भारतीय समाज में मनुस्मृति का नाम आते ही एक ऐसा विमर्श सामने आ जाता है, जिसमें मनु को नारी विरोधी बताने वाले अनेक आरोप सुनाई देते हैं। यह आरोप इतने बार दोहराए गए हैं कि बहुत से लोगों के लिए यही धारणा एक स्थापित सत्य बन गई है।

Manusmriti : भारतीय समाज में मनुस्मृति का नाम आते ही एक ऐसा विमर्श सामने आ जाता है, जिसमें मनु को नारी विरोधी बताने वाले अनेक आरोप सुनाई देते हैं। यह आरोप इतने बार दोहराए गए हैं कि बहुत से लोगों के लिए यही धारणा एक स्थापित सत्य बन गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मनुस्मृति को वास्तव में पढ़कर यह निष्कर्ष निकाला गया है, या फिर उसके कुछ चुनिंदा श्लोकों और उनकी एक विशेष व्याख्या के आधार पर मनु की पूरी विचारधारा का मूल्यांकन कर दिया गया है? किसी भी प्राचीन ग्रंथ के बारे में राय बनाने से पहले उसके मूल पाठ, संदर्भ, भाषा, कालखंड और समग्र विचारधारा को समझना आवश्यक है। मनुस्मृति के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। मनुस्मृति में नारी के संबंध में ऐसे अनेक कथन मिलते हैं, जिनमें स्त्री को परिवार की गरिमा, समृद्धि, प्रतिष्ठा और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। इसलिए यह कहना कि मनुस्मृति में नारी सम्मान की कोई अवधारणा नहीं है, ग्रंथ के एक बड़े हिस्से की अनदेखी करना होगा। Manusmriti
मनुस्मृति का तीसरा अध्याय नारी के सम्मान को लेकर एक अत्यंत प्रसिद्ध उद्घोष करता है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”
अर्थात जिस परिवार में नारियों का सम्मान होता है, वहां शुभता और श्रेष्ठ गुणों का वास होता है और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां किए गए कर्म भी निष्फल हो जाते हैं। इस श्लोक को केवल धार्मिक वाक्य मानकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं होगा। इसके भीतर परिवार और समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी दिखाई देता है नारी का सम्मान केवल व्यक्तिगत सदाचार नहीं, बल्कि परिवार के कल्याण से जुड़ा हुआ विषय है। मनु आगे स्त्री की प्रसन्नता को परिवार की प्रसन्नता से जोड़ते हैं। स्त्री के दुखी और अपमानित रहने को परिवार तथा कुल के पतन का कारण बताया गया है। अर्थात परिवार की समृद्धि को नारी के सम्मान से अलग करके नहीं देखा गया। Manusmriti
मनुस्मृति में एक स्थान पर कहा गया है “प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हाः गृहदीप्तयः। स्त्रियः श्रीयश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन॥” इसमें स्त्रियों को ‘पूजार्ह’, ‘गृहदीप्ति’ और परिवार की श्री से जोड़ा गया है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि नारी को केवल परिवार की जैविक भूमिका तक सीमित नहीं किया गया, बल्कि उसे घर की शोभा और समृद्धि के केंद्र के रूप में देखा गया। आज जब हम महिला सम्मान, महिला गरिमा और परिवार में महिलाओं की भूमिका की बात करते हैं, तो यह देखना रोचक है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में भी स्त्री के सम्मान को परिवार के सुख और समृद्धि से जोड़ा गया था। Manusmriti
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। नारी सम्मान का अर्थ केवल उसे देवी कह देना नहीं है। वास्तविक सम्मान तब होगा, जब उसे सुरक्षा मिले, उसके अधिकार सुरक्षित हों, उसके धन की रक्षा हो, उसके साथ अन्याय करने वाले को दंड मिले और परिवार में उसके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार हो। मनुस्मृति के समर्थक इसी आधार पर इसके अन्य प्रावधानों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। ग्रंथ में स्त्रीधन की सुरक्षा के संबंध में प्रावधान मिलते हैं। स्त्री के धन पर अनुचित कब्जे को अपराध माना गया है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के लिए कठोर दंड का उल्लेख भी मिलता है। अर्थात मनु की व्यवस्था को केवल ‘नारी की पूजा’ तक सीमित करके देखना अधूरा होगा। उसमें सम्मान के साथ-साथ संरक्षण और अधिकार का विचार भी मौजूद है। Manusmriti
मनुस्मृति का एक चर्चित कथन है “पुत्रेण दुहिता समा।” अर्थात पुत्री पुत्र के समान है। इस कथन की व्याख्या मनु के समर्थक स्त्री के उत्तराधिकार और पारिवारिक अधिकारों की दृष्टि से करते हैं। इसी संदर्भ में मनुस्मृति के संबंधित अध्यायों में दायभाग और स्त्रीधन की चर्चा भी आती है। यहां यह सावधानी आवश्यक है कि प्राचीन ग्रंथों में संपत्ति और उत्तराधिकार की व्यवस्थाएं आधुनिक भारतीय कानून जैसी नहीं थीं। इसलिए आधुनिक ‘समान संपत्ति अधिकार’ की अवधारणा को हूबहू मनुस्मृति पर आरोपित करना भी उचित नहीं होगा। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मनुस्मृति में पुत्री के अधिकार और स्त्रीधन को लेकर स्पष्ट चर्चा मौजूद है। Manusmriti
नारी सम्मान का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक सुरक्षा है। जिस महिला के पास अपना धन नहीं है और जिसकी संपत्ति पर परिवार के दूसरे सदस्य मनमाने ढंग से अधिकार कर सकते हैं, उसकी सामाजिक स्थिति कमजोर हो जाती है। मनुस्मृति में स्त्रीधन की रक्षा के लिए प्रावधान किए गए हैं और उसके अनुचित हरण को दंडनीय माना गया है। इस दृष्टि से स्त्रीधन की अवधारणा प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय थी। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि नारी सम्मान केवल भावनात्मक शब्द नहीं, बल्कि उसके आर्थिक अधिकारों और सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है। Manusmriti
मनुस्मृति में विवाह संस्था को लेकर भी अनेक प्रावधान हैं। इसके विभिन्न श्लोकों की व्याख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन विवाह संबंधी व्यवस्था में कन्या की आयु, विवाह, पति के गुण तथा पारिवारिक दायित्व जैसे विषयों पर चर्चा मिलती है। कुछ व्याख्याकार मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक 90-91 को कन्या के लिए योग्य वर के चयन और विवाह संबंधी स्वतंत्रता से जोड़ते हैं। वहीं दूसरी ओर मनुस्मृति के आलोचक इन श्लोकों और व्यापक वैवाहिक व्यवस्था की अलग व्याख्या करते हैं। इसलिए यहां भावनात्मक निष्कर्ष के बजाय मूल संस्कृत पाठ और प्रामाणिक भाष्य को देखना अधिक उचित होगा। Manusmriti
मनुस्मृति विवाह में धन के लेन-देन को लेकर भी सावधानी बरतती है। विवाह को खरीद-बिक्री या आर्थिक सौदे में बदलने की प्रवृत्ति की आलोचना की गई है। आज के समय में जब दहेज एक गंभीर सामाजिक समस्या है, तब विवाह को आर्थिक लेन-देन से अलग रखने का यह सिद्धांत विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है। विवाह दो व्यक्तियों और दो परिवारों का संबंध है इसे आर्थिक सौदे में बदल देना नारी की गरिमा के विरुद्ध भी है और परिवार की गरिमा के विरुद्ध भी। Manusmriti
मनुस्मृति में अपराध और दंड की विस्तृत व्यवस्था है। महिलाओं के अपहरण, हत्या और उनके विरुद्ध किए जाने वाले विभिन्न अपराधों के लिए कठोर दंडों का उल्लेख मिलता है। यहां यह समझना आवश्यक है कि प्राचीन दंड विधान को आधुनिक कानून की कसौटी पर सीधे रखकर देखना इतिहास और विधि दोनों के साथ न्याय नहीं होगा। फिर भी, एक बात स्पष्ट है मनुस्मृति के भीतर महिला के विरुद्ध अपराध को गंभीर सामाजिक और कानूनी विषय के रूप में देखा गया था। अर्थात नारी की सुरक्षा को केवल परिवार की नैतिक जिम्मेदारी नहीं माना गया, बल्कि दंड व्यवस्था से भी जोड़ा गया। Manusmriti
मनुस्मृति में पुरुषों को माता, पत्नी और पुत्री के साथ अनुचित व्यवहार से बचने का निर्देश भी मिलता है। यह संदेश अपने मूल में अत्यंत सरल है जिस परिवार में महिला का सम्मान नहीं है, वह परिवार अपनी सामाजिक और नैतिक शक्ति खो देता है। आज भी घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, आर्थिक नियंत्रण और महिलाओं के साथ भेदभाव जैसी समस्याएं हमारे समाज में मौजूद हैं। ऐसे समय में किसी भी प्राचीन ग्रंथ की उन शिक्षाओं को सामने लाना उपयोगी हो सकता है, जो परिवार में पारस्परिक सम्मान और जिम्मेदारी की बात करती हैं। Manusmriti
यही इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। मनुस्मृति को लेकर आधुनिक समाज में आलोचना का आधार केवल एक-दो श्लोक नहीं है। इसके कुछ प्रावधान आज के समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जाति व्यवस्था और लैंगिक अधिकारों के आधुनिक मानकों से टकराते हुए दिखाई देते हैं। अनेक विद्वानों और सामाजिक सुधारकों ने इन्हीं आधारों पर मनुस्मृति की आलोचना की है। इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि मनुस्मृति के बारे में हर आलोचना केवल ‘बिना पढ़े’ की गई है। लेकिन दूसरी तरफ यह कहना भी उतना ही अधूरा है कि मनुस्मृति में नारी सम्मान का कोई विचार ही नहीं है। सच शायद इन दोनों अतियों के बीच है। किसी भी प्राचीन ग्रंथ का मूल्यांकन उसके पूरे संदर्भ में होना चाहिए। यदि कुछ श्लोकों के आधार पर पूरे ग्रंथ को नारी विरोधी घोषित करना उचित नहीं है, तो केवल ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ के आधार पर उसकी सभी व्यवस्थाओं को आधुनिक लैंगिक समानता के अनुरूप घोषित करना भी उचित नहीं होगा। Manusmriti
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी भी ग्रंथ, व्यक्ति या विचारधारा के बारे में धारणा कुछ पंक्तियों के आधार पर बन जाती है। किसी ने कहा मनुस्मृति नारी विरोधी है। दूसरे ने कहा मनुस्मृति पूरी तरह नारी सम्मान की पक्षधर है। दोनों कथनों के बीच वास्तविकता जानने के लिए तीसरे रास्ते की आवश्यकता है मूल ग्रंथ को पढ़ना। मनुस्मृति का अध्ययन उसके मूल संस्कृत पाठ, विभिन्न पाठ-परंपराओं, प्रामाणिक भाष्यों और आधुनिक विद्वानों की आलोचनात्मक व्याख्याओं के साथ किया जाना चाहिए। क्योंकि किसी भी प्राचीन ग्रंथ को समझना केवल यह देखना नहीं है कि उसमें क्या लिखा है; यह समझना भी आवश्यक है कि कब लिखा गया, किस सामाजिक व्यवस्था में लिखा गया, उसके शब्दों का तत्कालीन अर्थ क्या था और बाद के काल में उसकी व्याख्या कैसे हुई। Manusmriti
भारतीय परंपरा में नारी के सम्मान की अवधारणा केवल मनुस्मृति तक सीमित नहीं है। वैदिक साहित्य से लेकर उपनिषद, महाकाव्य और अन्य संस्कृत ग्रंथों तक महिलाओं की विद्वत्ता, सामाजिक भूमिका और पारिवारिक गरिमा के अनेक उदाहरण मिलते हैं। इसलिए भारतीय परंपरा को समझने के लिए किसी एक ग्रंथ को पूरी सभ्यता का अंतिम प्रतिनिधि मान लेना भी उचित नहीं है। फिर भी मनुस्मृति भारतीय विधि और सामाजिक चिंतन के इतिहास का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसलिए उसके प्रति न तो अंधभक्ति उचित है और न ही बिना अध्ययन के खारिज कर देना। Manusmriti
मनुस्मृति को लेकर बहस होनी चाहिए और खुलकर होनी चाहिए। उसके उन प्रावधानों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो आधुनिक लोकतांत्रिक और समानतावादी मूल्यों से मेल नहीं खाते। साथ ही उसके उन विचारों को भी सामने लाना चाहिए जिनमें नारी के सम्मान, स्त्रीधन की सुरक्षा, परिवार में महिलाओं की प्रतिष्ठा और स्त्री के प्रति जिम्मेदारी की बात कही गई है। किसी ग्रंथ की आलोचना करने का अधिकार हर व्यक्ति को है, लेकिन आलोचना ज्ञान पर आधारित होनी चाहिए, धारणा पर नहीं। और यदि मनुस्मृति के संदर्भ में केवल इतना कह दिया जाए कि ‘मनु नारी विरोधी थे’, तो यह निष्कर्ष उसके पूरे पाठ और उसमें मौजूद जटिलताओं को समेट नहीं पाता। मनु के नाम से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध संदेश आज भी विचार करने योग्य है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है, वहां श्रेष्ठता और शुभता का वास होता है। आज के भारत के लिए भी इस संदेश का महत्व कम नहीं है। क्योंकि अंततः किसी समाज की वास्तविक प्रगति केवल उसकी आर्थिक शक्ति, तकनीकी विकास या भौतिक संपन्नता से नहीं मापी जाती। यह भी देखा जाता है कि उस समाज में महिलाओं को कितना सम्मान, सुरक्षा, गरिमा, अवसर और न्याय प्राप्त है। इसलिए मनुस्मृति को लेकर अंतिम फैसला नारों से नहीं, अध्ययन से होना चाहिए। मनुस्मृति को पढ़िए, उसके पक्ष और विपक्ष दोनों को समझिए और फिर अपना मत बनाइए क्योंकि किसी भी ग्रंथ को बिना पढ़े खारिज करना उतना ही अनुचित है, जितना बिना समझे स्वीकार कर लेना। Manusmriti
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