क्या राजनीति में आने वाली नई पीढ़ी केवल बड़े नेताओं की छाया बनकर रह जाएगी या अपनी अलग पहचान बनाएगी ? भारत की राजनीति में युवाओं की बढ़ती भूमिका के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई उम्र के साथ नई सोच भी आएगी या नहीं।

Editorial : लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि समय के साथ समाज बदलता है, नई आवाजें सामने आती हैं और व्यवस्था को उन आवाजों को सुनना पड़ता है। लंबे समय तक समाज के अनेक वर्गों की आवाज सत्ता और व्यवस्था तक आसानी से नहीं पहुंच पाती थी। लेकिन जब जनता अपने अधिकारों और समस्याओं को लेकर संगठित होकर सामने आती है तो व्यवस्था को भी उसकी बात सुननी पड़ती है। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है। आज देश के युवाओं के सामने राजनीति में आने का एक बड़ा अवसर है। लेकिन राजनीति में आने का अर्थ केवल किसी बड़े नेता के पीछे खड़े होकर अपनी पहचान बनाना नहीं होना चाहिए। युवा अपनी योग्यता, ज्ञान, अनुभव और सामाजिक सरोकार के आधार पर अपनी पहचान बनाए—यही नई राजनीति की पहली शर्त होनी चाहिए। Editorial
एक IAS या PCS अधिकारी बनने के लिए वर्षों की कठिन पढ़ाई करनी पड़ती है। वैज्ञानिक बनने के लिए लंबे समय तक अध्ययन और शोध करना पड़ता है। डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक या किसी अन्य पेशेवर क्षेत्र में सफल होने के लिए भी व्यक्ति को वर्षों तक तैयारी करनी पड़ती है। फिर जनप्रतिनिधि बनने के लिए तैयारी को केवल चुनाव लड़ने तक सीमित क्यों माना जाए? एक सफल जनप्रतिनिधि के लिए डिग्री से अधिक जरूरी है समाज की समझ, लोगों के बीच रहने का अनुभव, समस्याओं को सुनने की क्षमता, सही निर्णय लेने का साहस और सबसे बढ़कर चरित्र। राजनीति लोकतंत्र में सबसे बड़ी सार्वजनिक जिम्मेदारियों में से एक है। इसलिए इसमें आने वाले व्यक्ति की तैयारी भी उतनी ही गंभीर होनी चाहिए। युवाओं को राजनीति में जरूर आना चाहिए, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि राजनीति कोई शॉर्टकट नहीं है। Editorial
नई राजनीति की चर्चा शिक्षा से अलग नहीं की जा सकती। आज हमें शिक्षा की पूरी व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। हमने ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित की है जिसमें विद्यार्थी परीक्षा पास करता है, डिग्री प्राप्त करता है और नौकरी की तलाश में निकल जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या शिक्षा उसे जीवन की वास्तविक चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार करती है? स्कूल और कॉलेज से निकलने के बाद हमारे कितने विद्यार्थी आर्थिक निर्णय लेने में सक्षम होते हैं? कितने अपने स्वास्थ्य को समझते हैं? कितने तनाव से निपटना जानते हैं? कितने समाज और लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को समझते हैं? शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाने की योग्यता पैदा करना नहीं हो सकता। शिक्षा व्यक्ति को जीवन जीना, निर्णय लेना, आर्थिक रूप से समझदार बनना, स्वस्थ रहना, समाज को समझना और जिम्मेदार नागरिक बनना सिखाए तभी शिक्षा वास्तव में राष्ट्र निर्माण का माध्यम बन सकेगी। Editorial
विकास की चर्चा अक्सर सड़कों, इमारतों, उद्योगों और आर्थिक आंकड़ों तक सीमित हो जाती है। लेकिन किसी राष्ट्र का वास्तविक विकास उसके नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता से तय होता है। स्वास्थ्य केवल बीमारी होने के बाद अस्पताल पहुंचने का विषय नहीं है। स्वस्थ समाज का अर्थ है शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक शांति, संतुलित जीवन और ऐसा सामाजिक वातावरण जिसमें व्यक्ति लगातार तनाव और असुरक्षा में न जीता रहे। आखिर विकास का अंतिम उद्देश्य क्या है? क्या केवल इतना कि व्यक्ति के पास अधिक पैसा हो ? Editorial
आज समाज का एक बड़ा हिस्सा परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए लगातार दौड़ रहा है। नौकरी हो या व्यापार, हर व्यक्ति भविष्य को सुरक्षित करने की चिंता में लगा है। यह स्वाभाविक भी है। परिवार चलाना और आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर भविष्य तैयार करना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मनुष्य का पूरा जीवन केवल कमाने और जमा करने के लिए है? शायद नहीं।यहीं से सार्वजनिक जीवन और राजनीति की भूमिका शुरू होती है। भारत के इतिहास में ऐसे अनेक व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने यह साबित किया कि सार्वजनिक जीवन में सादगी, ईमानदारी और सिद्धांत कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति हो सकते हैं। लाल बहादुर शास्त्री का जीवन बताता है कि सादगी भी नेतृत्व की ताकत बन सकती है। महात्मा गांधी ने राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक और नैतिक परिवर्तन से जोड़ने का प्रयास किया। दुनिया में नेल्सन मंडेला जैसे उदाहरण बताते हैं कि सत्ता से कहीं बड़ा व्यक्ति का सिद्धांत और समाज के प्रति उसका समर्पण हो सकता है। पद बड़ा नहीं होता, पद पर बैठा व्यक्ति अपने आचरण से उसे बड़ा बनाता है। Editorial
युवाओं को राजनीति से डरने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन राजनीति में आने के लिए जल्दबाजी भी नहीं होनी चाहिए। पहले शिक्षा पूरी करें। अपने पैरों पर खड़े हों। किसी पेशे में अनुभव प्राप्त करें। समाज की समस्याओं को समझें। लोगों के बीच काम करें और फिर सार्वजनिक जीवन में उतरें। राजनीति में आने वाले युवा की पहली पूंजी उसका चरित्र और जनविश्वास होना चाहिए। किसी बड़े नेता के साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवा लेना राजनीतिक उपलब्धि नहीं है। असली उपलब्धि तब है जब आपके काम के कारण किसी गांव, मोहल्ले, शहर या पूरे समाज के लोग आपके साथ खड़े हों। किसी नेता की छाया में खड़े होने से पहचान नहीं बनती, जनता के बीच काम करने से पहचान बनती है। Editorial
नई राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक राजनीति के उद्देश्य को लेकर भी है। राजनीति व्यक्तिगत सुरक्षा-कवच या कारोबार बचाने का साधन नहीं बननी चाहिए। यदि कोई बड़ा कारोबारी केवल इसलिए राजनीति में आए कि पुलिस उससे सवाल न करे, प्राधिकरण उसके काम की जांच न करे, प्रदूषण विभाग कार्रवाई न करे या अधिकारियों पर व्यक्तिगत प्रभाव बना रहे, तो यह लोकतंत्र की सेवा नहीं है।
राजनीति में आने का अर्थ कानून और व्यवस्था से ऊपर उठ जाना नहीं हो सकता। देश को सफल उद्योगपतियों और उद्यमियों की भी आवश्यकता है। वे अपने अनुभव, संसाधन और क्षमता का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, रोजगार और तकनीक के विकास में कर सकते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में आने के बाद लक्ष्य केवल व्यापार का विस्तार नहीं, समाज का विस्तार होना चाहिए। Editorial
भारत को ऐसी राजनीति की जरूरत है जिसमें केवल पारंपरिक राजनीतिक परिवारों या लंबे समय से राजनीति में सक्रिय लोगों का ही स्थान न हो। नई राजनीति में युवा आएं, लेकिन अनुभवी लोग भी आएं।
वैज्ञानिक आएं। शिक्षक आएं। प्रशासनिक अनुभव रखने वाले लोग आएं। सफल उद्यमी आएं। सामाजिक कार्यकर्ता आएं। अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने वाले लोग सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनें।
लेकिन सभी के लिए कसौटी एक होनी चाहिए ज्ञान कितना है? अनुभव कितना है? चरित्र कैसा है? और जनता के लिए किया क्या है? यही चार सवाल भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। Editorial
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी बड़े नेता के साथ एक तस्वीर तेजी से फैल सकती है। किसी मंच पर कुछ मिनट खड़े होकर व्यक्ति खुद को बड़ा राजनीतिक चेहरा बताने लग सकता है। लेकिन लोकतंत्र सोशल मीडिया की तस्वीरों से नहीं चलता। लोकतंत्र जनता के विश्वास से चलता है। इसलिए युवाओं को नेताओं के पीछे भागने के बजाय अपने पीछे लोगों को जोड़ना सीखना होगा। किसी बड़े नेता के साथ फोटो होना उपलब्धि नहीं है। उपलब्धि तब है जब लोग आपके काम को पहचानें, आपकी ईमानदारी पर विश्वास करें और आपकी आवाज को अपनी आवाज मानें। Editorial
भारत की अगली राजनीतिक पीढ़ी केवल उम्र में नई नहीं होनी चाहिए, बल्कि सोच में भी नई होनी चाहिए। ऐसी राजनीति चाहिए जो शिक्षा को केवल डिग्री नहीं, जीवन की तैयारी माने। ऐसी राजनीति चाहिए जो स्वास्थ्य को केवल अस्पताल नहीं, खुशहाल जीवन माने। ऐसी राजनीति चाहिए जो अर्थव्यवस्था को केवल पैसा नहीं, सम्मानजनक जीवन माने। और ऐसी राजनीति चाहिए जो सत्ता को केवल अधिकार नहीं, जनता के प्रति जिम्मेदारी माने। भारत की अगली राजनीतिक क्रांति शायद किसी बड़े नारे से नहीं आएगी। वह उस दिन शुरू होगी जब देश का युवा यह कहेगा “मैं किसी नेता का पिछलग्गू बनने नहीं, अपने काम से जनता का विश्वास जीतने राजनीति में आऊंगा।” और लोकतंत्र तब और मजबूत होगा जब जनता भी यह कहना शुरू करेगी “हमें वह नेता चाहिए जिसके पास पद से पहले चरित्र, भाषण से पहले ज्ञान और सत्ता से पहले सेवा की भावना हो।” यही राजनीति की नई दिशा हो सकती है। यही शिक्षा का नया उद्देश्य हो सकता है। और शायद यही एक अधिक स्वस्थ, खुशहाल, जिम्मेदार और मजबूत भारत की शुरुआत भी हो सकती है। Editorial
— वीरेश तिवारी
सदस्य, शिकायत निवारण समिति, नोएडा अथॉरिटी, सेक्टर-96
स्तंभकार एवं लेखक
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