'किसी देश का उत्थान वहां की जनता की चेतना और राजनीतिक जागृति पर निर्भर करता है। किसी देश के नागरिकों को सुधारे बिना देश का सुधार असंभव है। नागरिकों का सुधार करना तभी संभव होगा, जब स्थानीय स्वशासन को अधिकार देकर उनको विभिन्न उत्तरदायित्वों को सौंपा जाए। ऐसा राज्य जनता की अकर्मण्यता को समाप्त कर भ्रष्ट एवं बोझिल व्यवस्था से मुक्त करता है।'
ये विचार हैं - भारतीय राजनीतिक विचारक, स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर चिंतक, समाजवादी रहे डॉ. राममनोहर लोहिया के, जिनकी आज पुण्यतिथि है।
डॉ. लोहिया हिंदू होते हुए भी हिंदू धर्म एवं समाज की मूल मान्यताओं के कट्टर विरोधी थे। लोहिया ने धर्म को ईश्वर तथा आत्मा के साथ न जोड़कर मानव, प्राणियों के कल्याण से तथा लौकिक समृद्धि के साथ जोड़ा।
जाति और वर्ण व्यवस्था को कैंसर के समान मानने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अनुभव किया कि भारत इतने समय तक वर्ण व्यवस्था के चलते तंद्रा और सड़न की स्थिति में रहा है। उन्होंने यह नहीं माना कि वर्ण या जाति का आधार स्वभाव का कर्तव्य विभाजन है। उनका तो मानना था कि वर्ण व्यवस्था बल द्वारा निर्मित की गई एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें गुण-कर्म का कोई मूल्य नहीं है।
डॉ. लोहिया का स्पष्ट मानना था - 'सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार कर्म होना चाहिए न कि जन्म। जन्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का उच्च समझना, जाति प्रथा को बनाए रखना है। जाति प्रथा एक जड़-वर्ग का द्योतक है, जिसके कारण भारत का समग्र जीवन निष्प्राण हो गया। इसी कारण भारत दासता का शिकार हुआ।'
जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए डॉ. लोहिया ने सामान्यतः अंतरजातीय विवाह और सहभोजों को महत्व दिया। क्योंकि उनका मानना था कि इससे समाज में आवश्यक रूप से समता का भाव पैदा होने लगेगा। डॉ. लोहिया ने आम लोगों में राजनीतिक चेतना भरने और राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए जाति प्रथा की समाप्ति की दिशा में प्रत्यक्ष चुनाव, व्यस्क मताधिकार और विशेष सिद्धांत की जरूरत पर बल दिया।
गांधीवादी चिंतक, राजनीतिज्ञ, इतिहासकार, अर्थशास्त्री, दार्शनिक तथा विख्यात लेखक डॉ. राम मनोहर लोहिया की समाजवाद में पूर्ण आस्था होते हुए भी, उनको हिंसा से बेहद चिढ़ थी। समाजवाद के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए डॉ. लोहिया गांधीवादी जन आंदोलनों को ही सर्वाधिक प्रभावी मानते थे।
डॉ. लोहिया का मानना था कि राजनीति के बिना धर्म निष्प्राण हो जाता है तथा धर्म के बिना राजनीति कलहकारी बन जाती है। उनकी दृष्टि में - 'धर्म दीर्घकालिक राजनीति और राजनीति अल्पकालिक धर्म है।'
डॉ. राम मनोहर लोहिया ने चार स्तंभों वाले राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की थी, जिसमें उन्होंने केंद्रीकरण तथा विकेंद्रीकरण की परस्पर विरोधी मानी जाने वाली विचारधाराओं का समन्वय करने का प्रयास किया था। इस परिकल्पना में स्तंभों का संगठन इस प्रकार करने का उद्देश्य रखा गया था कि सभी स्तंभ एक सूत्र में बंधे रहें। ऐसे राज्य में कलेक्टर जैसा नौकरशाही सत्ता का प्रतीक पद समाप्त कर दिया जाएगा और उसके सभी कार्य जिले की विभिन्न संस्थाओं में विभाजित कर दिए जाएंगे आदि।
डॉ. लोहिया का मानना था कि किसी एकजुट कार्यक्रम के अभाव में भारत के प्रतिपक्षी दल आपस में लड़ते रहते हैं, जिसका लाभ सत्ताधारी पार्टी को अनायास ही मिल जाता है। इस स्थिति से उबरने के लिए उन्होंने समाजवाद के सात सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप देने की बात कही थी। इन सात सिद्धांतों में शामिल थे - स्त्री पुरुष समानता को स्वीकृति, जाति में जन्म संबंधी असमानता की समाप्ति, रंग भेदी असमानता की समाप्ति, विश्व सरकार का निर्माण, व्यक्तिगत संपत्ति पर आधारित असमानताओं का विरोध, व्यक्तिगत अधिकारों पर अतिक्रमण का विरोध और युद्ध के शस्त्रों का विरोध तथा सविनय अवज्ञा सिद्धांत को स्वीकृति।
डॉ. लोहिया जीवन पर्यंत सामाजिक और राजनीतिक मूल्यों की स्थापना के लिए सतत संघर्ष करते रहे। उनका यह प्रसिद्ध क्रांतिकारी वाक्य आज भी रोमांचित करता है - 'ज़िन्दा कौमें सरकार बदलने के लिए पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं।'