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आज संत समाज का एक हिस्सा भी गुटबाजी, प्रतिष्ठा युद्ध और राजनीतिक खेमेबंदी से अछूता नहीं रह गया है। दुखद यह है कि इन संघर्षों का मंच सनातन बन रहा है और कीमत करोड़ों श्रद्धालु चुका रहे हैं।

साजिशों, स्वार्थों और सत्ता संघर्ष के बीच पिसता सनातन
सनातन धर्म हजारों वर्षों से केवल एक आस्था नहीं, बल्कि भारत की आत्मा रहा है। यह किसी व्यक्ति, मठ, संगठन, सरकार या राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। लेकिन वर्ष 2026 का घटनाक्रम देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि सनातन को बचाने का दावा करने वाले ही कहीं न कहीं उसकी गरिमा को सबसे अधिक आहत कर रहे हैं।
वर्ष की शुरुआत प्रयागराज के माघ मेले से हुई। करोड़ों श्रद्धालु सनातन के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक में श्रद्धा का स्नान करने पहुंचे थे। लेकिन इसी दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ कथित अभद्रता, उनके अनुयायियों और बाल बटुकों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप सामने आए। वीडियो वायरल हुए, आरोप लगे, प्रत्यारोप लगे और देखते ही देखते संत समाज का एक बड़ा वर्ग सरकार के सामने खड़ा दिखाई देने लगा।
इसके बाद घटनाक्रम ने और भी गंभीर मोड़ लिया। स्वयं को जगद्गुरु रामभद्राचार्य का शिष्य बताने वाले आशुतोष ब्रह्मचारी ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। बाल बटुकों के यौन शोषण तक के आरोप लगाए गए, मुकदमे दर्ज हुए और पूरा देश स्तब्ध रह गया। करोड़ों हिंदुओं के सामने सवाल खड़ा हो गया कि आखिर सनातन के शीर्ष धार्मिक मंचों पर यह सब क्या हो रहा है?
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
कुछ समय बाद वही आशुतोष ब्रह्मचारी सार्वजनिक रूप से यह कहने लगे कि उनसे दबाव में आरोप लगवाए गए थे। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों और कुछ धार्मिक व्यक्तियों पर भी दबाव बनाने के आरोप लगाए। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी और अपने गुरु रामभद्राचार्य की सुरक्षा को लेकर भी आशंकाएं व्यक्त कीं।
यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न जन्म लेता है।
यदि आरोप सही थे तो फिर उन्हें वापस लेने या बदलने की नौबत क्यों आई? और यदि आरोप झूठे थे तो इतने गंभीर आरोपों के आधार पर सनातन के सबसे बड़े धार्मिक पदों में से एक पर बैठे शंकराचार्य की प्रतिष्ठा को क्यों तार-तार किया गया?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक आश्चर्यजनक भूमिका उन लोगों की रही जो कभी आशुतोष ब्रह्मचारी के बयानों को आधार बनाकर शंकराचार्य पर प्रश्न उठा रहे थे, लेकिन आज वही लोग आशुतोष को हिस्ट्रीशीटर, संदिग्ध और अविश्वसनीय बता रहे हैं। प्रश्न यह है कि यदि वह आज अविश्वसनीय है तो कल विश्वसनीय कैसे था? और यदि कल विश्वसनीय था तो आज अचानक अविश्वसनीय क्यों हो गया?
इस पूरे प्रकरण ने एक भयावह सच्चाई उजागर की है कि आज संत समाज का एक हिस्सा भी गुटबाजी, प्रतिष्ठा युद्ध और राजनीतिक खेमेबंदी से अछूता नहीं रह गया है। दुखद यह है कि इन संघर्षों का मंच सनातन बन रहा है और कीमत करोड़ों श्रद्धालु चुका रहे हैं।
इसी बीच राम मंदिर को लेकर चंदे और भूमि खरीद से जुड़े आरोपों ने भी नया विवाद खड़ा कर दिया। आरोप लगाने वालों में केवल विपक्षी नेता ही नहीं, बल्कि कई संत और धार्मिक व्यक्तित्व भी शामिल रहे। ऐसे में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि आरोप निराधार हैं तो पारदर्शी जांच से परहेज क्यों? और यदि आरोपों में सच्चाई है तो जवाबदेही तय क्यों नहीं?
दुर्भाग्य यह है कि आज सत्य की खोज कम और राजनीतिक लाभ-हानि का गणित अधिक दिखाई देता है। सत्ता अपने बचाव में खड़ी है, विपक्ष अपने अवसर तलाश रहा है, संत अपने-अपने खेमों में बंटे हुए हैं और मीडिया भी कई बार पक्ष-विपक्ष के चश्मे से घटनाओं को देखने लगता है।
लेकिन इन सबके बीच एक पक्ष ऐसा है जिसकी कोई सुनवाई नहीं हो रही—वह है सामान्य सनातनी समाज।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि कौन किसके खिलाफ है। आवश्यकता इस बात की है कि सत्य क्या है। क्योंकि जब धर्म के मंच पर राजनीति हावी हो जाती है और राजनीति के मंच पर धर्म का उपयोग होने लगता है, तब सबसे पहले आहत धर्म ही होता है।
यदि यह क्रम नहीं रुका तो आने वाले समय में सबसे बड़ा नुकसान किसी व्यक्ति, किसी संत, किसी संगठन या किसी सरकार का नहीं होगा।
सबसे बड़ा नुकसान सनातन की उस नैतिक शक्ति का होगा जिसने हजारों वर्षों तक इस देश को जोड़कर रखा है।
और तब इतिहास यही लिखेगा कि सनातन को बाहरी शत्रुओं ने उतना नुकसान नहीं पहुंचाया, जितना उसके स्वयंभू रक्षकों ने पहुंचाया।
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लेखक के बारे में जानें : कपिल शर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार एवं अधिवक्ता हैं।
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है। इसके लिए Chetna Manch उत्तरदायी नहीं है।)
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