मनुष्य इच्छा का दास है और उसे यह बंधन अति प्रिय है। मनुष्य इच्छा रहित जीवन की कल्पना भी नहीं करना चाहता है क्योंकि उसका मन कहता है कि इच्छाएं ही जीवन की ऊर्जा हैं। इच्छाओं की पूर्ति का प्रयास जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। जबकि शास्त्र इसके ठीक उलट बात कहते हैं कि कर्म फल की इच्छा को त्याग कर केवल भगवत पथ कर्तव्य पालन स्वरूप किए गए हुए कर्म, निष्काम कर्म होते हैं और निष्काम कर्म में कामना, आसक्ति, इच्छा व ममता के लिए कोई स्थान नहीं है।
निष्काम कर्म में कामना, इच्छा आदि त्याज्य हैं। परंतु मनुष्य इच्छाओं कामनाओं का दास है, यह वह स्वेच्छा से अंगीकार करता है, पहनता है। कितने लोग हैं जो निष्काम कर्म को जीवन में महत्व देते हैं। बहुत कम लोग हैं जो इच्छाओं को अपनी दासी बनाने में सक्षम होते हैं और इच्छा रहित, स्वार्थ रहित होकर निष्काम कर्म में प्राण पण से संलग्न रहते हैं।
प्रश्न यह उठता है कि क्या मनुष्य कोई भी कर्म इच्छा भाव से नहीं कर सकता है, अवश्य कर सकता है - धार्मिक कर्म करने की इच्छा करने में कोई बुराई नहीं है। परोपकार, परमार्थ की इच्छा से भी कर्म करना अनुचित नहीं है। लेकिन इन कर्मों को करते हुए भी फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। यदि परमात्मा को प्रसन्न करने की इच्छा से कोई कर्म किया जाए तो कोई बुराई नहीं है, परंतु शर्त यही है कि फल की चिंता और चिंतन न किया जाए। शास्त्र इस विषय को सुस्पष्ट करते हैं - स्वार्थ रहित उत्तम कर्म करने की इच्छा निर्मल व पवित्र इच्छा है यह कर्मों को सकाम नहीं बनाती है।
क्या स्वार्थ रहित कर्म हो सकते हैं? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। स्वार्थ, इच्छा, कामना, आसक्ति को आत्मबल और अभ्यास से कम किया जा सकता है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि जिसे कम किया जा सकता है, उसे समाप्त भी किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए मन की गहराइयों से प्रबल प्रयास की आवश्यकता होती है। परंतु पहली बात तो लोग यह प्रयास करते नहीं है और प्रयास करते भी हैं तो उनमें से अधिकांश सफल नहीं होते हैं। इच्छा कामना में आसक्ति, ममता का त्याग निश्चित रूप से कठिन है, बहुत कठिन और आम मानव के लिए तो किसी हद तक असंभव ही है।
साधारण मनुष्य इच्छा मुक्ति के बारे में सोचता ही नहीं है। वह तो संसार को प्रेम करता है, संसार को पाना चाहता है। उसकी यह इच्छा उसे बंधन में कसती रहती है। नाशवान को महत्व देने का अर्थ बंधन को अपनाना है और संसार तो नाशवान है ही, तो बंधन स्वाभाविक है, अनिवार्य है।
मनुष्य परमात्मा का अंश है और देह संसार का अंश है। यदि देह को संसार को समर्पित कर दिया जाए और स्वयं को परमात्मा को अर्पित कर दिया जाए तो कल्याण सुनिश्चित है, मुक्ति निश्चित है। लेकिन ऐसा होता नहीं है, हम और हमारा शरीर दोनों ही संसार को अर्पित समर्पित रहते हैं और यह अर्पण समर्पण हमें परमात्मा से दूर करता चला जाता है। संसार से निकटता और ईश्वर से दूरी हमारे तमाम दु:खो कष्टों का सबसे बड़ा कारण है। सबसे बड़ी बात है कि हम इस कारण को स्वयं ही उत्पन्न करते हैं और दोष परमात्मा को तथा प्रारब्ध को देते हैं।
एक सीधा सा सिद्धांत शास्त्र में निर्देशित है, जब तक मनुष्य अपने लिए कर्म करता है तब तक कर्म की समाप्ति नहीं होती है और वह कर्मों से बंधता चला जाता है। इस बंधन से मुक्ति का एकमात्र उपाय है, कामना का त्याग। बंधन और दु:ख के लिए परमात्मा की बनाई सृष्टि को दोष देना मूर्खता है, क्योंकि सृष्टि कभी बांधती नहीं है, बांधती तो जीव की बनाई हुई सृष्टि ही है, जिसमें इच्छा, ममता, आसक्ति की प्रधानता होती है।