धर्म-अध्यात्म : सदा चैतन्य रहते हैं रोज नये सपने देखने वाले!
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 02:26 AM
विनय संकोची
अतीत का शाब्दिक अर्थ है बीता हुआ जो बीत गया। इसे यूं भी कह सकते हैं, जो लौटकर नहीं आता, जो याद बन जाता है। अतीत अच्छा और बुरे दोनों तरह का होता है। अच्छा वह इसे बार-बार याद करने की इच्छा होती है, जिसे व्यक्ति अपने वर्तमान और भविष्य में भी देखना और दोहराना चाहता है। बुरा अतीत वो है जिसे व्यक्ति भूलना तो निश्चित रूप से चाहता है, लेकिन भूल नहीं पाता है। व्यक्ति अपने बुरे अतीत का साया अपने आज और आने वाले कल पड़ने नहीं देना चाहता है। व्यक्ति डरता है अपने अतीत की उन घटनाओं से, जिन्होंने उसके जीवन में कष्ट और कुंठा का विष घोल दिया था। वह डरता है अपने बुरे अतीत के उन पलों से, जिन्होंने उसे अपनों से ही नहीं खुद अपने से भी दूर कर दिया था। ऐसे अतीत को एकदम भुला देना चाहता है, लेकिन कुछ भी भूल नहीं पाता है, न तो गुलाब की महक न कांटों की चुभन।
अब एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या अच्छा अतीत व्यक्ति का आज और आने वाला कल संभालने की क्षमता रखता है? क्या अतीत व्यक्ति के वर्तमान को सकारात्मक विचार देने में कोई भूमिका नहीं निभाता है। इस बिंदु पर व्यक्ति के सोच की एक बड़ी भूमिका होती है। कल जो हुआ बुरा हुआ यदि उसे व्यक्ति दिल से लगा कर बैठ जाए और सोचे कि उसके साथ अच्छा हो ही नहीं सकता तो उसका यह नकारात्मक सोच उसके वर्तमान और भविष्य को बिगाड़ सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। नकारात्मकता को स्वीकार अंगीकार करके कोई व्यक्ति अपने भविष्य को नहीं संवार सकता, इस प्रयास में कुंठा और अवसाद का शिकार जरूर हो सकता है।
इसके विपरीत यदि व्यक्ति अतीत में घटित कष्टकारी रही घटनाओं का चिंतन करे, मंथन करे और उन कारणों की तलाश करे जिससे उसका अप्रिय हुआ तो वर्तमान में ही नहीं आने वाले समय में भी उन कारणों से स्वयं को बचाता हुआ सुख पूर्वक जीवन जी सकता है। अपने अतीत से चिपके रहना भी व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक विकास में अवरोध का कारण बनता है, उसके स्वभाव उसके व्यवहार को प्रभावित करता है। व्यक्ति का व्यवहार उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थिति को सुनिश्चित करता है। सकारात्मक सोच से सब कुछ बदला जा सकता है सब कुछ।
अगर मैं कहूं कि स्वर्णिम अतीत भी वर्तमान और भविष्य को बिगाड़ सकता है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसका कारण यह है कि यदि व्यक्ति अपने अच्छे अतीत के पीछे छुप कर बैठा रहेगा तो वह आलसी हो सकता है। वह अवसाद ग्रस्त हो सकता है। कोई सोचे कि कल हम इतने संपन्न थे कि दादाजी को जूतियां भी नौकर पहनाया करते थे। उनकी एक आवाज पर सारा गांव इकट्ठा हो जाता था। उनके नाम का सिक्का चलता था। यदि बीते कल की स्थिति में व्यक्ति स्वयं को, अपने अहम को देखते हुए आज में जीता है तो वह सामान्य नहीं रह सकता, क्योंकि आज उसकी उसके परिवार की सामाजिक, आर्थिक स्थिति अतीत जैसी नहीं है। लेकिन वह व्यवहार वैसा ही करना चाहता है अथवा करता है जैसा कि उसके पूर्वज करते रहे थे। सब गड़बड़ हो जाता है और इस गड़बड़ी का सबसे बड़ा कारण अतीत से चिपके रहना है।
अतीत से चिपके रहने वाले लोग जल्दी बूढ़े होते हैं, क्योंकि उनकी सोच विकसित नहीं होती, वे अतीत के माया जाल में भटक कर अपनी ऊर्जा को नष्ट करते रहते हैं। इसके विपरीत रोजाना नए-नए सपने देखने वाले लोग सदैव जवान बने रहते हैं क्योंकि उनके मन पर अतीत का बोझ नहीं होता है, जिससे वह हमेशा नया सोचने और नया करने को स्वतंत्र होते हैं।