महापर्व : धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता वाली है दीपावली!
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 04:56 PM
विनय संकोची
दीपावली! आध्यात्मिक अंधकार पर आंतरिक प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई का पर्व है, उत्सव है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों प्रकार से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत अथवा क्षेत्र में दीपावली मनाने के कारण व तरीके अलग हैं लेकिन सभी जगह पीढ़ियों से यह महापर्व मनाया जा रहा है।
'रामायण' में बताया गया है कि लोग दीपावली को चौदह साल के वनवास के पश्चात भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की अयोध्या वापसी के सम्मान में मनाते हैं। 'महाभारत' के अनुसार दीपावली बारह वर्षों के वनवास व एक वर्ष के अज्ञातवास के उपरांत पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप में मनाते हैं। कुछ लोग इस पर्व को भगवान विष्णु की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ मानते हैं। दीवाली पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है।
मान्यता है कि दीपावली की रात को ही लक्ष्मी ने श्री हरि विष्णु को अपने पति के रूप में चुना था और फिर उनसे विधिवत विवाह किया था। कुछ लोग दीपावली को विष्णु की वैकुंठ वापसी के रूप में मनाते हैं। कृष्णभक्ति धारा के भक्तों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी दुराचारी राजा नरकासुर का वध किया था। नृशंस राक्षस नरकासुर के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्न लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा यह भी है कि श्री हरि विष्णु ने नृसिंह का रूप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध भी इसी दिन किया था। भारत के कुछ पश्चिम और उत्तरी भागों में भी दीपावली का पर्व एक नए हिंदू वर्ष की शुरुआत के रूप का प्रतीक है।
पदम पुराण और स्कंद पुराण में दीपावली का उल्लेख मिलता है। दीपक को स्कंद पुराण में सूर्य के अंश का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया गया है। कुछ क्षेत्रों में हिंदू दीवाली को यम और नचिकेता की कथा जो ज्ञान बनाम अज्ञान, उचित बनाम अनुचित, सच्चा धन बनाम क्षणिक धन आदि के बारे में बताती है, से जोड़कर मनाते हैं।
फारसी यात्री और इतिहासकार अलबरूनी ने भारत पर अपने ग्यारहवीं सदी के संस्मरण में दीवाली को कार्तिक माह में नए चंद्रमा के दिन हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले त्योहार बताया है।
जैन मतावलंबियों के अनुसार चौवीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी को दीपावली के दिन ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। जैन समाज दीपावली महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाता है। अन्य संप्रदायों से जैन दीपावली पूजन विधि पूरी तरह अलग है।
सिखों के लिए भी दीपावली बहुत महत्व रखती है, क्योंकि यही वह दिन था जब अमृतसर में 1577 में पवित्र स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था। इसके अतिरिक्त 1619 में दीवाली के दिन ही सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था।
पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ जी का जन्म और महाप्रयाण दोनों ही दीपावली के दिन हुआ। स्वामी जी ने दीपावली के दिन गंगा तट पर स्नान करते ओम का उच्चारण करते हुए समाधि ली।
आर्य समाज के संस्थापक भारतीय संस्कृति के महान जननायक स्वामी दयानंद सरस्वती ने दीपावली के दिन ही अजमेर के निकट प्राण त्यागे थे।
मुगल सम्राट अकबर के शासन में दौलतखाने के सामने चालीस गज ऊंचे बांस का पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। जहांगीर भी धूमधाम से दीवाली मनाते थे। अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। शाह आलम के समय पूरे शाही महल को दीपकों से सजाया जाता था और लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिंदू-मुसलमान दोनों ही उत्साह से हिस्सा लेते थे।