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मुगल काल में भारत से हज जाने का सबसे बड़ा रास्ता समुद्री मार्ग था। उत्तर भारत, दक्कन और गुजरात के लोग पहले किसी बड़े बंदरगाह तक पहुंचते थे। इनमें सबसे अहम नाम सूरत का था। उस समय सूरत केवल व्यापार का केंद्र नहीं था बल्कि हज यात्रियों के लिए भी सबसे बड़ा पड़ाव माना जाता था।

आज के समय में हज यात्रा के लिए हवाई जहाज, ऑनलाइन व्यवस्था और कई तरह की सुविधाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद यह सफर आसान नहीं माना जाता। सऊदी अरब की तेज गर्मी, लाखों लोगों की भीड़ और लंबे धार्मिक कार्यक्रम इस यात्रा को आज भी चुनौतीपूर्ण बनाते हैं लेकिन अगर हम मुगल दौर की बात करें तो उस समय हज पर जाना सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि हिम्मत, सब्र और भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा हुआ करती थी। उस दौर में न हवाई जहाज थे, न आधुनिक जहाज और न ही रास्तों की कोई खास सुरक्षा फिर भी लोग हजारों किलोमीटर का सफर तय करके मक्का पहुंचते थे।
मुगल काल में भारत से हज जाने का सबसे बड़ा रास्ता समुद्री मार्ग था। उत्तर भारत, दक्कन और गुजरात के लोग पहले किसी बड़े बंदरगाह तक पहुंचते थे। इनमें सबसे अहम नाम सूरत का था। उस समय सूरत केवल व्यापार का केंद्र नहीं था बल्कि हज यात्रियों के लिए भी सबसे बड़ा पड़ाव माना जाता था। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग काफिलों के साथ यहां पहुंचते थे और फिर अरब जाने वाले जहाजों का इंतजार करते थे।
अगर कोई यात्री दिल्ली, आगरा या लाहौर जैसे शहरों से निकलता था तो उसे पहले सूरत पहुंचने में ही कई हफ्ते लग जाते थे। लोग बैलगाड़ी, ऊंट, घोड़े या पैदल सफर करते थे। रास्ते में डाकुओं का डर, खराब मौसम और लंबी दूरी सबसे बड़ी मुश्किलें थीं। कई बार यात्रियों को रास्ते में सरायों में रुकना पड़ता था। उस दौर में यात्रा की गति बहुत धीमी होती थी इसलिए केवल बंदरगाह तक पहुंचना ही बड़ी चुनौती माना जाता था।
सूरत से जहाज अरब की ओर रवाना होते थे। ये जहाज पूरी तरह हवाओं पर निर्भर रहते थे। अगर मौसम खराब हो जाए या समुद्र में तूफान आ जाए तो जहाज कई दिनों तक फंस सकता था। आम तौर पर सूरत से जेद्दा पहुंचने में तीन से छह हफ्ते लग जाते थे। कई बार जहाज पहले मोखा जैसे बंदरगाहों पर रुकते थे और फिर आगे की यात्रा होती थी। यात्रियों को समुद्री बीमारी, खाने की कमी और पानी खराब होने जैसी परेशानियों का भी सामना करना पड़ता था।
मुगल दौर में हज का सफर बेहद जोखिम भरा माना जाता था। उस समय हिंद महासागर में पुर्तगालियों का प्रभाव था और कई समुद्री रास्तों पर उनका नियंत्रण रहता था। कई बार जहाजों को रोक लिया जाता था या लूट लिया जाता था। जहाज लकड़ी के होते थे और तकनीक सीमित थी इसलिए तूफान आने पर हादसे का खतरा हमेशा बना रहता था। लंबे सफर में बीमारी फैलना भी आम बात थी। साफ पानी और दवाओं की कमी के कारण कई लोग रास्ते में ही बीमार पड़ जाते थे।
उस दौर में हज यात्रा बहुत महंगी मानी जाती थी। घर से सूरत पहुंचने का खर्च, जहाज का किराया, खाने-पीने का इंतजाम, मक्का तक पहुंचने का सफर और फिर वापसी का खर्च उठाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। कई लोग पूरी जिंदगी पैसे जोड़ते थे ताकि एक बार हज कर सकें। यही वजह थी कि हज यात्रा को त्याग और समर्पण का प्रतीक भी माना जाता था।
मुगल बादशाह खुद हज पर नहीं गए लेकिन उन्होंने हज यात्रियों की मदद जरूर की। शाही परिवार की महिलाएं भी हज यात्रा पर गईं। इनमें गुलबदन बेगम का नाम सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। अकबर के दौर में उन्होंने मक्का की यात्रा की थी। मुगल शासक हज यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते थे। कई बार मक्का और मदीना के लिए धन और उपहार भी भेजे जाते थे।
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