स्वतंत्र भारद्वाज के कथित नफरती पॉडकास्ट, हिंसा को लेकर किए गए दावों, निशु आजाद को कथित धमकी, राजनीतिक संरक्षण के आरोपों और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कथित आपत्तिजनक भाषा ने देश में बढ़ती नफरत और कट्टरता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

— निर्मल रानी
Editorial : किसी लोकतांत्रिक और सभ्य समाज के लिए इससे अधिक चिंताजनक स्थिति और क्या हो सकती है कि नफरत को विचार, हिंसा को बहादुरी और कानून को अपनी जेब में रखने को राजनीतिक संरक्षण समझने वाली मानसिकता धीरे-धीरे सामान्य होती चली जाए। आज सवाल केवल 21 वर्षीय स्वतंत्र भारद्वाज का नहीं है। असली सवाल उस मानसिकता का है, जो ऐसे युवाओं को जन्म देती है, उन्हें वैचारिक खाद-पानी देती है और फिर उनके दुस्साहस को देखकर भी तालियां बजाने वालों की भीड़ खड़ी कर देती है। इन दिनों स्वतंत्र भारद्वाज नाम का एक युवक अपने कथित तौर पर बेहद आपत्तिजनक और नफरत भरे पॉडकास्ट के कारण चर्चा में है। मूल रूप से बिहार के दरभंगा के ग्रामीण परिवेश से आने वाला यह युवक दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ा रहा है और स्वयं को कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधारा का समर्थक बताता है। विभिन्न हिंदू संगठनों और गोरक्षक समूहों के साथ सक्रिय रहने का भी उसने उल्लेख किया है। मामला तब गंभीर हो गया जब एक पॉडकास्ट में उसने कथित रूप से जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के दौरान निशु आजाद के पिता संजय कुमार पर हमला करने की बात स्वयं स्वीकार की। उसके दावे के मुताबिक उसने उनके सिर पर हमला किया था, जिसके कारण उन्हें गंभीर चोट आई और कई टांके लगे। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह थी कि वह इस कथित हिंसा का वर्णन करते हुए किसी अपराधबोध के बजाय गर्व और ठहाकों का प्रदर्शन करता दिखाई दिया। यदि किसी व्यक्ति को किसी दूसरे नागरिक पर हमला करने की बात स्वीकार करते हुए गर्व महसूस होता है, तो समस्या केवल उस व्यक्ति के चरित्र तक सीमित नहीं रहती। सवाल यह भी उठता है कि आखिर हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा वातावरण कैसे तैयार हुआ, जिसमें हिंसा को ‘वीरता’ समझने की मानसिकता विकसित हो रही है? Editorial
स्वतंत्र भारद्वाज ने इसी बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा नेता कपिल मिश्रा और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान जैसे नेताओं को अपने ‘बड़े भाई’ के समान बताया और दावा किया कि प्रभावशाली लोगों के फोन आने तथा पैरवी के दबाव के कारण पुलिस ने उसे तत्काल राहत दे दी थी। इन दावों की स्वतंत्र और न्यायिक पुष्टि अलग विषय है। लेकिन लोकतंत्र में इन दावों की जांच होना बेहद जरूरी है। यदि ये दावे झूठे हैं तो संबंधित लोगों और संस्थाओं को इन्हें स्पष्ट रूप से खारिज करना चाहिए। और यदि इनमें रत्ती भर भी सच्चाई है तो यह कानून के राज के लिए बेहद गंभीर सवाल है। किसी भी लोकतंत्र में कानून की नजर में नागरिक की हैसियत समान होनी चाहिए। किसी नेता का समर्थक होना किसी को कानून से ऊपर नहीं कर सकता। राजनीतिक संपर्क यदि किसी आरोपी को कानून की सामान्य प्रक्रिया से बाहर निकालने का माध्यम बन जाए तो यह केवल पुलिस व्यवस्था का प्रश्न नहीं रहेगा, बल्कि संविधान के शासन पर प्रश्नचिह्न होगा। Editorial
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू वह कथित धमकी है, जिसमें निशु आजाद को अगला ‘टारगेट’ बनाए जाने की बात कही गई। किसी महिला छात्रा और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता को इस तरह निशाना बनाने की भाषा केवल व्यक्तिगत धमकी नहीं मानी जा सकती। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति के अधिकार और लोकतांत्रिक बहस पर सीधा हमला है। लोकतंत्र में किसी विचार से असहमति का उत्तर तर्क है, हिंसा नहीं। किसी प्रदर्शनकारी का सिर फोड़ देना, किसी महिला कार्यकर्ता को ‘टारगेट’ बताना या किसी समुदाय के प्रति हिंसक भाषा का इस्तेमाल करना राजनीतिक विचारधारा नहीं है। यह कानून और सामाजिक मर्यादा दोनों की सीमाओं को पार करने वाली मानसिकता है। Editorial
स्वतंत्र भारद्वाज के कथित पॉडकास्ट में मुस्लिम समुदाय को लेकर जिस तरह की भाषा इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है, वह भी गंभीर चिंता का विषय है। किसी व्यक्ति का हिंदुत्ववादी होना उसका संवैधानिक अधिकार हो सकता है। किसी भी विचारधारा का समर्थक होना भी लोकतंत्र में अपराध नहीं है। लेकिन किसी धर्म या समुदाय के प्रति सामूहिक घृणा फैलाना, उसे निशाना बनाने की बात करना या हिंसा का वातावरण तैयार करना लोकतांत्रिक अधिकार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। भारत की ताकत ही इसकी विविधता रही है। यहां मंदिर की घंटी और मस्जिद की अजान के बीच सदियों से समाज ने अपनी साझा जिंदगी बनाई है। इस साझी विरासत को किसी राजनीतिक या धार्मिक एजेंडे की प्रयोगशाला बनाना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। Editorial
दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण को किसी अकेली और असामान्य घटना की तरह देखकर आगे बढ़ जाना समस्या का समाधान नहीं है। गुजरात दंगों के दौरान सामने आए कई मामले इस बात की भयावह याद दिलाते हैं कि जब राजनीतिक या सामुदायिक उन्माद हिंसा से मिल जाता है तो परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है। 2007 में तहलका के पत्रकार आशीष खेतान द्वारा किए गए ‘ऑपरेशन कलंक’ स्टिंग ऑपरेशन में गुजरात दंगों से जुड़े कई लोगों के कथित बयान सामने आए थे। इनमें बजरंग दल से जुड़े बाबू बजरंगी का नाम प्रमुख था। नरोदा पाटिया मामले में उसके खिलाफ गंभीर आरोप साबित हुए और अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में उसकी सजा के बावजूद स्वास्थ्य संबंधी आधार पर उसे जमानत मिली। 2023 में नरोदा गांव मामले में वह अन्य आरोपियों के साथ बरी भी हुआ। लेकिन नरोदा पाटिया मामले में उसकी दोषसिद्धि और उससे जुड़ी न्यायिक प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और पीड़ादायक अध्याय है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी आरोपी के किसी मामले में बरी होने का अर्थ यह नहीं होता कि वह हर दूसरे मामले में भी निर्दोष घोषित हो गया। इसी तरह किसी मामले में दोषसिद्धि का अर्थ भी यह नहीं कि व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए हर आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध हो गए। न्यायिक प्रक्रिया को तथ्यों और फैसलों के आधार पर ही समझना चाहिए। Editorial
गुजरात दंगों से जुड़े मामलों ने देश के सामने कई ऐसे सवाल रखे जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। नरोदा पाटिया में बड़ी संख्या में लोगों की हत्या हुई। एहसान जाफरी की हत्या भारतीय इतिहास में सांप्रदायिक हिंसा की भयावह मिसाल बन गई। बेस्ट बेकरी कांड ने न्याय व्यवस्था और गवाहों की सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए। बिलकिस बानो प्रकरण में सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषियों की समयपूर्व रिहाई ने पूरे देश में बहस पैदा की और अंततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दोषियों को वापस जेल जाना पड़ा। इन घटनाओं को केवल हिंदू-मुस्लिम विवाद की नजर से देखना भी गलत होगा। मूल प्रश्न कानून के शासन का है।यदि अपराधी का धर्म देखकर कानून बदलता है तो वह कानून नहीं रहता। यदि आरोपी की राजनीतिक पहुंच देखकर पुलिस की कार्रवाई बदलती है तो वह निष्पक्ष पुलिसिंग नहीं रहती। और यदि भीड़ की विचारधारा देखकर अपराध की गंभीरता तय होने लगे तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण आधार समान न्याय कमजोर पड़ जाता है। Editorial
यह भी साफ किया जाना चाहिए कि हिंसा और नफरत की आलोचना को किसी एक राजनीतिक विचारधारा के खिलाफ अभियान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, हिंदुत्ववादी हो या धर्मनिरपेक्ष, किसी भी विचारधारा का व्यक्ति यदि हिंसा को जायज ठहराता है तो उसका विरोध होना चाहिए। भारत का संविधान किसी राजनीतिक विचारधारा का विरोध करने के लिए नागरिक को जेल नहीं भेजता। लेकिन संविधान हिंसा, धमकी और अपराध को विचारधारा का सुरक्षा कवच भी नहीं देता। यही वह बारीक रेखा है जिसे आज की राजनीति में बार-बार मिटाने की कोशिश की जा रही है। Editorial
सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्वतंत्र जैसे युवाओं को वैचारिक आत्मविश्वास के बजाय वैचारिक आक्रामकता कहां से मिलती है? कौन उन्हें बताता है कि दूसरे धर्म से नफरत करना राष्ट्रवाद है? कौन उन्हें समझाता है कि सड़क पर किसी को पीट देना बहादुरी है? कौन उन्हें यह भरोसा दिलाता है कि राजनीतिक संपर्क होने पर कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता? और कौन उनकी भाषा को ‘युवा जोश’ कहकर नजरअंदाज करता है? यहां समाज को आत्ममंथन करना होगा। सोशल मीडिया और पॉडकास्ट की दुनिया ने हर व्यक्ति को अपना मंच दे दिया है। यह लोकतंत्र के लिए अवसर भी है और खतरा भी। यदि इस मंच का उपयोग विचार रखने के बजाय किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने, हिंसा को महिमामंडित करने और विरोधियों को धमकाने के लिए किया जाएगा तो समाज में अविश्वास और हिंसा का विस्तार होना स्वाभाविक है। Editorial
आज स्वतंत्र भारद्वाज एक नाम है। कल कोई दूसरा नाम सामने आ सकता है। उसके बाद तीसरा। समस्या किसी एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर देने से समाप्त नहीं होगी। जरूरत इस बात की है कि नफरत की उस पूरी मानसिकता को चुनौती दी जाए जो युवाओं को यह विश्वास दिलाती है कि दूसरे समुदाय से घृणा करना उनकी धार्मिक पहचान का हिस्सा है और हिंसा उनकी मर्दानगी या बहादुरी का प्रमाण। हमें स्कूलों और विश्वविद्यालयों में संवैधानिक मूल्यों की चर्चा बढ़ानी होगी। युवाओं को इतिहास का वह पक्ष भी पढ़ाना होगा जिसमें भारत की पहचान संघर्ष के साथ-साथ सह-अस्तित्व, संवाद और साझी संस्कृति से बनी है। राजनीतिक दलों को भी यह तय करना होगा कि किसी अपराधी का राजनीतिक झुकाव उसकी जवाबदेही कम नहीं करेगा। पुलिस को यह भरोसा पैदा करना होगा कि शिकायतकर्ता किसी भी धर्म, जाति, राजनीतिक दल या सामाजिक वर्ग का हो कानून उसके साथ खड़ा होगा और समाज को यह तय करना होगा कि वह हिंसक नफरत को मनोरंजन की तरह नहीं देखेगा। Editorial
महात्मा गांधी का भारत वह भारत था जिसमें असहमति के बावजूद संवाद की गुंजाइश थी। संविधान निर्माताओं का भारत वह भारत था जिसमें नागरिक की पहचान उसके धर्म से पहले उसके संवैधानिक अधिकारों से होती थी। आज जरूरत इसी भारत को बचाने की है। हमें यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को ऐसा भारत देना चाहते हैं जहां किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से नफरत करना गर्व समझा जाए या ऐसा भारत जहां मंदिर जाने वाला और मस्जिद जाने वाला दोनों समान सुरक्षा और सम्मान के साथ रह सकें। हमें ऐसा भारत चाहिए जहां पुलिस किसी नेता के फोन से नहीं, संविधान और कानून से चले। हमें ऐसा भारत चाहिए जहां छात्र अपने सवाल पूछ सके और उसे ‘टारगेट’ बनाने की धमकी न मिले। हमें ऐसा भारत चाहिए जहां किसी अपराध को अपराध कहने से पहले आरोपी की राजनीतिक पहचान पूछने की जरूरत न पड़े। Editorial
स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण से सबसे बड़ी सीख यही है कि नफरत के खिलाफ केवल सरकार या अदालतों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। नागरिक समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। छात्रों, युवाओं, शिक्षकों, पत्रकारों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों सभी को मिलकर यह वातावरण बनाना होगा कि हिंसा का समर्थन करने वाला व्यक्ति किसी भी विचारधारा का हो, उसे सामाजिक सम्मान का पुरस्कार न मिले। किसी अपराधी को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप यदि सामने आता है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी निर्दोष को राजनीतिक कारणों से परेशान करना भी उतना ही गलत है। कानून का राज तभी मजबूत होगा जब न्याय की कसौटी व्यक्ति की पहचान नहीं, उसका कृत्य होगा। आज जरूरत किसी एक ‘स्वतंत्र’ को खलनायक बनाकर कहानी खत्म करने की नहीं है। जरूरत उस मानसिकता को पहचानने की है जो देश के करोड़ों युवाओं के बीच नफरत को विचार और हिंसा को साहस बनाकर पेश कर रही है। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि स्वतंत्र भारद्वाज कितने हैं। सवाल यह है कि हमारे समाज ने कितने ‘स्वतंत्र’ पैदा होने की जमीन तैयार कर दी है और उससे भी बड़ा सवाल क्या हम समय रहते उस जमीन को बदल पाएंगे? यही फैसला आने वाली पीढ़ियां हमारे बारे में करेंगी। Editorial
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