जिसका मन भगवान में लगा रहता है उसे सामान्य मनुष्य समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह तो भक्त है, भगवान के दिव्य दरबार का सदस्य है। वही भक्त जिसकी दृष्टि भगवान पर वैसे ही लगी रहती है, जैसे लोभी की दृष्टि धन पर और कामी की कामिनी पर लगी रहती है ।
भक्तों का महत्व विद्वानों और शास्त्रों द्वारा कही गई इस बात से प्रतिपादित होता है कि भगवान के हृदय में भक्तों का इतना आदर है, जितना आदर करने वाला संसार में कोई दूसरा है ही नहीं, हो ही नहीं सकता। इससे भी दो कदम आगे बढ़कर शास्त्र कहते हैं - 'भक्तों को भगवान की सेवा में आनंद आता है और भगवान भक्तों की सेवा कर आनंदित होते हैं।'
सच तो यह है कि भगवान जीव मात्र से केवल भक्ति का नाता मानते हैं। भगवान भक्ति से संतुष्ट होते हैं, गुणों से नहीं। श्रीमद् भगवत गीता में भगवान ने भक्ति के संबंध में कहा है - 'मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझ को प्रणाम कर, इस प्रकार आत्मा को मुझ में नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको प्राप्त होगा।
आज संसार में स्वयं को भक्त कहने वाले असंख्य हैं, लेकिन उनमें से कितने ऐसे हैं जो भक्त और भक्ति की कसौटी पर खरे उतरने योग्य गुणों को से परिपूर्ण हैं। कितने ऐसे हैं जो भगवान को अपना सब कुछ अर्पित करने को तैयार हैं। आज अधिकांश भक्त ऐसे हैं जो भगवान को न अपना धन अर्पित कर सकते हैं, न अपना मन अर्पित कर सकते हैं, जो भाव भी आधे अधूरे अर्पित करते हैं - वे अपने आपको भक्त सिद्ध करके पुण्यात्मा भगवद भक्तों की श्रेणी में खड़ा होना चाहते हैं। यह कहा जाता है कि भगवान भाव के भूखे होते हैं। सही बात है लेकिन भाव सच्चे होने चाहिएं, भाव अच्छे होने चाहिएं, भाव निर्मल, उज्जवल, पारदर्शी होने चाहिएं तभी भगवान उन्हें स्वीकार करते हैं।
भगवान को पाने का सबसे सरल और सहज उपाय भक्ति है। परंतु मंदिर में जाकर जल, पुष्प, प्रसाद अर्पित करने, घंटा-शंख बजाने, आरती घुमाने को भक्ति नहीं कहा जा सकता। सच्ची भक्ति के लिए निर्मल हृदय भक्तों को इन उपायों की आवश्यकता ही नहीं होती है। भक्त तो भगवान को सदैव अपने साथ महसूस करता है और अपना प्रत्येक कर्म प्रभु को अर्पित करता चलता है। उसे इस पुण्य कार्य के लिए न ही स्थान विशेष की आवश्यकता होती है और न ही खास मुहूर्त की। भक्त पूरी तरह भगवान का हो जाता है और भगवान भक्त के हो जाते हैं। कोई भेद नहीं रहता, कोई मतभेद-मनभेद नहीं रहता। दोनों के बीच अटूट संबंध जुड़ जाता है, जो न स्वयं टूटता है और न ही भक्त को किसी की भी परिस्थिति स्थिति में टूटने देता है। जब यह सुखद अनुभव हो तब जानना चाहिए कि व्यक्ति में भक्ति भाव जाग गया है, वह सच्चा भक्त हो गया है।
अपनी इच्छा पूर्ति, अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए भगवान के दर पर मत्था टेकना भक्ति नहीं होती, ऐसी भक्ति से बचना चाहिए। यह स्वयं को और परमात्मा को धोखा देना है, जो कि उचित नहीं है। महर्षि शांडिल्य के अनुसार - ' ईश्वर में परम अनुराग, परम श्रद्धा, परम विश्वास, परम आस्था ही सच्ची भक्ति है और यही सच्ची भक्ति जन्म मरण रूपी भव रोग से मुक्ति के लिए परम औषधि है।'
ईश्वर की भक्ति में आयु, रूप, विद्या, धन, जाति और बल का कोई महत्व नहीं है। भगवान का ध्यान सदाचार और सद्गुणों की तरफ भी नहीं जाता है। प्रभु तो केवल उस भाव को देखते हैं जिसे प्रेम कहा जाता है। कहीं एक श्लोक पढ़ा था, जिसका भावार्थ है - 'व्याध का आचरण कौन सा अच्छा था, ध्रुव की आयु ही क्या थी, गजेंद्र के पास कौन सी विद्या थी, विदुर की कौन सी उत्तम जाती थी, उग्रसेन का कौन सा पुरुषार्थ था सुदामा के पास कौन सा धन था लेकिन यह सभी प्रभुकृपा के अधिकारी बने और अधिकारी इसलिए बने क्योंकि इनकी भक्ति सच्ची थी और भक्ति में प्रेम रस की निर्मल धारा प्रवाहित थी। भगवान की कृपा के लिए आडंबर नहीं, सच्ची भक्ति चाहिए एक सच्चे प्रेमी वाला समर्पण चाहिए।