धर्म क्या है? श्रीमद्भगवद्गीता की दृष्टि से समझिए असली अर्थ
लेकिन क्या धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित है? क्या वह किसी पहचान का नाम है? यदि ऐसा होता, तो कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़े अर्जुन की दुविधा का समाधान इतने गहरे और सार्वकालिक रूप में संभव न होता। गीता धर्म को संकीर्ण परिभाषाओं से निकालकर जीवन की धुरी बना देती है।

What is Dharma according to the Gita? : धर्म - यह शब्द सुनते ही हमारे मन में पूजा-पाठ, आचार-विचार या किसी विशेष संप्रदाय की छवि उभर आती है। लेकिन क्या धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित है? क्या वह किसी पहचान का नाम है? यदि ऐसा होता, तो कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़े अर्जुन की दुविधा का समाधान इतने गहरे और सार्वकालिक रूप में संभव न होता। गीता धर्म को संकीर्ण परिभाषाओं से निकालकर जीवन की धुरी बना देती है।
भूमिका ही तय करती है उत्तरदायित्व
गीता में धर्म का सबसे सशक्त अर्थ है स्वधर्म, अर्थात अपनी प्रकृति और भूमिका के अनुरूप कर्तव्य। जब अर्जुन मोहवश युद्ध से पीछे हटना चाहते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें याद दिलाते हैं कि उनके सामने खड़ा प्रश्न केवल रिश्तों का नहीं, न्याय और अन्याय का है। यहाँ धर्म किसी कर्मकांड का आग्रह नहीं करता, बल्कि यह पूछता है आपकी भूमिका क्या है और उस भूमिका में आपका उत्तरदायित्व क्या है? स्वधर्म का अर्थ है अपने सत्य से समझौता न करना। यह भी स्पष्ट किया गया है कि परधर्म, चाहे वह कितना ही आकर्षक क्यों न लगे, अंततः व्यक्ति को भ्रमित करता है। अपनी प्रकृति के विपरीत चलना ही अधर्म की शुरुआत है। इसलिए गीता का धर्म बाहरी प्रदर्शन से अधिक आंतरिक ईमानदारी पर बल देता है।
धर्म और निष्काम कर्म
गीता का धर्म कर्म से जुड़ा है, लेकिन वह कर्म के परिणाम से बंधा नहीं है। “कर्मण्येवाधिकारस्ते” यह सूत्र केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है। धर्म वह है जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूर्ण समर्पण से निभाए, किंतु फल की चिंता से मुक्त रहे। आज के प्रतिस्पर्धी युग में सफलता को ही धर्म समझ लिया गया है। लेकिन गीता कहती है सफलता या असफलता धर्म का मापदंड नहीं; निष्ठा और नैतिकता ही उसका आधार हैं। जब कर्म स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक हित से जुड़ता है, तभी वह धर्म बनता है।
धर्म बनाम मोह
अर्जुन की दुविधा केवल युद्ध की नहीं थी वह मोह और करुणा के बीच उलझे थे। गीता इस सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करती है। करुणा धर्म का अंग है, पर मोह धर्म को धुंधला कर देता है। यदि न्याय के स्थान पर संबंधों को प्राथमिकता दी जाए, तो वह धर्म नहीं रह जाता। इस दृष्टि से धर्म का अर्थ कठोरता नहीं, बल्कि संतुलन है। धर्म वह है जो व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर व्यापक सत्य का साथ दे। यह संतुलन ही गीता की विशेषता है।
धर्म और आत्मबोध
गीता का एक गहरा आयाम आत्मा की अमरता से जुड़ा है। जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर या भूमिका तक सीमित समझता है, तब धर्म भी सीमित हो जाता है। किंतु जब वह स्वयं को व्यापक चेतना का अंश मानता है, तब उसका धर्म भी व्यापक हो जाता है। आत्मबोध व्यक्ति को भय से मुक्त करता है और भय से मुक्त होकर ही धर्म का पालन संभव है। धर्म, इस अर्थ में, बाहरी नियमों का पालन मात्र नहीं; यह भीतर की जागरूकता है। जब निर्णय आत्मकेंद्रित न होकर सत्यकेंद्रित होते हैं, तभी धर्म जीवित रहता है।
आधुनिक संदर्भ में धर्म
आज धर्म अक्सर पहचान की राजनीति और बहसों का विषय बन जाता है। गीता हमें याद दिलाती है कि धर्म विभाजन नहीं, समन्वय की शक्ति है। यह हमें सिखाती है कि अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठा यही धर्म है। कार्यालय में कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी, न्यायपूर्ण निर्णय लेने वाला प्रशासक, निष्पक्ष शिक्षक, संवेदनशील नागरिक ये सब गीता की दृष्टि में धर्म के पालनकर्ता हैं। धर्म कोई मंच नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। What is Dharma according to the Gita?
What is Dharma according to the Gita? : धर्म - यह शब्द सुनते ही हमारे मन में पूजा-पाठ, आचार-विचार या किसी विशेष संप्रदाय की छवि उभर आती है। लेकिन क्या धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित है? क्या वह किसी पहचान का नाम है? यदि ऐसा होता, तो कुरुक्षेत्र की रणभूमि में खड़े अर्जुन की दुविधा का समाधान इतने गहरे और सार्वकालिक रूप में संभव न होता। गीता धर्म को संकीर्ण परिभाषाओं से निकालकर जीवन की धुरी बना देती है।
भूमिका ही तय करती है उत्तरदायित्व
गीता में धर्म का सबसे सशक्त अर्थ है स्वधर्म, अर्थात अपनी प्रकृति और भूमिका के अनुरूप कर्तव्य। जब अर्जुन मोहवश युद्ध से पीछे हटना चाहते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें याद दिलाते हैं कि उनके सामने खड़ा प्रश्न केवल रिश्तों का नहीं, न्याय और अन्याय का है। यहाँ धर्म किसी कर्मकांड का आग्रह नहीं करता, बल्कि यह पूछता है आपकी भूमिका क्या है और उस भूमिका में आपका उत्तरदायित्व क्या है? स्वधर्म का अर्थ है अपने सत्य से समझौता न करना। यह भी स्पष्ट किया गया है कि परधर्म, चाहे वह कितना ही आकर्षक क्यों न लगे, अंततः व्यक्ति को भ्रमित करता है। अपनी प्रकृति के विपरीत चलना ही अधर्म की शुरुआत है। इसलिए गीता का धर्म बाहरी प्रदर्शन से अधिक आंतरिक ईमानदारी पर बल देता है।
धर्म और निष्काम कर्म
गीता का धर्म कर्म से जुड़ा है, लेकिन वह कर्म के परिणाम से बंधा नहीं है। “कर्मण्येवाधिकारस्ते” यह सूत्र केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है। धर्म वह है जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूर्ण समर्पण से निभाए, किंतु फल की चिंता से मुक्त रहे। आज के प्रतिस्पर्धी युग में सफलता को ही धर्म समझ लिया गया है। लेकिन गीता कहती है सफलता या असफलता धर्म का मापदंड नहीं; निष्ठा और नैतिकता ही उसका आधार हैं। जब कर्म स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक हित से जुड़ता है, तभी वह धर्म बनता है।
धर्म बनाम मोह
अर्जुन की दुविधा केवल युद्ध की नहीं थी वह मोह और करुणा के बीच उलझे थे। गीता इस सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करती है। करुणा धर्म का अंग है, पर मोह धर्म को धुंधला कर देता है। यदि न्याय के स्थान पर संबंधों को प्राथमिकता दी जाए, तो वह धर्म नहीं रह जाता। इस दृष्टि से धर्म का अर्थ कठोरता नहीं, बल्कि संतुलन है। धर्म वह है जो व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर व्यापक सत्य का साथ दे। यह संतुलन ही गीता की विशेषता है।
धर्म और आत्मबोध
गीता का एक गहरा आयाम आत्मा की अमरता से जुड़ा है। जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर या भूमिका तक सीमित समझता है, तब धर्म भी सीमित हो जाता है। किंतु जब वह स्वयं को व्यापक चेतना का अंश मानता है, तब उसका धर्म भी व्यापक हो जाता है। आत्मबोध व्यक्ति को भय से मुक्त करता है और भय से मुक्त होकर ही धर्म का पालन संभव है। धर्म, इस अर्थ में, बाहरी नियमों का पालन मात्र नहीं; यह भीतर की जागरूकता है। जब निर्णय आत्मकेंद्रित न होकर सत्यकेंद्रित होते हैं, तभी धर्म जीवित रहता है।
आधुनिक संदर्भ में धर्म
आज धर्म अक्सर पहचान की राजनीति और बहसों का विषय बन जाता है। गीता हमें याद दिलाती है कि धर्म विभाजन नहीं, समन्वय की शक्ति है। यह हमें सिखाती है कि अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठा यही धर्म है। कार्यालय में कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी, न्यायपूर्ण निर्णय लेने वाला प्रशासक, निष्पक्ष शिक्षक, संवेदनशील नागरिक ये सब गीता की दृष्टि में धर्म के पालनकर्ता हैं। धर्म कोई मंच नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। What is Dharma according to the Gita?











