हम इस बात को जानते हैं कि कण-कण में भगवान हैं। हमारे बाहर भीतर सब जगह भगवान हैं। हम भगवान के बच्चे हैं। भगवान के अंश हैं, इसलिए परमात्मा कभी हमें भुलाता नहीं है। कभी-कभी मनुष्य ही भगवान को जरूर भुला कर स्वयं को अपने भाग्य का विधाता मान बैठता है। परंतु मनुष्य का यह भ्रम, विधाता होने का भ्रम टूटता अवश्य है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं : "ममैवांशो जीवलोक जीवभूत: सनातन:" - भावार्थ यह है कि इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है। जीव देह में रहता है, शरीर को जीवलोक कहा गया है। शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, शरीर में रहने वाले मेरा स्वरूप है।
भगवान श्रीकृष्ण की यह बात सर्वथा विचारणीय है - 'शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, शरीर में रहने वाला मेरा स्वरूप है'- देह में रहने वाला अर्थात् आत्मा ही परमात्मा का रूप है और मनुष्य उसे ही पहचान नहीं पाता है। सांसारिक मोह माया में उलझी देह अपने भीतर झांक कर देख पाने का समय तक निकाल नहीं पाती है और अलगाव पैदा हो जाता है। अलगाव उससे जो देह के भीतर विराजमान है, जो परमात्मा का अंश है, उसका वास्तविक स्वरूप है। यह अलगाव ही तो परमात्मा को भुलाना है, विस्मृत करना है। जैसे-जैसे अलगाव बढ़ता है वैसे-वैसे मनुष्य परमात्मा स्वरुप आत्मा से आत्मतत्व से दूर होता जाता है, वैसे-वैसे उसका अहंकार सिंचित होता है।
आत्मतत्व को विस्मृत कर मनुष्य स्वयं को अपना भाग्य विधाता मान बैठता है, जो किया मैंने किया, जो कर रहा हूं मैं कर रहा हूं और जो करूंगा मैं ही करूंगा, यह भाव उसे परमात्मा से, अपनी आत्मा से दूर करता चला जाता है। लेकिन वह अभागा यह नहीं जानता कि उसके हाथ में तो कुछ है ही नहीं। न बिना परमात्मा की मर्जी के वह कर्म कर सकता है और न ही कर्म का फल निर्धारित कर सकता है।
इस सत्य को स्वीकार करना ही होता है कि बिना परमात्मा की इच्छा के मनुष्य एक अतिरिक्त सांस तक नहीं ले सकता है मनुष्य का प्रत्येक कर्म, मनुष्य की प्रत्येक गतिविधि - हलचल परमात्मा के अधीन है।
जो मनुष्य अपने अंदर बाहर परमात्मा को महसूस करता है, वह सदैव प्रसन्न रहता है। वह न केवल स्वयं प्रसन्न रहता है अपितु अन्य तमाम लोगों को भी प्रसन्न रखने का सार्थक प्रयास करता है, क्योंकि वह जानता है कि उसका प्रत्येक प्रयास परमात्मा का कार्य है, परमात्मा के आदेश पर ही वैसा कर पा रहा है।
देह में बैठा परमात्मा का वास्तविक स्वरूप इस देह को भी धन्य कर देगा, लोग इस देह को भी सम्मान के साथ याद करेंगे, यूं ही भुला नहीं पाएंगे। यह सब परमात्मा की कृपा से ही होता है और परमात्मा कृपा उस पर करता है, जो परमात्मा को साथ हमेशा अपने साथ रखना चाहता है, हर पल परमात्मा के साथ रहना चाहता है। परमात्मा अपने किसी बच्चे को दु:खी देखना नहीं चाहता है। मनुष्य अपने कर्मों से दु:खी होता है। जिन कर्मों से मनुष्य स्वयं दु:ख पाता है, उनसे परमात्मा को भी दु:ख पहुंचाता है। यह परमपिता परमात्मा के प्रति अपराध है। इस अपराध से बचा जा सकता है, अच्छे कर्म करके और यह मुश्किल नहीं है। प्रयास करके देखिए, परमात्मा सफलता प्रदान करेगा।