धर्म - अध्यात्म : सदाचार द्वारा प्रकट होती है धार्मिकता!
भारत
चेतना मंच
04 Nov 2021 06:21 AM
विनय संकोची
सुख और शांति से जीवन जीने के जो नियम हैं, वही धर्म है। वेदों में एक शब्द आता है 'ऋतु' और इसका अर्थ है - विधान। इसका अर्थ है कि धर्म का मार्ग है जेड विधान। चीनी विद्वान लाओत्से ने वेदों के 'ऋतु' का नाम बताया 'ताओ'-जिसका अर्थ है - नियम। 'ऋतु' और 'ताओ' के आधार पर यह बात साफ हो जाती है कि धर्म का मतलब है, ऐसे नियम जिनका पालन करने पर सुख, शांति, समृद्धि, संपन्नता, उपलब्ध होंगे और नियम विधान का पालन न करने पर, उनकी उपेक्षा करने पर, दु:ख और अशांति को प्राप्त होंगे।
मनुष्य ऐहिक और पारलौकिक सुख और शांति की स्वाभाविक चाहत के साथ संसार में आता है। मनुष्य सुख और शांति से जीना चाहता है, लेकिन यह तभी संभव है जब वह विधान - नियम के रूप में धर्म का पालन करे। मनुष्य सुख तो चाहता है, शांति की इच्छा तो रखता है लेकिन नियमों के बंधन में बंधना उसे अच्छा नहीं लगता है। वह पंख फैलाकर स्वतंत्र रूप से उड़ना चाहता है, यही चाहत उसके दु:खों और अशांति का कारण बन जाती है।
धर्म का सबसे विशेष उपयोगी तत्व उसका आचरण है। जब मनुष्य के शुभ संकल्प दैनिक कार्यों में और उसके व्यवहार में प्रकट होते हैं तो वह सदाचार कहा जाता है। सदाचार का अर्थ है उत्तम या उपयोगी आचरण। यह निर्विवाद सत्य है कि धार्मिकता सदाचार द्वारा प्रकट होती है।
मनुष्य का जीवन गुण दोषों से भरा पूरा है जितने अंशों में गुण होते हैं, उतने ही अंशों में दोषों को भी मानना चाहिए। यह मनुष्य के आचरण और व्यवहार पर निर्भर करता है कि वह गुणों को प्रकट कर प्रशंसा का पात्र बनता है या फिर दोषों को उजागर करता है। अच्छे बुरे धार्मिक अधार्मिक की यही कसौटी है। चाणक्य नीति कहती है - 'सोने की परख जैसे कसौटी पर कसकर, काटकर, पकाकर और पीटकर की जाती है, वैसे ही पुरुष की परख उसके ज्ञान, त्याग, कुल और शील से की जाती है।'
ज्ञान, त्याग और शील आचार - सदाचार के ही प्रमुख अंग हैं। सदाचार को ऋषि-मुनियों ने परम धर्म कहा है और वेदों ने विधान पालन को धर्म की संज्ञा से विभूषित किया है। आचरण और सदाचरण विधान पालन के बिना संभव नहीं है। इस दृष्टि से दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं और पृथक - पृथक व संयुक्त रूप से धर्म कहलाते हैं।
ज्यों - ज्यों मनुष्य का विकास होता है, त्यों - त्यों आचरण पुष्ट होता है और गुणों में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। सदाचारी मनुष्य ही सही दिशा में आगे बढ़ने का सार्थक प्रयास करता है। सही दिशा में आगे बढ़ने का अर्थ है, विकारों से मुक्त और गुणों का सद्कार्यों के माध्यम से प्रकाशित होना।
सद्कर्मों से ही पता चलता है कि मनुष्य देवत्व के कितने निकट पहुंच गया है और मनुष्य के बुरे कर्म ही घोषणा करते हैं कि वह पतन की खाई के कितने पास पहुंच गया है। मनुष्य के जीवन शिखर की पताका बनने का निर्णय भी इसके सत्कर्म ही करते हैं। सदाचार का सीधा संबंध विचार से है पहले विचार तब आचार इस प्रकार 'असतो मा सद्गमय'- असत्य विचारों से निकलकर हम चलते हैं सद्विचारों की ओर। सद्विचारों की ओर चलना ही प्रकृति का नियम है, विधान है और इसका अनुपालन ही धर्म है। मन को संयम में बांधकर आत्म संयम तथा अभ्यास सद्विचार धर्म का पालन करना कठिन नहीं है, परंतु प्रयास तो करना ही होगा। प्रयास पथ पर अग्रसर होने की रूचि का विकसित होना धार्मिकता की ओर बढ़ने का सबसे अच्छा संकेत है।