Omicron: इन 3 चीजों की वजह से 2022 में कमजोर पड़ेगा कोरोना
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भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 02:21 AM
2019 की सर्दियों में चीन के वुहान (Vuhan) में कोरोना वायरस (Coronavirus) का पहला मामला सामने आया था। कुछ ही महीनों में इस वायरस ने यूरोप और अमेरिका में तबाही मचा दी और 2020 में ही इसे महामारी घोषित करना पड़ा। 2021 खत्म होने को है और कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन (Omicron) ने एक बार फिर से डर का माहौल पैदा कर दिया है।
कुछ ही दिनों में हम साल 2022 में प्रवेश करने वाले हैं और सबके मन में यह सवाल है कि आखिर नया साल कैसा होगा? कोरोना वायरस 2022 में क्या रूप लेगा? आखिर 2022 की दुनिया कैसी होगी?
कोरोना (Covid 19) के कमजोर पड़ने की तीन मुख्य वजहें
पिछले दो साल में इस वायरस के चलते लगभग 52 लोग अपन जान गंवा चुके हैं। लगभग 26 करोड़ लोग इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। यह वायरस लगातार अपना रूप बदल रहा है और हर बार म्यूटेट होकर दुनिया के किसी न किसी हिस्से में भयावह मंजर पैदा कर रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि आने वाले साल में भी यह वायरस अपना रूप बदलता रहेगा और दुनिया के किसी नए हिस्से को अपनी चपेट में ले सकता है। लेकिन, 2022 के लिए अच्छी खबर यह है कि अब इस वायरस के महामारी बनने और प्राणघातक साबित होन की संभावना कम हो रही है। तो, आइए जानते हैं कि इस अच्छी खबर का आधार क्या है।
2022 में कोरोना (Covid 19) के कमजोर पड़ने की तीन मुख्य वजहें हैं:
1. टीकाकरण (Vaccination): फिलहाल, दुनिया भर में लगभग 4.5 अरब लोग कोविड-19 ((Covid 19)) का कोई न कोई टीका लगवा चुके हैं। इसमें से करीब 3.5 अरब लोग ऐसे हैं जिन्हें दोनों डोज लग चुके हैं। इससे भी ज्यादा उम्मीद बंधाने वाली खबर यह है कि दुनिया के लगभग 36 देश बुस्टर डोज पर तेजी से काम कर रहे हैं और 2022 बुस्टर डोज वाला साल होगा। कोरोना से लड़ने वाले सात वैक्सीन (Vaccination) को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हरी झंडी मिल चुकी है और पांच वैक्सीन के अप्रूवल की प्रक्रिया जारी है। 2022 में कोरोना से लड़ने के लिए दुनिया के पास कम से कम 12 वैक्सीन होगी। कोरोना वैक्सीन के प्रोडक्शन में भी तेजी आई है और अब हर महीने करीब 1.5 अरब वैक्सीन का उत्पादन हो रहा है। 2022 में दुनिया के ज्यादातर हिस्सों तक वैक्सीन की पहुंच होगी क्योंकि, उम्मीद है कि अगले साल 25 अरब वैक्सीन इस्तेमाल के लिए तैयार होंगी। इसका यह मतलब नहीं है कि कोरोना (Covid 19) या इसके नए वैरिएंट का संक्रमण रुक जाएगा। वैक्सीन की सुरक्षा, वायरस संक्रमण के बाद होने वाली मौतों का जरूर कम करेगा।
नए वैरियंट से निपटने का यही है एकमात्र रास्ता
इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना आए दिन अपना रूप बदल रहा है और आने वाले दिनों में भी इसके नए वैरिएंट सामने आ सकते हैं। इस बात को ही ध्यान में रखकर चिकित्सा विज्ञान ने बूस्टर डोज को सहमति दे दी है। साथ ही, नए वैरिएंट से निपटने वाली वैक्सीन पर दिन रात काम हो रहा है और उम्मीद है कि 2022 के पहले तीन महीने में ही ओमिक्रॉन (Omicron) से निपटने वाली वैक्सीन बाजार में आ जाएगी।
हमें नहीं भूलना चाहिए पोलियो जैसी महामारी का टीका बनने में लगभग 20 साल का वक्त लगा था। जबकि, कोरोना वायरस आने के दो साल के भीतर लगभग आधी दुनिया का टीकाकरण (Vaccination) हो चुका है। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वायरस के नए रूप से निपटने के लिए आने वाले कई वर्षों तक बुस्टर डोज या नए वैक्सीन पर निर्भरता बनी रहने वाली है।
सीरम इंस्टीट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला (Adar Poonawalla) का कहना है कि आने वाले लगभग 10 सालों तक लोगों को लगभग हर साल वैक्सीन का बूस्टर डोज लेना पड़ सकता है। तब ही जाकर कोरोना के खिलाफ ऐसी इम्यूनिटी पैदा की जा सकती है जैसी सर्दी जुखाम के खिलाफ हमारे शरीर में होती है। फाइज़र (Pfizer) के सीईओ का भी ऐसा ही मानना है।
न्यू नॉर्मल बन जाएंगी ये चीजें
नए साल 2022 के साथ बूस्टर डोज लगवाना सालाना चलने वाली एक आम मेडिकल हैबिट बन सकती है जिसे न्यू नॉर्मल कहा जा सकता है। इसके अलावा दफ्तर, हवाई यात्राओं या महत्वपूर्ण मॉल, बाजारों या सार्वजनिक जगहों पर जाने के लिए वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट या आरटीपीसीआर टेस्ट (rt pcr test) रिपोर्ट का होना आधार कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस की तरह आम बात होगी। कई देशों में ऐसा होने भी लगा है।
2. हर्ड इम्यूनिटी: वैक्सीन आने से पहले और इसके बाद भी ऐसे लोगों की बड़ी तादाद है जो कोरोना वायरस (Coronavirus) का शिकार हो चुके हैं। इनमें से बहुत से लोग बीमार पड़े तो, बहुतों में कोई भी लक्षण नहीं दिखे। ऐसे सभी लोगों में वायरस से लड़ने की क्षमता अपने आप विकसित हो चुकी है जिसे हर्ड इम्यूनिटी कहते हैं। हर्ड इम्यूनिटी और टीकाकरण का दोहरा सुरक्षा कवच कोरोना के संक्रमण को फैलने से रोकने का काम करता है। साथ ही, पिछले दो साल में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इस बीमारी पर गंभीर शोध हुए हैं जिसके परिणामस्वरूप अब संक्रमित होने वालों के लिए इलाज की बेहतर सुविधा उपलब्ध है।
दो साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। अमेरिका से लेकर दुनिया के बेहद विकसित और अमीर देश इलाज के नाम पर प्रयोग कर रहे थे। प्लाज्मा थेरेपी (Plasma Therapy) और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन (HCQ) इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। डॉक्टरों ने खुद ही यह स्वीकार किया कि असल में इन दोनों उपायों से कोरोना को रोकने में कोई मदद नहीं मिली थी।
3. चिकित्सा विज्ञान का विकास: पोलियो के टीके की तुलना में कोरोना वायरस के खिलाफ टीके के विकास ने यह साबित कर दिया है कि पिछली सदी की तुलना में चिकित्सा विज्ञान ने काफी तरक्की की है। वायरस को पहचानने वाले आरटीपीसीआर और एंटीजन टेस्ट से लेकर सात वैक्सीन का बाजार में आना चिकित्सा विज्ञान की सफलता की कहानी बयां करता है। भारी मात्रा में वैक्सीन के उत्पादन की तकनीक को तेजी से विकसित करने का श्रेय भी चिकित्सा वैज्ञानिकों को ही जाता है।
अगले साल इतने लोग हो सकते हैं कोरोना के शिकार
इसमें कोई दो राय नहीं कि आने वाले साल में मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, लॉक डाउन, आरटीपीसीआर टेस्ट, वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट जैसी चीजें न्यू नॉर्मल होंगी। साथ ही, बूस्टर डोज और नए वैक्सीन की डोज भी सामान्य बात हो सकती है। लेकिन, इस बात की पूरी संभावना है कि 2022 में रूप बदलने के बावजूद कोरोना के संक्रमण की गति और इससे मरने वालों की संख्या में तेजी से कमी आएगी। द इकॉनमिस्ट के मुताबिक, आने वाले साल में कोरोना से मरने वालों की सालाना संख्या तीन से छह लाख के बीच होगी जो सामान्य इंफ्लूएंजा से होने वाली मौतों से भी कम होगी।
हालांकि, इन संभावनाओं के बीच इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारी-आपकी सावधानी और जागरुकता ही इस महामारी से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है तो, मॉस्क जरूर लगाएं, हाथ धुलते रहें और सामाजिक दूरी का पालन तब तक करें जब तक इस महामारी से पूरी तरह छुटकारा न मिल जाए।