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भारत की राजनीति में कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जिनकी उम्र सरकारों से ज्यादा होती है। सरकारें आती हैं, जाती हैं। नेता बदलते हैं, गठबंधन टूटते हैं, नए नारे गढ़े जाते हैं, लेकिन कुछ सवाल हर दौर में लौट आते हैं। आरक्षण उन्हीं सवालों में से एक है।

Reservation : भारत की राजनीति में कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जिनकी उम्र सरकारों से ज्यादा होती है। सरकारें आती हैं, जाती हैं। नेता बदलते हैं, गठबंधन टूटते हैं, नए नारे गढ़े जाते हैं, लेकिन कुछ सवाल हर दौर में लौट आते हैं। आरक्षण उन्हीं सवालों में से एक है। यह केवल सरकारी नौकरियों में कुछ सीटें सुरक्षित करने की व्यवस्था नहीं है। यह उस समाज की कहानी है, जहां सदियों तक कुछ लोगों को ऊंचा और कुछ को नीचा माना गया। यह उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें बराबरी का अधिकार मांगने वालों ने सत्ता के दरवाजे पर दस्तक दी। और यह उस राजनीति की भी कहानी है, जिसने सामाजिक न्याय के इस विचार को कभी आंदोलन बनाया तो कभी चुनावी हथियार। आज जब किसी राज्य में जातिगत जनगणना की मांग उठती है, जब कोई समुदाय आरक्षण की सूची में शामिल होने के लिए आंदोलन करता है, जब संसद में इस पर बहस होती है या सुप्रीम कोर्ट कोई अहम फैसला सुनाता है, तब यह साफ हो जाता है कि आरक्षण केवल नीति नहीं है। Reservation
अक्सर यह माना जाता है कि भारत में आरक्षण व्यवस्था की शुरुआत संविधान लागू होने के बाद हुई, लेकिन इसकी कहानी उससे कई दशक पहले शुरू हो चुकी थी। बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में देश के बड़े हिस्से में सामाजिक असमानता इतनी गहरी थी कि पिछड़े और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों तक पहुंच लगभग असंभव थी। इसी असंतुलन के खिलाफ दक्षिण भारत सहित कई क्षेत्रों में सामाजिक सुधार आंदोलनों ने जोर पकड़ा। वर्ष 1902 में कोल्हापुर रियासत के प्रगतिशील शासक छत्रपति शाहूजी महाराज ने पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण देकर एक ऐतिहासिक पहल की, जिसने सामाजिक न्याय की नई दिशा तय की। इसके बाद मद्रास प्रेसीडेंसी समेत अन्य क्षेत्रों में भी प्रतिनिधित्व आधारित नीतियों पर काम शुरू हुआ। दरअसल, यही वह दौर था जब अवसरों में समानता, सत्ता में भागीदारी और सामाजिक न्याय की मांग पहली बार संगठित रूप से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगी थी। Reservation
वर्ष 1932 भारतीय सामाजिक और राजनीतिक इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। ब्रिटिश सरकार ने दलित समुदाय के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorate) देने की घोषणा की, जिससे देश की राजनीति में बड़ी बहस छिड़ गई। इस मुद्दे पर महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचार आमने-सामने आ गए। गांधी का मानना था कि अलग निर्वाचन व्यवस्था समाज को और विभाजित कर सकती है, जबकि आंबेडकर दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाने के पक्षधर थे। लंबे संवाद और गहन विमर्श के बाद दोनों नेताओं के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे इतिहास में 'पूना पैक्ट' के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था को छोड़कर अनुसूचित जातियों के लिए सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटों का प्रावधान स्वीकार किया गया। यही वह क्षण था, जिसने भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व की अवधारणा को नई मजबूती दी और आगे चलकर आरक्षण व्यवस्था की वैचारिक नींव को मजबूत बनाया। Reservation
1947 में देश स्वतंत्र हुआ और संविधान सभा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी ऐसा भारत बनाना जिसमें सदियों से वंचित समुदायों को बराबरी का अवसर मिल सके। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि केवल कानूनी समानता पर्याप्त नहीं होगी। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को आगे लाने के लिए विशेष उपाय करने होंगे। इसी सोच के तहत अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए शिक्षा, सरकारी नौकरियों और विधानमंडलों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। हालांकि उस समय इसे स्थायी व्यवस्था नहीं माना गया था। उम्मीद की गई थी कि कुछ दशकों में सामाजिक असमानता कम हो जाएगी और विशेष प्रावधानों की आवश्यकता नहीं रहेगी। लेकिन भारतीय समाज की वास्तविकता कहीं अधिक जटिल थी। Reservation
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक आरक्षण मुख्य रूप से एससी और एसटी समुदायों तक सीमित रहा। लेकिन 1960 और 70 के दशक में पिछड़े वर्गों के बीच यह सवाल उठने लगा कि उन्हें भी समान अवसर क्यों नहीं मिल रहे। 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया। इसका उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करना था। मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। रिपोर्ट कई वर्षों तक फाइलों में बंद रही। फिर आया 1990 का वह साल जिसने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा कर दी। देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। कई छात्रों ने आत्मदाह की कोशिश की। सड़कों पर उग्र आंदोलन हुए। लेकिन दूसरी ओर पिछड़े वर्गों के बड़े हिस्से ने इसे सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक जीत माना। यहीं से भारतीय राजनीति में "मंडल बनाम कमंडल" की बहस शुरू हुई और जाति आधारित राजनीति ने नई दिशा पकड़ ली। Reservation
मंडल आयोग लागू होने के बाद भारतीय राजनीति का सामाजिक आधार बदलने लगा। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पिछड़े वर्गों के नेता तेजी से उभरे। सामाजिक न्याय की राजनीति ने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को चुनौती दी। यादव, कुर्मी, कुशवाहा, जाटव और अन्य पिछड़ी जातियां राजनीतिक रूप से संगठित होने लगीं। राजनीतिक दलों ने समझ लिया कि आरक्षण केवल नीति नहीं, बल्कि चुनावी समीकरण भी है। इसी दौर में क्षेत्रीय दलों की ताकत बढ़ी और राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन युग की शुरुआत हुई। Reservation
समय के साथ यह बहस भी तेज हुई कि क्या आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन सामान्य वर्ग के लोगों को भी आरक्षण मिलना चाहिए। इस सवाल का जवाब 2019 में मिला, जब आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। इस फैसले ने आरक्षण की बहस को नया आयाम दिया। अब चर्चा केवल सामाजिक पिछड़ेपन तक सीमित नहीं रही, बल्कि आर्थिक असमानता भी केंद्र में आ गई। हालांकि आलोचकों का कहना है कि आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक भेदभाव को दूर करना था, इसलिए इसे केवल आर्थिक आधार पर नहीं देखा जा सकता। Reservation
पिछले दो दशकों में कई प्रभावशाली समुदायों ने भी आरक्षण की मांग उठाई। महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन, हरियाणा में जाट आंदोलन, गुजरात में पटेल आंदोलन और राजस्थान में गुर्जर आंदोलन ने यह दिखाया कि आरक्षण अब केवल वंचित वर्गों का मुद्दा नहीं रहा। बदलती अर्थव्यवस्था, रोजगार की कमी और सरकारी नौकरियों में सीमित अवसरों ने आरक्षण को और अधिक राजनीतिक बना दिया। हर राजनीतिक दल को इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से कदम रखना पड़ता है। Reservation
हाल के वर्षों में जातिगत जनगणना की मांग ने आरक्षण की राजनीति को फिर से केंद्र में ला दिया है। समर्थकों का तर्क है कि यदि आबादी का वास्तविक आंकड़ा सामने आएगा, तभी संसाधनों और अवसरों का न्यायसंगत बंटवारा संभव होगा। विरोधियों का कहना है कि इससे समाज में जातीय पहचान और मजबूत होगी। लेकिन इतना तय है कि आने वाले वर्षों में जातिगत जनगणना और आरक्षण का सवाल भारतीय राजनीति के सबसे बड़े मुद्दों में बना रहेगा। Reservation
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