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इन जयंतियों का एक ही संदेश होता है कि महापुरुष महान थे ही, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे “हमारी जाति” में पैदा हुए थे। लगता है जैसे इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि अब यह नहीं रह गई कि किसी व्यक्ति ने क्या किया, बल्कि यह हो गई है कि वह किस घर में पैदा हुआ।

मेरा महापुरुष तेरे महापुरुष से बड़ा
अभी पिछले हफ्ते की ही तो बात है। मैं मुजफ्फरनगर के पास से गुजर रहा था जहां राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक जुलूस निकलता देखा । जुलूस में आदमी कम थे और गाड़ियां ज्यादा । हर आठ दस गाड़ियों को एस्कॉर्ट करता हुआ ट्रकनुमा एक डीजे भी चल रहा था । इन सभी डीजे के म्यूजिक की आवाज कितनी तेज थी कि मेरी कार भी उनके पास से गुजरते हुए लहरा रही थी। सभी गाड़ियों पर पीले रंग के झंडे लगे थे और उन पर बड़ा बड़ा लिखा था- गडरिया । पहले तो मैने अनुमान लगाया कि शायद गडरिया समाज का कोई जुलूस है मगर जब डीजे वाले ट्रकों पर माता अहिल्या बाई होल्कर के 301वीं जयंती के बैनर भी लगे थे तो समझ आया कि इस जयंती पर शायद आसपास कहीं कोई सम्मेलन हो रहा है और ये लोग उसमें जा रहे हैं। गाड़ियों पर लगभग लटकते हुए दर्जनों युवक संगीत की धुन पर दीवानों की तरह नाच रहे थे मगर गले में गेंदे की अनेक मालाएं पहना हुआ एक युवक हाथ जोड़ कर न जाने किस अज्ञात भीड़ का अभिवादन स्वीकार कर रहा था । मन में आया कि इस युवकों को रोक कर जरा पूछ ही लूं कि अहिल्या बाई होल्कर के बारे क्या कुछ जानते भी हो या यूं ही उनके नाम पर हमें हलकान कर रहे हो मगर आज के दौर में भला इतना साहस कोई आम आदमी कैसे कर सकता है ? नतीजा कान फोड़ू डीजे वाले इन ट्रकों के बगल से गुजरते हुए मैंने खुद को समझाया कि अकेले इन्हें ही क्यों कोसूं, बाकी जातियों वाले भी क्या ऐसा नहीं करते ? जब इसी जातिगत शक्ति प्रदर्शन के आधार पर तमाम राजनीतिक दल टिकिट अथवा पद बांटते हैं और आज राजनीति से अच्छा कोई व्यवसाय नहीं तो कोई नेतानुमा आदमी अपनी मार्केटिंग क्यों न करे ? अब सीधे सीधे जाति के नाम पर तो कर नहीं सकते तो अपनी जाति में जन्मे महापुरुष के नाम पर ही सही ।
किसी भी शहर का वार्षिक कैलेंडर उठाकर देख लीजिए। जनवरी से दिसंबर तक शायद ही कोई महीना ऐसा हो जिसमें किसी न किसी महापुरुष, संत, राजा, समाज सुधारक या लोकदेवता के नाम पर शोभायात्रा न निकलती हो। कहीं परशुराम जयंती है तो कहीं रविदास जयंती। कहीं आंबेडकर जयंती पर विशाल जुलूस निकल रहा है तो कहीं महाराणा प्रताप जयंती पर शक्ति प्रदर्शन हो रहा है। कहीं मिहिर भोज के सम्मान में रैली निकल रही है तो कहीं वाल्मीकि जयंती, निषादराज जयंती, गुरु रविदास जयंती अथवा संत कबीर जयंती । सूची इतनी लंबी है कि लगता है मानो पूरा वर्ष किसी न किसी जातीय गौरव दिवस के नाम पर ही आरक्षित हो गया हो। इन जयंतियों का एक ही संदेश होता है कि महापुरुष महान थे ही, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे “हमारी जाति” में पैदा हुए थे। लगता है जैसे इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि अब यह नहीं रह गई कि किसी व्यक्ति ने क्या किया, बल्कि यह हो गई है कि वह किस घर में पैदा हुआ। जिन महापुरुषों ने अपने समय की संकीर्णताओं को तोड़ने का प्रयास किया, उन्हें आज उन्हीं संकीर्णताओं के भीतर बंद करके प्रदर्शित किया जा रहा है। जो व्यक्ति अपने युग से बड़ा था, उसे उसकी जाति से छोटा बना दिया गया है। अब स्थिति यह है कि यदि एक जाति ने पांच हजार लोगों की शोभायात्रा निकाली तो दूसरी को दस हजार लोगों की निकालनी है। यदि एक ने बीस बीस फुट के होर्डिंग लगाए हैं तो दूसरी को तीस तीस फुट के लगाने हैं। ऐसा लगता है मानो महापुरुषों की जयंती नहीं, बल्कि जातीय शक्ति प्रदर्शन की वार्षिक प्रतियोगिता चल रही हो। यह ठीक है कि लोकतंत्र में संख्या का महत्व है मगर क्या इन शोभा यात्राओं का एक ही उद्देश्य रह गया है कि देख लो, हम कितने हैं। क्या वोटों की परेड नहीं बनते जा रहे हैं ऐसे आयोजन ?
चलिए राजनीति करने वाले ऐसे ही अपनी दुकानदारी करते हैं तो करें मगर जरा यह भी तो सोचें कि इसके समाज पर क्या असर पड़ रहा है ? हम अपने बच्चों को क्या यह सिखाने में लगे हैं कि पहले यह जानो कि कौन किस जाति का था, बाद में यह देखना कि उसने किया क्या था ? क्या सामाजिक पहचान नागरिक पहचान पर भारी पड़ने लगी है ? क्या लोग डॉक्टर, शिक्षक, व्यापारी, किसान या भारतीय कम और किसी जातीय समूह के प्रतिनिधि हमें अधिक दिखाई देने लगे हैं ? क्या हम ऐसे तमाशे करके महापुरुषों का सम्मान कर रहे हैं या उनका उपयोग कर रहे हैं ? क्या हम उनके विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं या केवल उनकी तस्वीरों के पीछे अपनी संख्या दिखा रहे हैं ? क्या हम एक ऐसे समाज की रचना करना चाहते हैं जहां नागरिकों की पहचान उनके कर्म, प्रतिभा और विचारों से नहीं, बल्कि उनके जातीय जुलूस की लंबाई से तय होगी ? क्या यह मजाक नहीं कि एक ओर तो हम भारत विश्वगुरु बनाने की बातें करते हैं और दूसरी ओर देश को जातियों के एक ऐसे विशाल वार्षिक मेले में बदल रहे हैं जहां साल के बारहों महीने किसी न किसी जातीय शक्ति प्रदर्शन का उत्सव चल रहा है और जहां अघोषित रूप से लिखा हुआ है कि मेरा महापुरुष तेरे महापुरुष से बड़ा ।
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लेखक जाने माने लेखक तथा वरिष्ठ पत्रकार हैं।
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है। इसके लिए Chetna Manch उत्तरदायी नहीं है।)
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