धर्म-अध्यात्म : परमात्मा के अतिरिक्त कोई अपना नहीं!
भारत
चेतना मंच
29 Oct 2021 04:36 AM
विनय संकोची
अपना का शाब्दिक अर्थ है - निज का, निजी, स्वकीय, स्वयं का, आत्मीय। अपना से ही अपनापन, अपना-पराया और अपनाना बनता है। सबसे पहले अपना के अर्थ 'निज का' पर विचार करते हैं। व्यक्ति का 'निज का' है ही क्या? न यह तन उसका, न यह धन संपत्ति उसकी है, न संबंध उसके हैं, न संसार उसका है, तो फिर उस का 'निज का' है क्या, कुछ भी नहीं। सब कुछ तो उस परमपिता परमात्मा का दिया हुआ है, जिसे व्यक्ति अपना मान बैठता है, उसमें से वह कुछ भी तो अपने साथ लेकर जा नहीं सकता है।
यदि धन-संपत्ति, पत्नी, पुत्र-पुत्री, माता-पिता, भाई-बहन मनुष्य के होते, तो वह मृत्यु के समय उन्हें अपने साथ लेकर जा सकता। परंतु वह ऐसा कर नहीं पाता है, ऐसा कर ही नहीं सकता है, इसलिए इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि हमारा अपना कुछ है ही नहीं। यह देह भी नहीं जिस पर हम अभिमान करते हैं और उसकी तुष्टि-पुष्टि के लिए गलत सही काम करते हैं। सत्य तो यही है कि न तो जीवन हमारा है और न ही जीवन में कोई हमारा है। हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाना है, यही शाश्वत सत्य है तो फिर अपना रहा ही क्या?
जान लें अपना है तो सिर्फ वही परमात्मा जो हमें जीव-रूप इस धरा धाम पर भेजता है। वही अपना है, इसीलिए आत्मा के रूप में हमारे भीतर विराजित होकर हमें नियंत्रित-निर्देशित करता है। भीतर बसा हुआ परमात्मा हमारे को अपने से एक पल को भी अलग नहीं रखता है। वही हमारा अपना है और हम वास्तव में केवल उसके हैं। यह ऐसा संबंध है जो अटूट है, अलौकिक है, शाश्वत है।
हमारी योग्यता, पात्रता और अधिकारिता आदि उस अपनेपन के सामने कुछ भी नहीं है, जो कहता है- 'मैं भगवान का हूं, भगवान मेरे हैं।' इस अपनेपन के आगे सब गौण हैं। शास्त्र कहते हैं - भगवान में अपनापन सबसे सरल सुगम और श्रेष्ठ साधन है। सच तो यही है कि भगवान के अतिरिक्त मेरा कोई नहीं है ऐसा मान लेना, यह बात ह्रदय की गहराइयों में उतार लेना ही असली भगवत भक्ति है।
भगवान के साथ अपनापन, भगवान के साथ हमारा नाता स्वतः स्वाभाविक है और हमें इस सत्य को स्वीकार करते हुए स्वयं को भगवान को ही अपना मान लेना चाहिए। हमें भगवान का हो जाना चाहिए, जो अपना है वह तो हमारे भीतर है केवल उसे महसूस करना है क्योंकि हम संसार को अपना मानते हैं इसलिए अपने अंदर बैठे अपने को न महसूस कर पाते हैं, न देख पाते हैं। हम पूरी उम्र लोक से जुड़े रहकर 'लौकिक' को ही अपना मानते हुए परमात्मा से दूरी बनाकर 'अलौकिक' से वंचित रह जाते हैं।
'अपना' से 'अपनाना' बनता है। हम वास्तव में उसे अपनाते हैं, जो हमें प्रिय होता है या फिर जिससे हमारा कोई स्वार्थ पूरा होता है। हम किसी भी अप्रिय को प्रिय मानकर गले से नहीं लगाते हैं। अपनापन भी वहीं प्रकट होता है, जहां प्रियता हो। जिसे हम अपना मानेंगे उसी से अपनापन भी मानेंगे और अपनापन जताएंगे भी। जताना मनुष्य की प्रवृत्ति है, शौक है। अधिकांश लोग इस शौक का शिकार होते हैं, बिना जताए उनमें संतुष्टि का भाव आता ही नहीं है।
भगवान को हम प्रिय हैं, इसीलिए वह हमें अपनाता है, हमसे अपनापन मानता है। हमें भगवान की कृपा और भगवान तो प्रिय हैं लेकिन अपनापन हम नश्वर संसार से मानते हैं यही गड़बड़ है। चाहते सब कुछ भगवान से हैं, मांगते, हाथ फैलाते भगवान के सामने हैं, परंतु उसके साथ अपनापन मानते नहीं हैं। हम दो नावों पर सवार रहते हैं, इसी कारण से हमारी नाव डगमगा जाती है और हमारा चित्त स्थिर नहीं रह पाता है।