Sonam Wangchuk News: साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले पर उन्होंने सरकार के कदम का समर्थन किया था। सरकार की ओर से भी उस समय सोनम वांगचुक को महत्व दिया गया था।

Sonam Wangchuk: लद्दाख के मशहूर इंजीनियर, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक बार फिर देशभर में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। शिक्षा व्यवस्था, परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और लद्दाख के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर उनका आंदोलन लगातार सुर्खियों में है लेकिन सोनम वांगचुक की कहानी केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता के आंदोलन तक सीमित नहीं है। एक समय ऐसा भी था जब वह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के समर्थकों में गिने जाते थे। साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले पर उन्होंने सरकार के कदम का समर्थन किया था। सरकार की ओर से भी उस समय सोनम वांगचुक को महत्व दिया गया था। उन्हें देश में शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल किया जाता था। ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ जैसे कार्यक्रमों में भी उन्हें विशेष स्थान दिया गया था। हालांकि समय के साथ सरकार और सोनम वांगचुक के बीच दूरी बढ़ती चली गई। लद्दाख को राज्य का दर्जा देने, संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर उनके आंदोलन ने उन्हें केंद्र सरकार के खिलाफ खड़े प्रमुख चेहरों में शामिल कर दिया।
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के अलची गांव में हुआ था। उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (तत्कालीन रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज), श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इंजीनियर होने के साथ-साथ वह शिक्षा सुधारक, इनोवेटर और पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में भी पहचाने जाते हैं। साल 1988 में उन्होंने Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य लद्दाख के छात्रों को बेहतर शिक्षा देना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाना था। बॉलीवुड फिल्म ‘3 इडियट्स’ के लोकप्रिय किरदार फुंसुख वांगड़ू को सोनम वांगचुक से प्रेरित माना जाता है। आमिर खान द्वारा निभाया गया यह किरदार देशभर में लोकप्रिय हुआ और इसके बाद सोनम वांगचुक को भी नई पहचान मिली।
साल 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाया और जम्मू-कश्मीर को पुनर्गठित करते हुए लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया। उस समय सोनम वांगचुक ने इस फैसले का स्वागत किया था। उनका मानना था कि अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने से लद्दाख के विकास और प्रशासनिक फैसलों में तेजी आ सकती है। उस दौर में उन्हें केंद्र सरकार के फैसलों का समर्थन करने वाले प्रमुख चेहरों में गिना गया। कई मंचों पर सरकार और सोनम वांगचुक के विचार एक जैसे दिखाई दिए। इसी वजह से कुछ समय तक उन्हें मोदी सरकार के समर्थक चेहरों में भी देखा गया।
समय के साथ लद्दाख से जुड़े कई मुद्दों को लेकर सोनम वांगचुक और केंद्र सरकार के बीच मतभेद बढ़ने लगे। सोनम वांगचुक और लद्दाख के कई संगठन लगातार मांग कर रहे हैं कि लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष संरक्षण दिया जाए। इसके अलावा राज्य का दर्जा और स्थानीय लोगों के लिए अधिक अधिकारों की मांग भी उठाई जा रही है। उनका कहना है कि लद्दाख की पर्यावरणीय स्थिति, संस्कृति और स्थानीय हितों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक व्यवस्था जरूरी है। इन्हीं मांगों को लेकर उन्होंने कई बार आंदोलन और भूख हड़ताल की। इसके बाद वह केंद्र सरकार की नीतियों के आलोचक के रूप में भी सामने आए।
हाल के समय में सोनम वांगचुक ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों को लेकर भी आवाज उठाई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर उनके अनशन ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। उनके समर्थकों का कहना है कि वह युवाओं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। उनके विरोध प्रदर्शन के साथ कुछ अन्य संगठनों ने भी अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया।
बहुत कम लोग जानते हैं कि सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल भी लद्दाख के अधिकारों के लिए आंदोलन कर चुके थे। सोनम वांग्याल ने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह नेशनल कॉन्फ्रेंस से जुड़े रहे और बाद में कांग्रेस में शामिल हुए। वर्ष 1975 में वह जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी बने। वर्ष 1984 में उन्होंने लद्दाख को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनसे मुलाकात की थी और जूस पिलाकर उनका अनशन खत्म कराया था।
सोनम वांगचुक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक उनकी आइस स्तूप तकनीक है। इस तकनीक में सर्दियों के दौरान पानी को जमा करके बर्फ के बड़े ढांचे तैयार किए जाते हैं जिनका उपयोग गर्मियों में पानी की कमी वाले इलाकों में सिंचाई के लिए किया जाता है। लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यह तकनीक काफी उपयोगी साबित हुई और उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
सोनम वांगचुक को साल 2018 में एशिया के प्रतिष्ठित रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और इनोवेशन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई सम्मान मिल चुके हैं। उन्होंने अपनी कई तकनीकों का पेटेंट नहीं कराया ताकि दुनिया के अन्य लोग भी इनका इस्तेमाल कर सकें।
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