दुर्गाष्टमी पर जानिए मां की ममता, नारी शक्ति और अदम्य साहस की महागाथा। बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान का संकल्प ही मां दुर्गा की सच्ची आराधना है।

आज दुर्गा अष्टमी है। चारों ओर गूंजते शंखनाद, मंत्रों की पवित्र ध्वनि और मां दुर्गा के जयकारों के बीच आज हम उस दिव्य शक्ति की आराधना कर रहे हैं, जो सृष्टि की जननी भी है और हर संकट में संबल बनने वाली ममता की प्रतिमूर्ति भी। लेकिन इस आराधना का वास्तविक अर्थ केवल मां के चरणों में शीश झुकाना नहीं, बल्कि हर नारी का सम्मान और हर बेटी की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। आखिर पूजा के दीप तभी सार्थक होंगे, जब बेटियां भयमुक्त वातावरण में जन्म लें, शिक्षित हों और अपने सपनों को साकार कर सकें। वह मां है, वह बेटी है, वह शक्ति है, जिसमें सृजन का सामर्थ्य और संघर्ष का साहस है। इस दुर्गाष्टमी पर संकल्प लें कि हर बेटी को सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान देंगे, क्योंकि मां दुर्गा की सच्ची आराधना तभी पूर्ण होगी, जब हर बेटी निर्भय होकर अपने भविष्य की राह चुन सकेगी।
देवी दुर्गा का स्वरूप हमें सिखाता है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि करुणा, न्याय और संरक्षण का संतुलन भी है। वही मां जब सौम्य होती है, तो मां महागौरी बनकर अपनी संतान पर असीम करुणा, शांति और वात्सल्य की वर्षा करती है। वह अपनी संतान की गलतियों को क्षमा कर उसे सही राह दिखाने वाली ममता की प्रतिमूर्ति है। लेकिन जब समाज में अधर्म, अत्याचार और असुरत्व की सीमाएं लांघी जाती हैं, तो वही मां महिषासुरमर्दिनी और कालरात्रि के रौद्र रूप में अवतरित होती है। मां का क्रोध विनाश के लिए नहीं, बल्कि न्याय की पुनर्स्थापना और अपनी संतान के स्वाभिमान की रक्षा के लिए होता है। उसका यही स्वरूप हमें सिखाता है कि प्रेम का अर्थ अन्याय के सामने मौन रहना नहीं है। मां की शक्ति वह संकल्प है, जो टूटते हौसलों को सहारा देती है, निर्बलों में साहस जगाती है और असंभव को भी संभव बनाने की राह दिखाती है।
इस पावन अष्टमी पर जब हम पंडालों में स्थापित मां के दिव्य रूप के सामने शीश नवाते हैं, तो हमें यह भी महसूस करना चाहिए कि जगत जननी के वात्सल्य और सामर्थ्य की झलक हमारे अपने घरों में भी मौजूद है, जिसे हम अपनी मां कहते हैं। ब्रह्मांड की मां यदि समष्टि की संचालक है, तो घर की मां हमारे निजी संसार की आधारशिला है। वह अपनी खुशियों को पीछे रखकर परिवार की मुस्कान संजोती है और विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आंचल में सबको समेटे रखती है। संतान के चेहरे पर चिंता की एक लकीर देखकर उसका मन व्याकुल हो उठता है। वह खुद भूखी रहकर भी अपने बच्चों का पेट भरती है और अपने दुख छिपाकर उनके सपनों को पूरा करने में जुटी रहती है। उसकी ममता में त्याग है, उसके मौन में संघर्ष है और उसके संकल्प में अद्भुत शक्ति है। मां का यही निस्वार्थ प्रेम हमें याद दिलाता है कि देवी की आराधना के साथ-साथ अपने जीवन में उस मां के त्याग, सम्मान और भावनाओं को समझना भी उतना ही जरूरी है, जो हर दिन बिना किसी अपेक्षा के हमारे लिए सब कुछ करती है।
आज के इस दौर में मां दुर्गा का 'कुछ भी कर गुजरने का सामर्थ्य' केवल पौराणिक आख्यानों या घरों की चौखट तक सीमित नहीं है। यह शक्ति आज समाज में महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए चल रहे प्रयासों में भी दिखाई देती है। 'मिशन शक्ति' जैसे अभियानों के माध्यम से महिलाओं को जागरूक करने, उन्हें सुरक्षा संबंधी सहायता उपलब्ध कराने और अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाने का प्रयास इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। जब कोई महिला अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती है, जब कोई बेटी अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है और जब कोई ग्रामीण महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के जरिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनकर सफल उद्यमी के रूप में उभरती है, तब नारी शक्ति का वास्तविक स्वरूप सामने आता है। यह केवल एक महिला की सफलता नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज के बदलने की शुरुआत है। आर्थिक स्वतंत्रता महिला को निर्णय लेने का आत्मविश्वास देती है और जागरूकता उसे अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस देती है। यही वह शक्ति है, जो महिलाओं को निर्भरता से आत्मनिर्भरता और संकोच से नेतृत्व की ओर ले जाती है। जब नारी को अवसर, सुरक्षा और सम्मान मिलता है, तो वह न केवल अपना जीवन बदलती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी नई संभावनाओं के द्वार खोलती है।
लेकिन इस वैचारिक विमर्श के केंद्र में एक ऐसा सच है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जो मां आज परिवार की सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ी है, जो बेटी कल समाज का नेतृत्व कर सकती है, वह कभी किसी आंगन की नन्हीं बच्ची ही थी। आज अष्टमी के दिन कन्या पूजन करते समय हमें स्वयं से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या हम सचमुच बेटियों को वह सुरक्षा, सम्मान और समान अवसर दे पा रहे हैं, जिसकी वे हकदार हैं? क्या हमारा व्यवहार भी उतना ही पवित्र है, जितनी श्रद्धा से हम कन्याओं के चरण पूजते हैं?
यहीं पर 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का राष्ट्रीय अभियान केवल एक सरकारी पहल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी बन जाता है। यदि हम बेटियों को जन्म लेने का अधिकार और सुरक्षित जीवन नहीं देंगे, तो एक बेहतर समाज के निर्माण का सपना कैसे पूरा होगा? और यदि उन्हें शिक्षा से वंचित रखेंगे, तो वे अपने भीतर छिपी प्रतिभा, नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास को कैसे पहचान पाएंगी? शिक्षा वह प्रकाश है, जो बेटी को अपने अधिकार समझने, अपने फैसले लेने और आत्मनिर्भर बनने की शक्ति देता है। जब बेटियां शिक्षित होकर प्रशासनिक सेवाओं, विज्ञान, खेल, उद्योग और रक्षा जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ती हैं, तो वे न केवल अपने परिवार का गौरव बढ़ाती हैं, बल्कि समाज की सोच भी बदलती हैं। हर बेटी को यह विश्वास मिलना चाहिए कि उसका जन्म किसी पर बोझ नहीं, बल्कि एक नई संभावना का आगमन है। उसे अपनी पहचान बनाने के लिए किसी की अनुमति या सहारे की मोहताज न होना पड़े। बेटियों को बचाना, पढ़ाना और सुरक्षित माहौल देना ही वह संकल्प है, जो आने वाले भारत को अधिक संवेदनशील, समान और सशक्त बनाएगा।
दुर्गाष्टमी के इस पवित्र अवसर पर आइए, हम ब्रह्मांड की आदि-शक्ति, अपने घर की मां और समाज में अपने अधकारों तथा सम्मान के लिए संघर्षरत हर नारी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। मां दुर्गा की सच्ची पूजा केवल फूल, दीप और प्रसाद तक सीमित नहीं हो सकती। वह तब पूर्ण होगी, जब हर महिला को सम्मान मिले, हर बेटी स्वयं को सुरक्षित महसूस करे और किसी भी लड़की के सपनों पर भय, भेदभाव या सामाजिक बंधनों का पहरा न हो। हमारी जिम्मेदारी केवल बेटियों के अस्तित्व की रक्षा करना नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षा, स्वतंत्रता और आगे बढ़ने के समान अवसर देना भी है। हमें ऐसा समाज बनाने का संकल्प लेना होगा, जहां बेटी को जन्म लेने से पहले अपने अस्तित्व की लड़ाई न लड़नी पड़े, जहां उसे घर से बाहर निकलते समय डर का सामना न करना पड़े और जहां उसकी प्रतिभा को उसके लिंग से नहीं, उसकी योग्यता से पहचाना जाए। याद रखिए, जब एक बेटी सुरक्षित होती है, तो एक परिवार निश्चिंत होता है; जब वह शिक्षित होती है, तो एक पीढ़ी जागरूक होती है; और जब वह आत्मनिर्भर बनती है, तो पूरा समाज मजबूत होता है।
क्योंकि वह मां है, वह बेटी है, वह शक्ति है। उसके भीतर ममता की कोमलता भी है और अन्याय के विरुद्ध लड़ने का अदम्य साहस भी। उसे अवसर दीजिए, सुरक्षा दीजिए और अपने सपनों को पूरा करने का विश्वास दीजिए। फिर देखिए, वही नारी अपने संकल्प से परिवार, समाज और राष्ट्र की तस्वीर बदलने का सामर्थ्य रखती है। यही दुर्गाष्टमी का वास्तविक संदेश है और यही मां दुर्गा के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
आप सभी को दुर्गाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं! जय माता दी!
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