Vande Mataram History: वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर एक बार फिर इस गीत का इतिहास चर्चा में है। आखिर किसने इसे लिखा, इसे लिखने की प्रेरणा कहां से मिली और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी क्या भूमिका रही? आइए समझते हैं।

“वंदे मातरम्”... ये दो शब्द सुनते ही मन में देशभक्ति की भावना जाग उठती है। भारत का राष्ट्रीय गीत रहा यह गीत आजादी की लड़ाई के दौरान लोगों के लिए सिर्फ एक गीत नहीं था बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज और एकता का प्रतीक बन गया था। इसकी पंक्तियों ने स्वतंत्रता सेनानियों में जोश भरने का काम किया। वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर एक बार फिर इस गीत का इतिहास चर्चा में है। आखिर किसने इसे लिखा, इसे लिखने की प्रेरणा कहां से मिली और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी क्या भूमिका रही? आइए समझते हैं।
वंदे मातरम् की रचना महान लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। माना जाता है कि उन्होंने 7 नवंबर 1875 को इस गीत की रचना की थी। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। उस दौर में भारत पर ब्रिटिश शासन था। अंग्रेजी हुकूमत भारतीयों पर अपनी संस्कृति और प्रतीकों को थोपने की कोशिश कर रही थी। इसी माहौल में बंकिम चंद्र ने भारत माता की स्तुति में वंदे मातरम् की रचना की। गीत के सामने आते ही लोगों को इसमें अपने देश और मातृभूमि की झलक दिखाई दी। धीरे-धीरे यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का अहम हिस्सा बन गया।
वंदे मातरम् की रचना के पीछे देश के प्रति प्रेम और उस समय के राजनीतिक माहौल को बड़ी वजह माना जाता है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय उस समय सरकारी सेवा में थे और उन्होंने अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीयों के सामने आने वाली परिस्थितियों को करीब से देखा था। भारत की धरती पर विदेशी सत्ता और उसके प्रभाव ने उनके भीतर देश के प्रति सम्मान की भावना को और मजबूत किया। इसी भाव से उन्होंने मातृभूमि को समर्पित यह गीत लिखा। बाद में जब यह रचना ‘आनंदमठ’ में प्रकाशित हुई तो इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी।
वंदे मातरम् को पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से गाया गया था। इसे महान कवि और संगीतकार रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी धुन में प्रस्तुत किया था। इसके बाद यह गीत देश के अलग-अलग हिस्सों में लोकप्रिय होने लगा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में लोग इसे उत्साह के साथ गाते थे।
वंदे मातरम् धीरे-धीरे स्वतंत्रता सेनानियों के बीच एक लोकप्रिय नारा बन गया। अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोग इसे गाते और इसके जरिए अपनी एकजुटता दिखाते थे। ब्रिटिश सरकार को इस गीत की बढ़ती लोकप्रियता पसंद नहीं थी। कई जगहों पर इसे रोकने की कोशिश की गई और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई भी हुई लेकिन प्रतिबंध और दबाव के बावजूद इसकी आवाज लोगों के बीच बनी रही। यही वजह है कि वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की यादों से गहराई से जुड़ गया।
भारत की आजादी के बाद 24 जनवरी 1950 को वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया। इसी दिन ‘जन गण मन’ को भारत के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया। इस तरह दोनों गीतों का देश के इतिहास में विशेष स्थान बन गया। जहां जन गण मन राष्ट्रगान है वहीं वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मानित है।
वंदे मातरम् की शुरुआती पंक्तियां संस्कृत में हैं जबकि आगे के हिस्से में बंगाली का प्रयोग किया गया है। इसकी लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं रही और इसका अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद भी किया गया। अरविंद घोष ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया था। बाद में इसे दूसरी भारतीय भाषाओं में भी लोगों तक पहुंचाया गया।
कई बार लोग ‘वंदे मातरम्’ को ‘बंदे मातरम्’ भी लिखते या बोलते हैं। आम बोलचाल में दोनों शब्द सुनने को मिलते हैं लेकिन राष्ट्रीय गीत का सही नाम ‘वंदे मातरम्’ है। ‘वंदे’ का अर्थ मातृभूमि को नमन करना या वंदना करना है। इसलिए यह केवल एक नारा नहीं बल्कि भारत माता के प्रति सम्मान की भावना को व्यक्त करता है।
वंदे मातरम् भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मानित है। हालांकि किसी व्यक्ति को इसे गाने के लिए जबरन मजबूर नहीं किया जा सकता लेकिन सार्वजनिक रूप से इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालना या इसका अपमान करना कानूनी विवाद का विषय बन सकता है। इसलिए राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना हर नागरिक की जिम्मेदारी मानी जाती है।
वंदे मातरम् की शुरुआत मातृभूमि की सुंदरता और समृद्धि का वर्णन करने वाली पंक्तियों से होती है-
“वंदे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यशामलां मातरम्।”
इन पंक्तियों में भारत की धरती को जल, फसल, हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर मां के रूप में देखा गया है। यही भाव इस गीत को भारतीयों के दिल से जोड़ता है।
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