ग्रेटर नोएडा कलेक्ट्रेट में विशेष बच्चों ने जिलाधिकारी मेधा रूपम को अपने हाथों से बनाई राखियां बांधीं। जानिए कैसे रक्षाबंधन का यह आयोजन समावेशिता और आत्मनिर्भरता का संदेश बना।

भगवत प्रसाद शर्मा की कलम से
Raksha Bandhan Special : रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का वह पर्व है, जिसमें एक धागा रिश्तों की मजबूती, विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक बन जाता है। उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर जिले में स्तिथ ग्रेटर नोएडा की collectrate में इस बार के रक्षाबंधन पर बंधी कुछ राखियों ने इस पर्व के अर्थ को और व्यापक बना दिया। इन राखियों में केवल रंग-बिरंगे धागे नहीं थे, बल्कि विशेष बच्चों की मेहनत, कल्पनाशीलता, आत्मविश्वास और अपने पैरों पर खड़े होने की आकांक्षा भी गुंथी हुई थी। जब अभय किड्स फाउंडेशन के विशेष बच्चों ने अपने हाथों से तैयार की गई राखियां जिलाधिकारी श्रीमती मेधा रूपम की कलाई पर बांधीं, तो वह क्षण किसी औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। वह प्रशासन और समाज के बीच संवेदनशील संवाद का ऐसा अवसर बन गया, जिसने यह सवाल भी सामने रखा कि क्या हम विशेष बच्चों को वास्तव में उनके अधिकार के अनुरूप अवसर दे पा रहे हैं? यह आयोजन हमें सोचने के लिए मजबूर करता है कि किसी बच्चे को उसकी शारीरिक, मानसिक या विकासात्मक विशेषता के आधार पर उसकी संभावनाओं से क्यों आंका जाए? आखिर क्यों हम कई बार ऐसे बच्चों को केवल सहानुभूति की नजर से देखते हैं, जबकि उन्हें आवश्यकता सहानुभूति से कहीं अधिक सम्मान, प्रशिक्षण, अवसर और विश्वास की होती है। Raksha Bandhan Special
आर्या फैशन्स की संस्थापिका एवं महिला उद्यमी डॉ. खुशबू सिंह के साथ अभय किड्स फाउंडेशन के विशेष बच्चे जब कलेक्ट्रेट पहुंचे, तो उनके हाथों में उनके द्वारा बनाई गई सुंदर राखियां थीं। इन राखियों की खूबसूरती केवल उनके रंग और सजावट में नहीं थी। उनकी असली खूबसूरती उस मेहनत में थी, जो बच्चों ने उन्हें तैयार करने में लगाई थी। बच्चों ने जब जिलाधिकारी मेधा रूपम की कलाई पर अपने हाथों से राखी बांधी, तो उस दृश्य में प्रशासनिक पद और सामाजिक भूमिका की औपचारिक दूरी जैसे समाप्त हो गई। सामने बच्चे थे, उनके चेहरे पर उत्साह था और उनके भीतर यह विश्वास था कि उनके हुनर को भी देखा और सराहा जा रहा है। जिलाधिकारी ने बच्चों के साथ सहजता और आत्मीयता से संवाद किया तथा उनकी रचनात्मक प्रतिभा और मेहनत की सराहना की। ऐसे क्षण छोटे जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन विशेष बच्चों के आत्मविश्वास के लिए इनका महत्व बहुत बड़ा होता है। क्योंकि किसी बच्चे को यह महसूस होना कि समाज उसके हुनर को पहचान रहा है, उसके भीतर आगे बढ़ने की एक नई ऊर्जा पैदा करता है। Raksha Bandhan Special
हमारे समाज में “विशेष” बच्चों को लेकर संवेदना तो दिखाई देती है, लेकिन संवेदना और समावेशिता में अंतर है। दया किसी व्यक्ति को कमजोर मानकर उसके प्रति भावुक होती है, जबकि सम्मान उसे बराबरी के अधिकार के साथ देखता है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि वे भी समाज का हिस्सा हैं। उन्हें विद्यालयों में बेहतर अवसर चाहिए, कौशल विकास का प्रशिक्षण चाहिए, रचनात्मक गतिविधियों के लिए मंच चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण उन्हें यह विश्वास दिलाने की जरूरत है कि वे भी कुछ कर सकते हैं। जब कोई बच्चा अपने हाथों से कोई वस्तु तैयार करता है और लोग उसे खरीदते हैं, उसकी प्रशंसा करते हैं या किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को वह वस्तु भेंट की जाती है, तो बच्चे के मन में अपनी क्षमता के प्रति विश्वास पैदा होता है। यही विश्वास धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की नींव बनता है। Raksha Bandhan Special
आर्या फैशन्स और अभय किड्स फाउंडेशन की पहल इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण दिखाई देती है। ऑटिज्म, डाउन सिंड्रोम तथा अन्य विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों को हस्तशिल्प का प्रशिक्षण देना केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि उन्हें कौशल और आत्मविश्वास से जोड़ने का प्रयास है। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा का अर्थ केवल किताब पढ़ना और परीक्षा देना नहीं है। किसी बच्चे की रुचि, उसकी रचनात्मकता, उसकी व्यावहारिक क्षमता और उसके भीतर मौजूद विशिष्ट प्रतिभा को पहचानना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेष बच्चों के मामले में यह और अधिक जरूरी हो जाता है। किसी के हाथों में चित्रकारी का हुनर हो सकता है, कोई हस्तशिल्प में बेहतर हो सकता है, कोई संगीत में, कोई कंप्यूटर में और कोई किसी अन्य रचनात्मक गतिविधि में। आवश्यकता है तो बस उस प्रतिभा को पहचानने और उसे उचित दिशा देने की। जिस हाथ को समाज अक्सर कमजोर समझता है, वही हाथ यदि हुनर सीख जाए तो वह आत्मनिर्भरता का साधन बन सकता है। Raksha Bandhan Special
कवि सोहनलाल द्विवेदी की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं “लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।” विशेष बच्चों के संदर्भ में इन पंक्तियों का महत्व और बढ़ जाता है। इन बच्चों की यात्रा कई बार सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होती है। उन्हें सीखने, समझने और अपनी प्रतिभा व्यक्त करने के लिए अतिरिक्त समय और अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि उनकी क्षमताएं कम हैं। कई बार समस्या बच्चे में नहीं, बल्कि समाज की उस सोच में होती है जो उसकी क्षमता को पहचानने से पहले ही उसकी सीमाएं तय कर देती है। इसलिए जरूरत बच्चों को बदलने से अधिक हमारी दृष्टि बदलने की है। Raksha Bandhan Special
जिलाधिकारी मेधा रूपम के साथ बच्चों का यह आत्मीय संवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रशासन केवल योजनाओं, फाइलों और सरकारी आदेशों का नाम नहीं है। प्रशासन का एक मानवीय चेहरा भी होता है। जब किसी जिले का शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी बच्चों के साथ सहजता से मिलता है, उनकी बनाई वस्तुओं की सराहना करता है और उन्हें प्रोत्साहित करता है, तो यह समाज में सकारात्मक संदेश भेजता है। ऐसे अवसर यह बताते हैं कि शासन और समाज के बीच संबंध केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं होना चाहिए। प्रशासन को समाज के उन वर्गों के साथ भी खड़ा होना चाहिए, जिन्हें मुख्यधारा में आने के लिए अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता है। रक्षाबंधन के अवसर पर हुआ यह छोटा-सा आयोजन इसी मानवीय प्रशासन की एक सुंदर तस्वीर प्रस्तुत करता है। Raksha Bandhan Special
डॉ. खुशबू सिंह की पहल का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि विशेष बच्चों ने सुंदर राखियां तैयार कीं। इसकी असली उपलब्धि इस विचार में है कि हुनर को आत्मनिर्भरता से जोड़ा जाए। समाज में बदलाव केवल बड़े सरकारी कार्यक्रमों से नहीं आता। कई बार किसी संस्था, उद्यमी, शिक्षक या संवेदनशील व्यक्ति का निरंतर छोटा प्रयास भी किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदल सकता है। यदि किसी विशेष बच्चे को एक कौशल सिखाया जाता है, उसके हुनर को बाजार से जोड़ा जाता है और उसकी मेहनत को आर्थिक मूल्य मिलता है, तो यह उसके परिवार के लिए भी आत्मविश्वास का विषय बनता है। इस दिशा में निजी संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और उद्योग जगत को आगे आने की जरूरत है। Raksha Bandhan Special
अभय किड्स फाउंडेशन की प्रधानाचार्या श्रीमती दिशा कपूर ने भी इस पहल के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि विशेष बच्चों के विकास के लिए केवल शैक्षणिक शिक्षा पर्याप्त नहीं है। उनकी रचनात्मक प्रतिभा और व्यावहारिक कौशल को पहचानना तथा उन्हें उचित प्रशिक्षण देना भी जरूरी है। यह बात आज की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। हर बच्चे की क्षमता एक जैसी नहीं होती। इसलिए हर बच्चे के विकास का रास्ता भी एक जैसा नहीं हो सकता। हमें ऐसी शिक्षा और प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें बच्चे की कमजोरी से पहले उसकी क्षमता दिखाई दे। Raksha Bandhan Special
विशेष बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की जिम्मेदारी केवल उनके माता-पिता या किसी विशेष विद्यालय की नहीं है। यह जिम्मेदारी प्रशासन की भी है, विद्यालयों की भी, सामाजिक संस्थाओं की भी, उद्योग जगत की भी और समाज के प्रत्येक संवेदनशील नागरिक की भी। हमें अपने आसपास ऐसे अवसर पैदा करने होंगे, जहां विशेष बच्चे अपनी प्रतिभा दिखा सकें। उन्हें प्रदर्शनियों में स्थान मिले, उनके उत्पादों को बाजार मिले, उनके कौशल को रोजगार से जोड़ा जाए और उनकी उपलब्धियों को सार्वजनिक मंचों पर सम्मान मिले। क्योंकि सम्मान केवल पुरस्कार नहीं होता। कई बार किसी बच्चे की बनाई छोटी-सी वस्तु को पूरे मन से स्वीकार कर लेना भी उसके लिए बहुत बड़ा सम्मान होता है। Raksha Bandhan Special
ग्रेटर नोएडा कलेक्ट्रेट में बंधी इन राखियों को यदि केवल रक्षाबंधन के एक कार्यक्रम के रूप में देखा जाए तो हम शायद इस पूरे प्रसंग के सबसे महत्वपूर्ण संदेश को खो देंगे। असल में यह आयोजन हमें आईना दिखाता है। यह पूछता है कि हम विशेष बच्चों को किस नजर से देखते हैं? क्या हम उन्हें केवल सहायता पाने वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं या उनकी प्रतिभा और क्षमता को भी पहचानते हैं? क्या हम उनके लिए अवसर पैदा कर रहे हैं? क्या हम उनके बनाए उत्पादों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करते हैं? और क्या हम उन्हें समाज की मुख्यधारा में बराबरी के साथ स्थान देने के लिए तैयार हैं? इन सवालों के जवाब केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार से मिलेंगे। Raksha Bandhan Special
रक्षाबंधन के इस अवसर पर बच्चों ने जो राखियां बांधीं, वे केवल कलाई पर बंधे धागे नहीं थे। वे विश्वास के धागे थे। वे समानता के धागे थे। वे सम्मान के धागे थे। और सबसे बढ़कर वे उस भरोसे के धागे थे कि यदि समाज साथ दे तो कोई भी प्रतिभा अपनी पहचान बना सकती है। कहा जाता है “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।” इन विशेष बच्चों के चेहरों पर दिखाई देती मुस्कान और उनके हाथों से तैयार राखियों में इसी जीत की झलक थी। उनके हाथों ने यह संदेश दिया कि प्रतिभा किसी शारीरिक या मानसिक सीमा की मोहताज नहीं होती। जरूरत है तो केवल उसे पहचानने वाली नजर की, प्रोत्साहित करने वाले समाज की और आगे बढ़ाने वाले हाथ की। रक्षाबंधन पर बंधा यह धागा एक कलाई से दूसरी कलाई तक नहीं गया, बल्कि दिल से दिल तक पहुंचा। और शायद यही इस पूरे आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। Raksha Bandhan Special
समाज की असली संवेदनशीलता तब साबित होती है, जब वह कमजोर समझे जाने वाले व्यक्ति में भी संभावनाएं देखे। विशेष बच्चों के हाथों में हुनर देना केवल उन्हें कोई कला सिखाना नहीं है; यह उनके हाथों में आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर भविष्य की संभावना सौंपना है। यदि हम वास्तव में एक समावेशी समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें विशेष बच्चों के लिए दरवाजे खोलने होंगे सहानुभूति के नहीं, समान अवसर के। Raksha Bandhan Special
(— भगवत प्रसाद शर्मा
मीडिया एवं जनसंपर्क प्रोफेशनल
मानद डॉक्टरेट से सम्मानित )
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