकी साख धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। जहां भरोसा नहीं होता वहां सम्मान भी नहीं टिकता। इसलिए उतना ही वादा करें जितना निभा सकें। कम बोलिए लेकिन जो बोलिए उसे पूरा कीजिए। आपकी विश्वसनीयता ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।

जरूरत से ज्यादा अच्छा बनना छोड़ दें

हर बात पर हां कहना और सिर्फ लोगों को खुश करने के लिए अपनी राय दबा देना समझदारी नहीं है। इससे लोग आपको हल्के में लेने लगते हैं। विनम्र रहना अच्छी बात है लेकिन आत्मसम्मान उससे भी ज्यादा जरूरी है। अपनी बात साफ और शांति से रखें। जो व्यक्ति अपनी सीमाएं तय करना जानता है वही लंबे समय तक सम्मान पाता है।

सही और गलत के बीच का फर्क समझें

गलत रास्ते से मिली सफलता ज्यादा दिन नहीं टिकती। झूठ और चालाकी से कुछ समय के लिए फायदा हो सकता है, लेकिन सच्चाई देर-सवेर सामने आ ही जाती है। ईमानदारी और साफ नीयत ही इंसान को असली सम्मान दिलाती है। जो व्यक्ति सही रास्ता चुनता है भले ही देर से आगे बढ़े लेकिन उसका सम्मान हमेशा बना रहता है।

गुस्से पर काबू रखना सबसे जरूरी

एक पल का गुस्सा सालों की कमाई इज्जत को खत्म कर सकता है। गुस्से में कही गई बातें अक्सर रिश्तों को कमजोर कर देती हैं। धैर्य और संयम ही व्यक्ति की असली ताकत है। जो इंसान मुश्किल समय में भी खुद को संभाल लेता है वही सच में सम्मान के लायक होता है। शांत स्वभाव और संतुलित व्यवहार लोगों के दिल में जगह बनाते हैं।