Mobile Game Addiction: आज के डिजिटल दौर में ऑनलाइन गेम का बढ़ता क्रेज युवाओं के लिए एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। आज हम इस आर्टिकल में जानेंगे कि ऑनलाइन गेमिंग की लत, इसके खतरनाक चरणों और युवाओं के मानसिक, शारीरिक, शैक्षणिक और आर्थिक जीवन पर क्या असर पड़ रहा है।

आज के डिजिटल दौर में ऑनलाइन गेम (Online Game) अब सिर्फ टाइम पास नहीं रहे बल्कि धीरे-धीरे ये हमारी दिनचर्या का हिस्सा बनते जा रहे हैं। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने हर किसी के हाथ में पूरी दुनिया दे दी है लेकिन इसी के साथ कुछ गंभीर खतरे भी लेकर आए हैं। पबजी, फ्री फायर, बीजीएमआई, लूडो, फैंटेसी गेम्स और ऑनलाइन कैसीनो जैसे गेम्स आज खासकर युवाओं को अपनी ओर खींच रहे हैं। शुरुआत में यह मजेदार लगते हैं लेकिन कब ये लत बनकर भविष्य को नुकसान पहुंचाने लगते हैं इसका पता ही नहीं चलता।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में ऑनलाइन गेम के चक्कर में तीन बहनों ने छलांग लगा दी जिससे उनकी मौत हो गई। छलांग लगाकर जान देने वाली बहनों में से एक की उम्र 12, दूसरी की 14 और तीसरी की उम्र 16 साल थी। बताया जा रहा है कि, यह कदम लड़कियों ने एक ऑनलाइन कोरियन गेम का आखिरी टास्क पूरा करने के लिए उठाया।
ऑनलाइन गेमिंग के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है हर हाथ में स्मार्टफोन और हर जगह इंटरनेट। गेम बनाने वाली कंपनियां बेहद चालाकी से गेम डिजाइन करती हैं। रंगीन ग्राफिक्स, लेवल, इनाम, रिवॉर्ड और पैसे जीतने का लालच लोगों को बार-बार खेलने के लिए मजबूर करता है। इसके अलावा यूट्यूब, इंस्टाग्राम और गेमिंग इन्फ्लुएंसर यह दिखाते हैं कि गेम खेलकर नाम और पैसा दोनों कमाया जा सकता है। युवा इसी सपने के पीछे घंटों मोबाइल से चिपके रहते हैं।
ऑनलाइन गेमिंग की लत एक दिन में नहीं लगती। शुरुआत में व्यक्ति सिर्फ मनोरंजन के लिए खेलता है फिर रोज खेलने की आदत बन जाती है। उसके बाद बिना खेले मन नहीं लगता। रियल मनी गेम्स में हार-जीत का दबाव और बढ़ जाता है। हारने पर लगता है कि अगली बार जीत जाएंगे बस यही सोच इंसान को और गहराई में धकेल देती है। यहीं से तनाव, चिड़चिड़ापन और गुस्सा शुरू हो जाता है।
ऑनलाइन गेम कितने खतरनाक हो सकते हैं इसका सबसे डरावना उदाहरण ब्लू व्हेल गेम था। यह कोई आम गेम नहीं था बल्कि एक खतरनाक मानसिक खेल था जिसमें खिलाड़ियों को रोज नए-नए टास्क दिए जाते थे। शुरुआत छोटे कामों से होती थी लेकिन धीरे-धीरे खुद को नुकसान पहुंचाने और आखिर में जान देने तक की चुनौती दी जाती थी। इस गेम की वजह से कई देशों में बच्चों और युवाओं की जान चली गई। भारत समेत कई देशों में इस पर पूरी तरह बैन लगाना पड़ा।
ज्यादा ऑनलाइन गेम खेलने से युवाओं का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। नींद पूरी नहीं होती, हर वक्त बेचैनी रहती है, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आने लगता है। गेम में जीतने का दबाव और दूसरों से तुलना आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है। कई युवा खुद को असफल और बेकार समझने लगते हैं। धीरे-धीरे चिंता और डिप्रेशन जैसी समस्याएं जन्म लेने लगती हैं।
जो समय पढ़ाई, स्किल सीखने और खुद को बेहतर बनाने में लगना चाहिए वह गेम में चला जाता है। होमवर्क अधूरा रह जाता है, परीक्षा की तैयारी कमजोर हो जाती है और लक्ष्य से ध्यान हटने लगता है। कई प्रतिभाशाली छात्र सिर्फ गेमिंग की वजह से अपने सपनों से भटक जाते हैं। यह आदत करियर के रास्ते में बड़ी रुकावट बन जाती है।
लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, सिरदर्द और आंखों की रोशनी कमजोर हो सकती है। लंबे समय तक बैठकर खेलने से मोटापा, गर्दन दर्द और कमर दर्द जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। देर रात तक गेम खेलने से नींद खराब होती है जिससे शरीर की ताकत और इम्युनिटी कमजोर हो जाती है।
ऑनलाइन गेम से बचने के लिए सबसे जरूरी है समय पर नियंत्रण। माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए और उनसे खुलकर बात करनी चाहिए। युवाओं को खेल-कूद, एक्सरसाइज, योग, पढ़ाई और नई स्किल सीखने में समय लगाना चाहिए। अगर आदत ज्यादा बढ़ गई हो तो काउंसलिंग या विशेषज्ञ की मदद लेना बिल्कुल गलत नहीं है।