वेद वाणी नारी को सम्मान के साथ नया जीवन शुरू करने की प्रेरणा देती है। अथर्ववेद 18-3-4 में पुनर्विवाह, प्रेम और सुखी दांपत्य का संदेश जानिए।

Editorial : आज की वेद वाणी नारी के जीवन, सम्मान और नए आरंभ के अधिकार का प्रेरणादायी संदेश देती है। अथर्ववेद के मंत्र में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, दांपत्य में परस्पर प्रेम तथा सम्मान और धर्म एवं दिव्यता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा निहित है। Editorial
अथर्ववेद 18-3-4 में कहा गया है -
“प्रजानत्यघ्न्ये जीवलोकं देवानां पन्थां अनुसंचरन्ती।
अयं ते गोपतिस्तं जुषस्व स्वर्गं लोकं अधि रोहयैनं॥”
महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी द्वारा किए गए अनुवाद के भावार्थ के अनुसार, जिस स्त्री ने अपने पति को खो दिया है, उसके लिए जीवन की यात्रा अकेले तय करना आवश्यक नहीं है। यदि वह पुनर्विवाह का निर्णय लेती है तो इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। उसे अपने जीवन में नए अध्याय की शुरुआत करने का पूरा अधिकार है।
वेद वाणी नारी को संबोधित करते हुए कहती है कि वह संसार के जीवन-मूल्यों और मर्यादाओं को समझते हुए धर्म एवं दिव्यता के मार्ग पर आगे बढ़े। उसका नया जीवनसाथी उसके शरीर, मन और इंद्रियों की रक्षा करने वाला तथा उसका सम्मान करने वाला हो। दांपत्य जीवन को केवल सामाजिक बंधन के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान और परस्पर सहयोग की साझेदारी के रूप में देखने का संदेश दिया गया है। पति-पत्नी का संबंध ऐसा हो जो दोनों के जीवन में आनंद, सामंजस्य और सुख का विस्तार करे। इस वेद संदेश का सबसे महत्वपूर्ण भाव यह है कि नया आरंभ अतीत को नकारना नहीं, बल्कि जीवन को स्वीकार करना है। जीवन में किसी प्रियजन को खोने का दुख अपनी जगह है, लेकिन उस दुख के कारण भविष्य के सभी द्वार बंद हो जाएं, यह आवश्यक नहीं। मनुष्य को परिस्थितियों से आगे बढ़कर जीवन में सुख, सम्मान और नई संभावनाओं को स्वीकार करने का अधिकार है। आज की वेद वाणी आधुनिक समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि नारी के जीवन के फैसलों का सम्मान किया जाना चाहिए। विशेषकर विधवा महिला यदि पुनर्विवाह का निर्णय लेती है, तो उसे सामाजिक उपेक्षा या अनावश्यक रूढ़ियों के बजाय सम्मान, सहयोग और विश्वास मिलना चाहिए। Editorial
प्रचारित: आर्य जितेंद्र भाटिया
अनुवाद: महात्मा ज्ञानेंद्र अवाना जी
ऑडियो रिकॉर्डिंग: सुकांत आर्य
स्रोत: अथर्ववेद 18-3-4
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