Milad Un Nabi 2026: पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत (पैदाइश) को याद करने का दिन मुसलमानों के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि अपने नबी की जिंदगी और उनकी दी हुई सीख को याद करने का मौका माना जाता है। इसे मिलाद-उन-नबी या मौलिद-उन-नबी कहा जाता है।

Milad Un Nabi: कल्पना कीजिए उस दौर की जब अरब की धरती पर मक्का की गलियों में शाम उतर रही हो। चारों तरफ रेगिस्तान की खामोशी हो, दूर काबा अपनी जगह खड़ा हो और उसी धरती पर एक ऐसी शख्सियत जन्म लेने वाली हो जिसकी जिंदगी आने वाले समय में करोड़ों लोगों के लिए इंसानियत, रहम और सच्चाई का रास्ता बनने वाली हो। यही वजह है कि पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत (पैदाइश) को याद करने का दिन मुसलमानों के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि अपने नबी की जिंदगी और उनकी दी हुई सीख को याद करने का दिन माना जाता है। इसे मिलाद-उन-नबी या मौलिद-उन-नबी कहा जाता है।
'मिलाद' अरबी शब्द है जिसका संबंध जन्म से है। मिलाद-उन-नबी से मतलब पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैदाइश की याद से है। मुस्लिम समाज के कई हिस्सों में इसे रबीउल अव्वल के महीने में मनाया जाता है। सबसे मशहूर तारीख 12 रबीउल अव्वल है। हालांकि पैगंबर मुहम्मद साहब की पैदाइश की सटीक तारीख को लेकर इतिहास और इस्लामी विद्वानों के बीच अलग-अलग राय मिलती है। मिस्र के दार अल-इफ्ता के अनुसार, रबीउल अव्वल का महीना स्वीकार किया जाता है लेकिन तारीख को लेकर मतभेद है, 12 रबीउल अव्वल सबसे प्रसिद्ध मतों में से एक है। आसान भाषा में कहें तो 12 रबीउल अव्वल को लेकर लोकप्रिय परंपरा जरूर है लेकिन इसे इतिहास की निर्विवाद और बिल्कुल निश्चित तारीख कहना सही नहीं होगा।
पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जन्म मक्का में हुआ था। उनका जन्म 'आमुल-फील' यानी हाथी वाले साल के नाम से मशहूर वर्ष में माना जाता है। ईसवी कैलेंडर के हिसाब से उनका जन्म लगभग 570-571 ईस्वी के आसपास माना जाता है। जन्म की तारीख को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक मत मौजूद हैं। कुछ विद्वान 8 या 9 रबीउल अव्वल को ज्यादा मजबूत मानते हैं जबकि 12 रबीउल अव्वल सबसे प्रचलित तारीख है। उनका जन्म उस समय हुआ जब अरब समाज में कई तरह की सामाजिक और नैतिक समस्याएं मौजूद थीं। ऐसे दौर में पैगंबर साहब ने लोगों को एकेश्वरवाद, इंसाफ, सच्चाई, रहम और अच्छे व्यवहार की शिक्षा दी।
मिलाद मनाने वाले मुसलमानों के लिए इसका सबसे बड़ा भाव पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मोहब्बत और उनकी जिंदगी को याद करना है। इस मौके पर लोग उनकी सीरत यानी जिंदगी को पढ़ते और सुनते हैं। उनके बचपन, उनकी सच्चाई, उनके संघर्ष, मक्का के दौर, मदीना की जिंदगी और उनके इंसानियत भरे व्यवहार को याद किया जाता है। यह दिन बहुत से लोगों के लिए खुद से सवाल करने का दिन भी बन जाता है कि क्या हम अपने नबी की बताई हुई सच्चाई, रहम और अच्छे अखलाक को अपनी जिंदगी में उतार रहे हैं?
मिलाद मनाने का तरीका हर देश, शहर और समुदाय में एक जैसा नहीं होता। कई जगह मस्जिदों और घरों को सजाया जाता है। कहीं रोशनी की जाती है, कहीं जुलूस निकलते हैं और कहीं धार्मिक सभाएं आयोजित की जाती हैं। इस दिन आम तौर पर-
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसके तौर-तरीके अलग हैं। कहीं यह शांत धार्मिक सभा के रूप में होता है तो कहीं पूरा इलाका रोशनी और धार्मिक कार्यक्रमों से जगमगा उठता है। पैगंबर साहब की जिंदगी हमें बताती है कि ताकत मिलने के बाद भी इंसान रहम कर सकता है, गुस्से के समय भी खुद पर काबू रख सकता है और अपने साथ बुरा करने वाले को भी माफ कर सकता है। उन्होंने पड़ोसियों के हक, गरीबों की मदद, अनाथों के साथ अच्छा व्यवहार, माता-पिता के सम्मान और इंसाफ पर जोर दिया। इसलिए मिलाद का संदेश सिर्फ इतना नहीं कि हम अपने घरों और गलियों को रोशन करें। असली रोशनी तब होगी जब हमारे व्यवहार में भी सच्चाई और रहम दिखाई दे।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। चेतना मंच इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
विज्ञापन