यह परम सत्य है कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला सदैव मानव जाति का मार्ग दर्शन करती रहेगी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की पूरी गाथा को सिलसिलेवार ढंग से प्रकाशित कर रहे हैं।

Lord Sri Krishna : भगवान श्रीकृष्ण का जीवन दुनिया भर के लिए अनुकरणीय जीवन रहा है। यह परम सत्य है कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला सदैव मानव जाति का मार्ग दर्शन करती रहेगी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की पूरी गाथा को सिलसिलेवार ढंग से प्रकाशित कर रहे हैं। इसी अभियान के तहत प्रस्तुत है भगवान श्री कृष्ण के जीवन की गाथा का भाग -1 Lord Sri Krishna
सनातन धर्म के सभी प्रमुख ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण के अवतार को केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक घटना नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का दिव्य संकल्प माना गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार जब पृथ्वी पर अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया, अत्याचारी राजाओं का आतंक बढ़ गया और निर्दोष प्रजा का जीवन संकट में पड़ गया, तब स्वयं पृथ्वी माता ने देवताओं से सहायता की गुहार लगाई। यही वह घटना थी जिसने आगे चलकर भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण अवतार की भूमिका तैयार की। Lord Sri Krishna
समय के साथ अनेक दैत्य और असुर, जो पूर्व जन्मों में देवताओं से पराजित हुए थे, राजाओं के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेने लगे। उन्होंने धर्म, न्याय और मानवता को त्यागकर अत्याचार, हिंसा और अहंकार का मार्ग अपनाया। उनके शासन में यज्ञ-वेदियों का अपमान होने लगा, ऋषि-मुनियों के आश्रम उजाड़े जाने लगे और साधु-संतों पर अत्याचार बढ़ गया। मथुरा का राजा कंस, मगध का राजा जरासंध, चेदि का राजा शिशुपाल और ऐसे अनेक अत्याचारी शासकों ने अपनी शक्ति के बल पर प्रजा को भयभीत कर रखा था। धर्म की रक्षा करने वाले लोगों को दंड दिया जाता था, जबकि अधर्म का साथ देने वालों को सम्मान मिलता था। चारों ओर अन्याय, हिंसा और भय का वातावरण फैल गया। पृथ्वी माता इन अत्याचारों से इतनी व्यथित हुईं कि उनके लिए इस अधर्म का भार सहन करना कठिन हो गया। पुराणों में इसे "पृथ्वी का भार बढ़ना" कहा गया है। इसका अर्थ केवल जनसंख्या का बढ़ना नहीं, बल्कि पाप, अन्याय और अधर्म का असहनीय रूप से बढ़ जाना है। Lord Sri Krishna
गौ का रूप धारण कर ब्रह्मा के पास पहुंचीं पृथ्वी माता
जब अत्याचार असहनीय हो गए, तब पृथ्वी माता ने गौ का रूप धारण किया। भारतीय संस्कृति में गाय को करुणा, धैर्य, पोषण और सहनशीलता का प्रतीक माना गया है। इसलिए पृथ्वी ने इसी स्वरूप में अपनी पीड़ा व्यक्त की। आंसुओं से भरी आंखों के साथ पृथ्वी माता ब्रह्मलोक पहुंचीं और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से विनती की कि अब धर्म की रक्षा के लिए कोई उपाय किया जाए। उन्होंने कहा कि अधर्म का बोझ इतना बढ़ चुका है कि उनके लिए इसे सहन करना संभव नहीं रहा। ब्रह्माजी ने पृथ्वी माता की व्यथा सुनी और तुरंत इस गंभीर विषय पर सभी देवताओं की सभा बुलाई। सभा में भगवान शिव, इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु, यम, सूर्य, चंद्र सहित अनेक देवता उपस्थित हुए। सभी ने स्वीकार किया कि पृथ्वी पर अधर्म अपने चरम पर पहुंच चुका है। Lord Sri Krishna
देवताओं ने ब्रह्माजी के नेतृत्व में क्षीरसागर की ओर प्रस्थान किया, जहां भगवान विष्णु योगनिद्रा में विराजमान थे। वहां पहुंचकर सभी देवताओं ने पुरुषसूक्त और वैदिक स्तुतियों के माध्यम से भगवान विष्णु की आराधना की। उन्होंने प्रार्थना की कि पृथ्वी पर धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए अब केवल आप ही उपाय कर सकते हैं। देवताओं की सामूहिक प्रार्थना और पृथ्वी माता की करुण पुकार से संपूर्ण ब्रह्मांड मानो भगवान की प्रतीक्षा करने लगा। Lord Sri Krishna
देवताओं की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी को दिव्य संदेश दिया। उन्होंने कहा कि समय आ गया है जब वे स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेकर धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे।
भगवान ने देवताओं को भी आदेश दिया कि वे यदुवंश में अपने-अपने अंशों के साथ जन्म लें, ताकि दिव्य कार्य में सहयोग कर सकें। योगमाया को भी पृथ्वी पर अवतरित होने का निर्देश दिया गया। भगवान ने स्पष्ट किया कि वे मथुरा में वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में जन्म लेकर अत्याचारी कंस का अंत करेंगे तथा पृथ्वी को अधर्म के भार से मुक्त करेंगे।
यही वह दिव्य घोषणा थी जिसने श्रीकृष्ण अवतार की नींव रखी। Lord Sri Krishna
भगवान श्रीकृष्ण का अवतार केवल कंस वध तक सीमित नहीं था। उनका उद्देश्य था—
इसी सत्य को भगवान ने बाद में कुरुक्षेत्र में अर्जुन से कहा
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥"
अर्थात जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं अवतार लेता हूँ। Lord Sri Krishna
यह कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं है, बल्कि जीवन का गहरा संदेश भी देती है। जब समाज में अन्याय बढ़ता है, तब सत्य और धर्म की रक्षा के लिए दिव्य शक्ति किसी न किसी रूप में अवश्य प्रकट होती है। यह भी सिखाती है कि अहंकार, अत्याचार और अधर्म कभी स्थायी नहीं होते। अंततः सत्य, न्याय और धर्म की ही विजय होती है। Lord Sri Krishna
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