निराला' की पुण्यतिथि पर क्रांतिकारी युग दृष्टा कवि थे 'निराला'!
भारत
चेतना मंच
15 Oct 2021 04:43 AM
विनय संकोची
'आनंद के समय जितना ही चुप रहा जाए आनंद उतना ही स्थायी होता है और तब ही उसकी अनुभूति का सच्चा सुख भी प्राप्त होता है।'
ये शब्द, ये विचार हैं छायावाद के सर्वाधिक सशक्त विद्रोही और स्वच्छंदतावादी दृष्टिकोण वाले महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के, जिनकी आज पुण्यतिथि है। पुण्यतिथि केवल नाम की क्योंकि निराला और उनकी कालजयी रचनाएं प्रलय काल तक साहित्य प्रेमियों के मन मस्तिष्क में जीवित रहेंगी।
युग कवि निराला को किसी ने 'महाप्राण' कहा, तो किसी ने छायावादी युग का 'कबीर' बताया। किसी ने निराला को सांस्कृतिक नवजागरण का 'बैतालिक' कहा, तो किसी ने सामाजिक क्रांति का 'विद्रोही कवि' माना। बहुतों ने बहुत नाम उपनाम दिए लेकिन 'निराला' हमेशा निराला ही बने रहे। निराला एक ही समय में एक साथ दार्शनिक, समाज सुधारक, विद्रोही, फक्कड़, अक्खड़, स्वाभिमानी और उदारचेता बने रहे।
आचार्य चतुरसेन शास्त्री के अनुसार - 'निराला काव्य के रूप में शक्ति के पुंज हैं। अडिग आत्मविश्वास से ओतप्रोत हैं, विपरीत विचारधाराओं के तूफानी थपेड़ों के बीच चट्टान की भांति स्थिर रहने की सामर्थ्य रखते हैं। उनकी अंत:शक्ति असीम है, उसी के बल पर वे विरोधियों के बीच बढ़ते जाते हैं और विरोध को पराजित करते हैं।'
निराला वास्तव में एक क्रांतिकारी युग दृष्टा कवि थे। निराला की कविता ने विद्रोह किया अन्याय से अत्याचार से और स्वच्छंद हुई रूढ़ियों से दासता से।
निराला के साहित्यिक संस्कारों का निर्माण बंगाल की धरती पर हुआ था। स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और रवींद्र नाथ टैगोर ने निराला की मानसिकता और भाव भूमि को प्रभावित किया था निराला अपना पूरा जीवन, पूरी शक्ति, पूरा श्रम देश के लिए लगा देने की इच्छा रखते थे और उनका यह भाव उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। निराला की कविताओं में जागरण का स्वर जगह-जगह दिखाई देता है
निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गंवाया।
निराला स्वच्छन्द प्रकृति के थे और स्कूल में पढ़ने से अधिक उनकी रुचि घूमने, खेलने, तैरने और कुश्ती लड़ने इत्यादि में थी। संगीत में उनकी विशेष रुचि थी। अध्ययन में उनका विशेष मन नहीं लगता था। सामाजिक और साहित्यिक संघर्षों को झेलते हुए भी इन्होंने कभी अपने लक्ष्य को नीचा नहीं किया।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की पहली नियुक्ति महिषादल राज्य में ही हुई। उन्होंने 1918 ई. से 1922 ई. तक यह नौकरी की। उसके बाद संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य की ओर प्रवृत्त हुए। 1922-23 के दौरान कोलकाता से रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित ‘समन्वय’ का संपादन किया, 1923 ई. के अगस्त से ‘मतवाला’ के संपादक मंडल में कार्य किया। इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय में उनकी नियुक्ति हुई, जहाँ वे संस्था की मासिक पत्रिका ‘सुधा’ से 1935 ई. के मध्य तक संबद्ध रहे। 1935 से 1940 तक का कुछ समय उन्होंने लखनऊ में भी बिताया। इसके बाद 1942 ई. से मृत्यु पर्यन्त इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य किया। निपट निर्धनता, उपेक्षा और अस्वस्थता की दशा में 15 अक्तूबर, 1961 ई. में महाप्राण निराला का देहांत हो गया।