धर्म - अध्यात्म : आत्मा की आवाज़, परमात्मा की आवाज़
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 02:08 AM
विनय संकोची
जीवन के बंधन और मोक्ष का कारण मन है। और मन के भीतर का संसार मानव स्वयं निर्मित करता है। राम और रावण की प्रवृत्ति में से एक का चुनाव मन ही करता है। संसार की चकाचौंध में पड़ा हुआ मानव मन के बहकावे में आ जाता है, वह परमात्मा के सामने समर्पण की भावना से परिपूर्ण दिखाई देता है मगर उसके मन का संसार अहंकार से भरा रहता है तन-मन-धन सब तेरा का भाव दिखाने वाले जीव के भीतर के भाव तो प्रभुता छोड़ना ही नहीं चाहते हैं। अर्थात सत्ता स्वीकार करने के बावजूद भी अहंकार और स्वार्थ साफ दिखाई देता है। अहंकार और स्वार्थ पूर्ण प्रार्थना से जीवन तो रूपांतरित होता ही नहीं, साथ ही परमात्मा का साक्षात्कार भी संभव नहीं हो पाता है।
जीवन को पतन के मार्ग पर ले जाने वाले मन के भाव मैं और मेरा ही हैं। जब मैं और मेरा का अहंकार मानव के जीवन से निकल जाता है, तभी साधना का पथ प्रशस्त होता है। परमात्म चिंतन और साधना में लगे जीव को पता चलता है कि सत, चित्त, आनंद स्वरूप परमात्मा द्वारा निर्मित सुंदर संसार दु:ख का कारण नहीं है। बल्कि दु:ख का एकमात्र कारण है, मन का संसार, जिस का निर्माता मनुष्य स्वयं है।
मन के संसार में विकृति भरी हुई है। जब तक मन विकृत है, तब तक परमात्मा द्वारा बनाया गया सुंदर संसार अच्छा नहीं लगता है। मन से विकार निकलने के बाद मन पर अंकुश लग जाता है। साथ ही मन सेवाभाव और परमात्म चिंतन में रत होने लगता है। शास्त्र कहते हैं 'परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीड़नम' अर्थात परोपकार करना पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप है। इसी प्रकार जीव भी सुख और दु:ख में सेवा का कार्य करता रहे। परोपकारी जीव को कष्ट तो मिलते हैं, पर उन कष्टों को सहन करने के बाद जो आनंद मिलता है, उससे जन्म जन्मांतर के कलुष धुल जाते हैं और मन का संसार विस्तृत हो जाता है। संसार में आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक इन तीन प्रकार के तापों से मानव संतप्त रहता है। जब तक यह ताप मानव को घेरे रहते हैं, तब तक उसका मन परमात्मा चिंतन में नहीं लगता है इन त्रय तापों की निवृत्ति के लिए जीवन को संयमित बनाते हुए सत्य को अपनाकर निष्काम कर्म करने का संकल्प लेना होता है।
संसार के प्रत्येक प्राणी में अनेक जन्मों की भोग वासना मन में रहती है। प्रयत्न करने के बाद भी वह समाप्त नहीं हो सकती है, मगर जीव अगर विवेक का उपयोग करे तो अंतकाल तक इंद्रियों पर अंकुश लगाया जा सकता है। धर्म की मर्यादा में रहकर मनुष्य अर्थ और काम का उपयोग करेगा तो वह दुखी नहीं होगा। धन संपत्ति का आनंद बिना संयम और सदाचार के नहीं हो सकता। जीवन में किए गए कर्मों की फला-शक्ति का चिंतन छोड़कर निष्काम कर्म करना ही उचित है। जब तक निष्काम कर्म नहीं करेंगे, तब तक अंत:करण और मन में रहने वाले दोषों के निवृत्ति नहीं हो सकती।
मन की इच्छाओं की पूर्ति करते जाना पतन मार्ग ग्रहण करना है। संसार में रहने वाला प्राणी जब तक इन विकारों को अपने से दूर नहीं कर लेता तब तक चिंतन में मन लगेगा ही नहीं। गीता में निष्काम कर्म का प्रतिपादन विराट रूप से किया गया है। देव और दानवों की अलग-अलग वृत्ति का उल्लेख भी मिलता है। दैत्य पुरुषार्थ करते हैं और अपने लिए जीते हैं, देवता पुरुषार्थ के साथ धर्म को भी लेकर चलते हैं और दूसरों के लिए जीते हैं। इसी प्रकार मानव के मन में भी देव और दानवी वृत्तियों का उदय होता रहता है।