धर्म-अध्यात्म: शिव को सर्वाधिक प्रिय है रुद्राक्ष वृक्ष!
भारत
चेतना मंच
07 Oct 2021 10:28 AM
विनय संकोची
सृष्टि के आरंभ से प्राणी जगत और वनस्पति का अटूट संबंध रहा है। वृक्षों को पुराण आदि प्राचीन ग्रंथों ने मनुष्य का गुरु, जीवनदाता और संरक्षक कहा है। मनुष्य तो जीवित ही इसलिए है कि परमात्मा ने उसे उपहार में वृक्ष दिए हैं। एक समय था जब वृक्षारोपण को धर्म की संज्ञा दी जाती थी, इसे धर्म का अभिन्न अंग माना जाता था। वृक्षारोपण के संबंध में महाभारत में उल्लेख मिलता है - ' वृक्ष फूलों से देवताओं का, फलों से पितरों का व छाया से अतिथि का सत्कार करते हैं, इसलिए वृक्ष पूजनीय हैं।'
इन्हीं पूजनीय वृक्षों में एक अलौकिक वृक्ष है - रुद्राक्ष, जिसका संबंध भगवान शिव से है। शिव को वेद ने रुद्र कहा है और यह रुद्र का सर्वाधिक प्रिय वृक्ष है। रुद्राक्ष जो दिव्य आध्यात्मिक और औषधीय गुणों का स्रोत है, भगवान रुद्र को शास्त्रों ने चिकित्सा का संरक्षक कहा है। इन्हीं स्वास्थ्य संरक्षक रुद्र ने एक बार 1000 वर्षों तक समाधि में रहने के बाद दु:खी मानव की करुण पुकार सुनकर नेत्र खोले, तो उनके नेत्रों से करुणा जलबिंदु छलक उठे। जलबिंदु धरती पर जहां - जहां गिरे, वहां - वहां अलौकिक वृक्ष प्रकट हुआ जिसे शास्त्रों ने नाम दिया - 'रुद्राक्ष' अथवा 'रूद्र तरु'।
प्राचीन भारतीय धर्म ग्रंथों और शास्त्रों जैसे शिव पुराण, श्रीमद् देवी भागवत, पद्म पुराण, लिंग पुराण, अष्टमालिकोपनिषद, निर्णय सिंधु, महाकाव्य संहिता, रुद्राक्ष जावालोपनिषद, वृज्जबालोपनिषद, शिवस्वरोदय और सर्वोल्लास तंत्र आदि में रुद्राक्ष का उल्लेख मिलता है।
पुराणों के अनुसार रुद्राक्ष वृक्ष गोड भूमि में विकसित होता है। वर्तमान में यह क्षेत्र एशिया के दक्षिणी भाग, गंगा के तराई क्षेत्र से लेकर हिमालय की पहाड़ियों पर नेपाल के मध्य क्षेत्र तक माना जाता है। मनीला से प्रारंभ होकर म्यांमार के समतल भाग और नीची पहाड़ियों से होता हुआ रुद्राक्ष वृक्ष बंगाल, असम, उत्तर पूर्वी राज्यों, बांग्लादेश और भूटान तक यह क्षेत्र विस्तारित है। यह दिव्य वृक्ष उत्तर पूर्व एशिया के जावा, कोरिया, मलेशिया, ताइवान, चीन, आदि देशों के साथ ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, पापुआ न्यू गिनी में भी पल्लवित पुष्पित होता है।
आज भारत का यह वृक्ष भारत में ही नहीं दिखाई पड़ता है, जबकि एक समय में मथुरा, अयोध्या, हरिद्वार, काशी आदि में यह बहुतायत में पाया जाता था। इन धर्म नगरियों में रुद्राक्ष वृक्ष की उपस्थिति की गवाही तो शिव महापुराण भी देता है। इन क्षेत्रों में रुद्राक्ष वृक्ष स्वत: समाप्त नहीं हुआ बल्कि उसे समाप्त करने के लिए धार्मिक, सामाजिक षडयंत्र भी संभवत: रचा गया। रुद्राक्ष के लुप्त होने के कारणों पर शोध की आवश्यकता है। वैसे इन धर्म क्षेत्रों में रुद्राक्ष वृक्ष की उपस्थिति के शास्त्र सम्मत प्रमाणों से यह तो सिद्ध हो जाता है कि यह अलौकिक वृक्ष पहाड़ों की शीतलता में ही नहीं बल्कि किसी भी जलवायु में पाला जा सकता है।
रुद्राक्ष वर्ष आध्यात्मिकता का प्राकृतिक स्वरूप है, जिसका उपयोग आदिकाल से आध्यात्मिक शक्तियों के जागरण, आत्मविश्वास में अप्रत्याशित वृद्धि और सकारात्मकता के व्यक्तिगत अनुभव के उपरांत स्वीकारा है कि रुद्राक्ष वृक्ष के सामीप्य से आत्मविश्वास की समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि रुद्राक्ष वृक्ष की पत्तियों, फल, लकड़ी तथा छाल सभी में औषधीय गुण पाए जाते हैं। वर्तमान विज्ञान भी मानता है कि रुद्राक्ष वृक्ष के अवयव अनेक बीमारियों का सफल उपचार करने में सक्षम हैं। जिनमें मिर्गी, सिरदर्द, अस्थमा, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा, मानसिक तनाव, हृदय उत्तेजना आदि सामान्य में गंभीर रोग शामिल हैं। फिलीपींस में एक शोध हुआ है जिसके अनुसार रुद्राक्ष वृक्ष की छाल बढ़ी हुई तिल्ली के उपचार का अचूक उपाय है।
रुद्राक्ष की पत्तियां एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर होती हैं, जिसके कारण इनके माध्यम से किसी भी घाव को आसानी से ठीक किया जा सकता है। माइग्रेन का उपचार भी पत्तियों से संभव है। शिलांग में हुए एक वैज्ञानिक शोध से यह सिद्ध हुआ है कि रुद्राक्ष की पत्तियां एंटीऑक्सीडेंट है अर्थात अधिक प्राणवायु का उत्सर्जन करती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार रुद्राक्ष वृक्ष का सर्वांग आयुवर्धक है। इससे रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है रक्त की कमी बुखार, पीलिया, गठिया, ब्रोंकाइटिस, सर्दी जुकाम आदि में भी रुद्राक्ष चिकित्सक की भूमिका निभाता है। रुद्राक्ष वृक्ष के दाने अवसाद रोधी हैं, जो आज की सबसे बड़ी समस्या है। साथ ही पवित्रता के कारण यह पूजन अर्चन वंदन और साधना में तो काम आते ही हैं।