क्या सावरकर के बहाने इस सच का सामना करने से डर रही कांग्रेस!
Rajnath Singh on Veer Savarkar
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 03:11 AM
सावरकर का नाम आते ही राजनीतिक हलके में तूफान मच जाता है। कुछ लोग विनायक दामोदर सावरकर का नाम सुनते ही भड़क जाते हैं? इसकी वजह सिर्फ विचारधारा नहीं है, इसके लिए कुछ और चीजें भी जिम्मेदार हैं।
आजादी की लड़ाई में भी शामिल थीं दो विचाराधाराएं
भारत की आजादी में योगदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जाता है। नरम दल और गरम दल। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेताओं को नरम दल कहा जाता था और लाल, बाल, पाल को गरम दल का समर्थक माना जाता था।
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, सुभाष चंद्र बोस या सावरकर भी गरम दल का ही हिस्सा माने जाते थे। दोनों ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराना चाहते थे। लेकिन, उनकी विचारधारा में अंतर था। नरम दल का मानना था कि अंग्रेज कितना भी अत्याचार क्यों न करें हमें उनके खिलाफ हिंसा नहीं करनी चाहिए। जबकि, गरम दल अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने को सही मानता था।
इतिहास लेखन पर उठते रहे हैं ये सवाल
आजादी के बाद जो इतिहास लिखा गया उसे लेकर यह सवाल उठता रहा है कि देश को आजादी दिलाने में किसने कितना योगदान दिया। इतिहासकारों पर यह आरोप लगा कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कुछ नेताओं को खास तवज्जो दी। जबकि, स्वतंत्रता के लिए यातनाएं सहने और जान गंवाने के बावजूद कुछ नेताओं का जिक्र भर करके छोड़ दिया गया।
यानी कुछ नेताओं को हीरो और कुछ को साइड हीरो बना कर छोड़ दिया गया। जबकि, आजादी के तुरंत बाद भारत का विभाजन हुआ। इस विभिषिका में लाखों की मौत हुई और हजारों परिवार विस्थापित हुए।
हीरो और विलेन बनाने का लोभ
जाहिर है कि इसके लिए किसी न किसी को विलेन बनाना भी जरूरी था। आजादी की लड़ाई और बंटवारे के दौरान जो कुछ भी अच्छा हुआ उसका श्रेय कुछ खास नेताओं को दिया गया। इस दौर में होने वाली हर बुरी चीज का ठीकरा कुछ नेताओं और उनसे जुड़ी विचारधारा पर फोड़ दिया गया। जाहिर है, वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता।
समय बितने के साथ यह मांग जोर पकड़ने लगी कि इतिहास में जो कुछ भी लिखा है, क्या वह पूरा सच है? या इतिहासकारों से भी कुछ गलतियां हुई हैं जिनमें सुधार की जरूरत है?
असल में सावरकर के बारे में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान के बाद उठे विवाद के मूल में यही प्रश्न है। पृथ्वी का चक्कर सूर्य लगाता है या सूर्य के चारों ओर धरती घूमती है? विज्ञान के इस सवाल पर सदियों तक विवाद रहा। क्योंकि, दोनों के समर्थक खुद को सही और दूसरे को गलत मानते थे। विज्ञान ने तरक्की की और यह साबित हुआ कि सूर्य तो अपनी जगर पर स्थिर है।
क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए?
जब विज्ञान के किसी सवाल पर विचार या पुनर्विचार हो सकता है, तो इतिहास के बारे में उठने वाले सवाल पर इतना हंगामा क्यों? किसी सवाल को सिर्फ इस आधार पर खारिज कर देना कि इससे सांप्रदायिक शक्तियों को बढ़ावा मिलेगा, क्या सही है?
लंबे समय तक यह कहा जाता रहा कि अयोध्या मामले का फैसला अगर किसी एक समुदाय के पक्ष में आया, तो देश में आग लग जाएगी। क्या ऐसा हुआ? कहा जाता रहा कि अगर कश्मीर से धारा 370 हटाई गई, तो कश्मीर जल उठेगा। क्या ऐसा हुआ? किसी विवाद को सुलझाने के बजाए, उसे अनजाने डर के बस्ते में दबाए रखना क्या सही है?
देश को आजाद हुए 70 साल से ज्यादा हो चुके हैं। लगभग तीन पीढ़ियों से लोग एक-दूसरे के साथ रहने के आदी हो चुके हैं। शायद वक्त आ गया है कि उन सवालों पर खुलकर बात हो जिसे अब तब दबाया या छुपाया गया। चाहे वह सवाल इतिहास, भूगोल, विज्ञान, धर्म या आस्था किसी से भी जुड़ा क्यों न हो।
-संजीव श्रीवास्तव