Sunday, 14 July 2024

Microplastic Pollution : माइक्रो प्लास्टिक के ‘टाइम बम’ पर दुनिया

Microplastic Pollution : प्यू चेरिटेबल ट्रस्ट की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल 11 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा समुद्र…

Microplastic Pollution : माइक्रो प्लास्टिक के ‘टाइम बम’ पर दुनिया
संजीव रघुवंशी
(वरिष्ठ पत्रकार)
Microplastic Pollution : प्यू चेरिटेबल ट्रस्ट की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल 11 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में पहुंच रहा है। मुंबई, केरल, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के आसपास का समुद्र सबसे अधिक प्रदूषित हो चुका है। गैर सरकारी संगठन ‘प्रथम’ की रिपोर्ट ग्रामीण क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे (plastic waste) को लेकर डराने वाली तस्वीर पेश करती है। देश के 70 जिलों के 700 गांवों पर अध्ययन के बाद तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 67 फ़ीसदी प्लास्टिक कचरा जला दिया जाता है, जिससे बेहद खतरनाक गैसें (Dangerous Gases) निकलती हैं। बाकी बचे कचरे में से अधिकांश डंप कर दिया जाता है, जो खेतों के जरिए फसलों में और फिर माइक्रो प्लास्टिक (Microplastic Pollution) के रूप में मानव शरीर में पहुंच रहा है।

Microplastic Pollution: पिछले महीने आयी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ओजोन परत के छेद धीरे-धीरे भर रहे हैं और 2066 तक इनके पूरी तरह से खत्म होने की संभावना है। वायु प्रदूषण को लेकर इस अच्छी खबर के साथ ही मानव सभ्यता पर जल और थल से जुड़े प्रदूषण को लेकर बेहद गंभीर खतरा बताने वाली एक दूसरी रिपोर्ट भी सामने आयी है। कई देशों के वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में दावा किया है कि मानव शरीर में औसतन पांच ग्राम प्लास्टिक रोजाना पहुंच रहा है। माइक्रो प्लास्टिक, यानी पांच मिलीमीटर से छोटे कणों के रूप में शरीर में दाखिल हो रहा यह प्लास्टिक मानव सभ्यता के लिए एक ‘टाइम बम’ जैसा है।

मलेशिया, इंडोनेशिया और नीदरलैंड के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि माइक्रो प्लास्टिक मानव शरीर के आधे से अधिक अंगों तक पहुंच चुका है। इंडोनेशिया की ‘एअरलंग्गा यूनिवर्सिटी’ (Airlangga University) के शोधकर्ताओं की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्लास्टिक उत्पाद बनाने में 10,000 से अधिक रसायनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें से अधिकतर रसायन मानव शरीर के लिए बेहद खतरनाक हैं। मलेशिया के साइंस विश्वविद्यालय के शोधकर्ता ली योंग ये ने अपने अध्ययन में पाया कि मानव शरीर में प्लास्टिक के 12 से लेकर एक लाख कण तक रोज पहुंच रहे हैं। नीदरलैंड (Netherlands) के वैज्ञानिकों की रिपोर्ट और अधिक डराने वाली है। इसमें दावा किया गया है कि मां के दूध के जरिए भी बच्चों के शरीर में माइक्रो प्लास्टिक पहुंच रहा है। दूध के 25 में से 18 नमूनों और सी-फूड के 8 में से 7 नमूनों में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पाए गए हैं। रिपोर्ट कहती है कि समुद्री नमक ( sea ​​salt) में भी माइक्रो प्लास्टिक है। शरीर में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पाचन तंत्र, किडनी, लीवर, फेफड़े, दिल से जुड़े गंभीर रोगों के साथ ही कैंसर का कारण बनते हैं। यही नहीं, मोटापा, प्रजनन क्षमता और भू्रण के विकास पर नकारात्मक असर भी माइक्रो प्लास्टिक की वजह से हो सकता है।

2019 में आई एक रिपोर्ट में 2020 तक विश्व में 12 अरब टन प्लास्टिक कचरा जमा होने का अनुमान लगाया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल 500 अरब प्लास्टिक कैरी बैग इस्तेमाल किए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) का दावा है कि 80 लाख टन प्लास्टिक कचरा हर साल समुद्र में पहुंच जाता है। यह माइक्रो प्लास्टिक के रूप में समुद्री जीवों के जरिए लोगों के शरीर में प्रवेश कर रहा है। वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि समुद्री जीवों की कम से कम 267 प्रजातियों को प्लास्टिक कचरा नुकसान पहुंचा रहा है। पिछले साल जून में वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका की बर्फ में भी माइक्रो प्लास्टिक मिला था। ये तथ्य पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरे की घंटी है। इंडोनेशिया के शोधकर्ताओं ने तो यहां तक दावा किया है कि अगर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक समुद्र में मछलियों के वजन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा जमा हो जाएगा।

माइक्रो प्लास्टिक को प्लास्टिक कचरे से अगली कड़ी के खतरे के तौर पर देखा जा रहा है। यह प्लास्टिक उत्पादों के इस्तेमाल के साथ ही प्लास्टिक के विघटन के जरिए भी पैदा होता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिंगल यूज प्लास्टिक उत्पाद प्लास्टिक कचरा बढऩे का सबसे बड़ा कारण है, लेकिन इसके अलावा भी कई पहलू हैं जो सीधे तौर पर माइक्रो प्लास्टिक से जुड़े हैं। आईयूसीएन की रिपोर्ट के मुताबिक, माइक्रो प्लास्टिक में 35 फीसदी हिस्सेदारी सिंथेटिक टेक्सटाइल की है। इसके अलावा 28 फीसदी टायर, 24 फीसदी सिटी डस्ट, 7 फीसदी रोड मार्किंग, 4 फीसदी प्रोटेक्टिव मेरिन कोटिंग और 2 फीसदी हिस्सेदारी पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स की है। पिछले साल दिसंबर में आई अमेरिकन केमिकल फोरम की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि धूप के बजाय ड्रायर में कपड़े सुखाने पर 40 गुना अधिक माइक्रो फाइबर निकलते हैं, जो माइक्रो प्लास्टिक का ही एक रूप है। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की ओर से सिडनी के 32 घरों में किए गए अध्ययन में पाया गया कि धूल में 39 फीसदी तक माइक्रो प्लास्टिक मौजूद है। इसका मतलब यह है कि हम बाहर ही नहीं, घर के अंदर भी सुरक्षित नहीं है। सिंथेटिक कपड़ों से लेकर खाने-पीने की पैकिंग, गिलास, प्लेट, पानी एवं शीतल पेय की बोतल, सौंदर्य प्रसाधन, सजावटी सामान जैसी चीजों के जरिए हम चौबीसों घंटे माइक्रो प्लास्टिक के संपर्क में हैं। प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण हमारे शरीर में भी पहुंच रहे हैं।

Microplastic Pollution

अगर भारत की बात करें, तो प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में हम काफी पिछड़े हुए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक, देश में हर दिन 26000 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इसमें से लगभग 30 फीसदी ही रीसाइकल हो पाता है। बाकी को या तो डंप कर दिया जाता है या फिर नदी-नालों के जरिए समुद्र तक पहुंचकर जल प्रदूषण का प्रमुख कारण बनता है। यह माइक्रो प्लास्टिक के रूप में बारिश के पानी के साथ भी वापस लोगों के पास पहुंच रहा है। प्यू चेरिटेबल ट्रस्ट की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल 11 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में पहुंच रहा है। मुंबई, केरल, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के आसपास का समुद्र सबसे अधिक प्रदूषित हो चुका है। गैर सरकारी संगठन ‘प्रथम’ की रिपोर्ट ग्रामीण क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे को लेकर डराने वाली तस्वीर पेश करती है। देश के 70 जिलों के 700 गांवों पर अध्ययन के बाद तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 67 फीसदी प्लास्टिक कचरा जला दिया जाता है, जिससे बेहद खतरनाक गैसें निकलती हैं। बाकी बचे कचरे में से अधिकांश डंप कर दिया जाता है, जो खेतों के जरिए फसलों में और फिर माइक्रो प्लास्टिक के रूप में मानव शरीर में पहुंच रहा है।

12 अगस्त, 2021 को भारत सरकार ने प्लास्टिक उपभोग को नियंत्रित करने के लिए त्रिस्तरीय योजना की अधिसूचना जारी की थी। इसके तहत एक जुलाई, 2022 से दैनिक जीवन में अधिकाधिक इस्तेमाल होने वाले 19 प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध, 30 सितंबर से 75 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक बैग पर बैन और 31 दिसंबर, 2022 से 120 माइक्रोन से कम मोटे बैग पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी। जमीनी तौर पर यह अधिसूचना कितनी कारगर हो पाई यह किसी से छिपा नहीं है। शुरुआत में अधिसूचना के तहत कार्यवाही का हो-हल्ला जरूर मचा, लेकिन कुछ दिनों में ही सारे दावे फुस्स हो गए। बाजार प्रतिबंधित प्लास्टिक उत्पादों से अटे पड़े हैं, तो वहीं लोग इसका बेरोकटोक इस्तेमाल कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986 की धारा 15 के तहत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के उल्लंघन पर 7 साल की जेल और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। हकीकत यह है कि कभी-कभार किसी छोटे-मोटे दुकानदार से प्रतिबंधित प्लास्टिक उत्पादों की छोटी-मोटी बरामदगी दिखाकर संबंधित विभाग अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। ऐसे में, पर्यावरण प्रेमियों की इस दलील में ज्यादा दम नजर आता है कि इस्तेमाल के बजाय प्लास्टिक उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग को नियंत्रित किया जाए तो ज्यादा प्रभावी नतीजे आ सकते हैं।

Microplastic Pollution

संबंधित विभागों की खानापूर्ति के बीच ऐसी खबरें कुछ सुकून जरूर देती हैं, जिनमें हैदराबाद के प्रोफेसर सतीश द्वारा प्लास्टिक कचरे से पेट्रोलियम ईंधन बनाने, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की ओर से जैविक चारकोल बनाने और प्लास्टिक कचरे से सडक़ों का निर्माण करने के दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, इन प्रयासों से मानव स्वास्थ्य पर मडऱाते अत्यंत गंभीर खतरे को किस हद तक कम किया जा सकता है, इस बारे में किसी नतीजे पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी।

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