धर्म-अध्यात्म : सच्चा भक्त भोगों का दास नहीं होता!
भारत
चेतना मंच
28 Nov 2025 09:16 PM
विनय संकोची
भगवान का अनन्य प्रेमी बनने में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता और सफलता है। यही मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है भोगों के प्रति आसक्ति, विषयों के प्रति आकर्षण। यह आसक्ति, यह आकर्षण जितना अधिक बढ़ेगा भगवान की ओर बढ़ने का मार्ग उतना ही अधिक कठिन होता चला जाएगा। इसका सीधा सा मतलब है भोगों में आसक्ति यानी भगवान से दूरी। भगवान ने भोगों को संपूर्ण दु:ख कलेश का उद्गम स्थान बताया है। गीता (5/22) में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एवते।
आध्यांतवंतः कौन्तेय न तेषु रमते बुध।।
हे कुंतीनंदन! इंद्रियों और विषयों के सहयोग से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं, वह आदि-अंत वाले और दु:ख के ही कारण हैं, अतः विवेकशील पुरुष उनमें रमण नहीं करता।
भोगों के कारण मनुष्य को दु:ख मिलते हैं, लेकिन फिर भी वह भोगों की ओर ही भागता है। बड़े-बड़े विद्वान, शास्त्रज्ञ, संसार की क्षणभंगुरता के प्रति समाज को चेताने वाले, विषयों की सार्वजनिक रूप से आलोचना-निंदा करने वाले निजी जीवन में भोगों के जाल में फंसे दिखाई देते हैं। साधारण मानव की बात क्या कहें विश्वामित्र, पराशर, सौभरि सरीखे महान तपस्वी महर्षि भी विषयासक्ति के सामने असहाय हो गए और भोगों के प्रबल प्रभाव में बह चले।
विद्वानों और शास्त्रों का स्पष्ट रूप से कहना है जो अपने बल पर भोगों से मुक्ति का प्रयास करता है, उसे असफलता ही हाथ लगती है। अपने बल पर भोगासक्ति पर विजय प्राप्त करना आसान नहीं है। इसके विपरीत भगवान को अपना बल मानने वाला भक्त भोगों से कभी पराजित नहीं होता है। वह प्रभु कृपा बल से विजयी होता है। भगवान की कृपा से भक्तों की विषयासक्ति का जड़ से इलाज हो जाता है। भगवान ने गीता में साफ साफ कहा है - 'मेरे भक्तों का कभी भी पतन नहीं होता।' इसका सीधा सा अर्थ है कि विषय भोगों से मुक्ति का एक सरल सहज उपाय है, भक्त हो जाना, भगवान की भक्ति में लीन हो जाना लेकिन इसके लिए सच्ची भक्ति की आवश्यकता होगी, आधे अधूरे मन से की गई भक्ति लक्ष्य प्राप्ति में सहायक नहीं हो सकती है।
विषयासक्ति से मुक्ति तभी संभव है जब सच्ची भक्ति की जाए। सच्ची भक्ति तब होती है जब ईश्वर से सुख एवम् अनुकूलता की आकांक्षा न की जाए और दु:ख प्रतिकूलता व प्रेम नाश का कारण उपस्थित होने पर भी प्रभु चरणों में मन रमा रहे, विचलित ना हो, डिगे नहीं। भगवान के प्रभाव का ज्ञान होने पर व्यक्ति ज्ञानी भक्त होता है और परमात्मा के स्वभाव का भाव-ज्ञान होने पर मनुष्य प्रेमी भक्त बन जाता है। प्रेमी भक्तों को ही सच्चा भक्त कहा गया है और ऐसे ही भक्त भोगासक्ति के जाल जंजाल से कभी नहीं फंसते हैं।