विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर बढ़ते खतरे को समझने की जरूरत है। स्वतंत्र लेखक वीरेंद्र हीरालाल पथरिया का यह संपादकीय विकास और विवेक के बीच संतुलन पर गंभीर सवाल उठाता है।

लेखक: वीरेंद्र हीरालाल पथरिया, स्वतंत्र लेखक
Editorial : विकास को हमने जन्म दिया। उसे पाला-पोसा, बड़ा किया और उसकी रफ्तार लगातार बढ़ाते चले गए। हमने उसके लिए सड़कें बनाईं, शहर बसाए, कारखाने लगाए, तकनीक विकसित की और जीवन को सुविधाओं से भर दिया। लेकिन इस पूरी यात्रा में शायद एक बड़ी भूल हो गई हमने विकास को पंख तो दिए, लेकिन विवेक नहीं दिया। आज वही विकास जब अंधाधुंध दौड़ रहा है तो उसके रास्ते में कटता हुआ पेड़ दिखाई नहीं देता, सूखती नदी की पीड़ा सुनाई नहीं देती और टूटते पहाड़ का दर्द महसूस नहीं होता। प्रकृति बार-बार चेतावनी दे रही है। कहीं बाढ़ है, कहीं सूखा है, कहीं असहनीय गर्मी है, कहीं जहरीली हवा है और कहीं तेजी से गिरता भूजल भविष्य की चिंता बढ़ा रहा है। हम परेशान हैं। चिंतित हैं। लेकिन अक्सर इसका दोष विकास के सिर मढ़ देते हैं। क्या वास्तव में दोष विकास का है? शायद नहीं। दोष उस सोच का है, जिसने विकास को गति तो दी, लेकिन उसे जिम्मेदारी का संस्कार नहीं दिया। Editorial
विकास अपने आप में कोई बुरी चीज नहीं है। मनुष्य और समाज के लिए विकास आवश्यक है। यदि विकास नहीं हुआ होता तो आज की आधुनिक दुनिया की कल्पना भी संभव नहीं थी।
मनुष्य जंगलों से निकलकर गांवों तक पहुंचा। गांव शहर बने। सड़कें बनीं। बिजली दूर-दराज के इलाकों तक पहुंची। शिक्षा का विस्तार हुआ। चिकित्सा विज्ञान ने असंभव लगने वाली बीमारियों का इलाज संभव किया। विज्ञान और तकनीक ने दुनिया को हमारी मुट्ठी में ला दिया। कभी जिन दूरियों को तय करने में महीनों लगते थे, वे आज कुछ घंटों में पूरी हो जाती हैं। जिन बीमारियों को कभी मृत्यु का पर्याय माना जाता था, उनका उपचार संभव है। संचार क्रांति ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बैठे लोगों को एक-दूसरे के बेहद करीब ला दिया है।
यह सब विकास की उपलब्धियां हैं। इसलिए समस्या विकास में नहीं है। समस्या विकास की दिशा और उसकी सोच में है। जब विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग, अधिक मुनाफा और अधिक सुविधा रह जाए, तब विकास अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगता है। Editorial
हमने विकास को साधन दिए, लेकिन संस्कार नहीं। हमने उसे अधिकार दिए, लेकिन जिम्मेदारी नहीं। हमने उसे आगे बढ़ना सिखाया, लेकिन यह नहीं सिखाया कि कहां रुकना है।
यही हमारी सबसे बड़ी भूल है। आज विकास जब किसी जंगल से होकर गुजरता है तो उसके सामने खड़ा पेड़ उसे बाधा नजर आता है। क्योंकि हमने उसे सिखाया है कि सड़क सीधी होनी चाहिए और रास्ता छोटा होना चाहिए। विकास को नदी दिखाई देती है तो वह उसे पानी का स्रोत समझता है। हमने उसे यह तो बताया कि नदी से पानी मिलता है, लेकिन यह नहीं बताया कि नदी स्वयं एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है। पहाड़ दिखाई देता है तो उसकी कीमत पत्थर और खनिजों में तलाश ली जाती है। हमने यह समझाने की कोशिश नहीं की कि पहाड़ केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमने प्रकृति को संसाधन मान लिया और उसके अस्तित्व का महत्व भूल गए। Editorial
विकास की कहानी में एक और बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। हमने विकास से कहा और चाहिए। विकास ने पूछा - कितना? हमने कहा जितना मिल सके। यहीं से समस्या ने जन्म लिया।
जरूरत सुविधा बनी। सुविधा विलासिता बनी और विलासिता धीरे-धीरे लालच में बदल गई। एक घर पर्याप्त था, फिर बड़ा घर चाहिए था। एक वाहन पर्याप्त था, फिर कई वाहन चाहिए थे। आवश्यकता से अधिक उपभोग जीवनशैली बन गया। हमारी समस्या यह नहीं रही कि हमारे पास जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं है। समस्या यह बन गई कि हमारी इच्छाओं की कोई सीमा नहीं है। इसी असीमित इच्छा ने प्रकृति पर दबाव बढ़ाया। हमने जंगल काटकर शहर बनाए और फिर उन्हीं शहरों में हरियाली और ऑक्सीजन की चिंता करने लगे। हमने नदियों को प्रदूषित किया और फिर स्वच्छ पानी के लिए बोतलें खरीदने लगे। हमने धरती का अंधाधुंध दोहन किया और अब जलवायु परिवर्तन के खतरे से भयभीत हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है? जिस प्रकृति ने हमें जीवन दिया, आज उसी के अस्तित्व को बचाने के लिए हमें योजनाएं बनानी पड़ रही हैं। Editorial
प्रकृति से हमने जो लिया, उसका हिसाब कभी नहीं रखा। अब प्रकृति जो वापस मांग रही है, उसे हम संकट कह रहे हैं। बाढ़ आती है तो हम परेशान होते हैं। गर्मी बढ़ती है तो हम चिंतित होते हैं। भूजल स्तर गिरता है तो नई योजनाएं बनती हैं। हवा जहरीली होती है तो एयर प्यूरीफायर और प्रदूषण नियंत्रण की बातें शुरू हो जाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इन समस्याओं की जड़ तक जाने को तैयार हैं? क्या हम यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि हमारी विकास नीति, हमारी शहरी योजना और हमारी व्यक्तिगत जीवनशैली भी इन संकटों के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार है? सिर्फ समस्या पैदा होने के बाद उसका उपचार करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें विकास की उस सोच पर भी सवाल करना होगा, जो समस्या पैदा करती है। Editorial
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि विकास रोक दिया जाए। विकास को रोकना समाधान नहीं है। विकास को सही दिशा देना समाधान है। सड़क बने, लेकिन पेड़ों को बचाने के विकल्प भी तलाशे जाएं। उद्योग लगें, लेकिन नदी और हवा की कीमत पर नहीं। शहर बढ़ें, लेकिन उनके साथ हरियाली भी बढ़े। नई इमारतें बनें, लेकिन वर्षा जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था भी हो। पहाड़ों में निर्माण हो तो वहां की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को समझा जाए। नई तकनीक आए तो उसका इस्तेमाल मानव जीवन को बेहतर बनाने के साथ प्रकृति के संरक्षण के लिए भी हो। विकास की रफ्तार जरूरी है, लेकिन उस रफ्तार की लगाम भी उतनी ही जरूरी है। Editorial
हम अपने बच्चों को केवल बड़ा नहीं होने देते। हम उन्हें शिक्षा देते हैं, संस्कार देते हैं और सही-गलत का अंतर समझाते हैं। हम उन्हें बताते हैं कि ताकत का इस्तेमाल किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि किसी की मदद करने के लिए होना चाहिए। फिर हमने विकास को इतना बड़ा कर दिया, लेकिन उसे जिम्मेदारी का संस्कार क्यों नहीं दिया? हमें विकास से यह नहीं कहना है कि तुम मत दौड़ो। हमें उससे कहना है दौड़ो, लेकिन किसी को कुचलकर नहीं। आगे बढ़ो, लेकिन किसी का भविष्य छीनकर नहीं। निर्माण करो, लेकिन किसी का घर और पर्यावरण उजाड़कर नहीं। सुविधाएं पैदा करो, लेकिन धरती को बीमार करके नहीं। यही विकास का वास्तविक अर्थ होना चाहिए। Editorial
आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि विकास कैसे किया जाए। असली चुनौती यह है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें प्रगति का अर्थ केवल उत्पादन और मुनाफा न हो। हमें ऐसी तकनीक चाहिए जो मनुष्य के साथ प्रकृति के हित में भी काम करे। हमें ऐसी जीवनशैली चाहिए जिसमें सुविधा हो, लेकिन अनावश्यक उपभोग न हो। क्योंकि आने वाली पीढ़ियां शायद हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमने कितनी सड़कें बनाईं, कितनी ऊंची इमारतें खड़ी कीं, कितने कारखाने लगाए या हमारी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हुई। वे शायद हमसे सिर्फ इतना पूछेंगी “जब तुम्हारे पास सब कुछ बनाने की शक्ति थी, तब तुमने हमारे लिए रहने लायक धरती क्यों नहीं बचाई?” यह सवाल हमारे समय का सबसे बड़ा सवाल हो सकता है। Editorial
विकास हमारा दुश्मन नहीं है। वह हमारी अपनी रचना है। गलती केवल इतनी हुई कि हमने उसे बड़ा तो कर दिया, लेकिन उसे जिम्मेदारी का संस्कार देना भूल गए। अब भी देर नहीं हुई है। हमें विकास के पंख काटने की जरूरत नहीं है। हमें उन पंखों को विवेक की दिशा देने की जरूरत है। हमें विकास की गति कम करने की जरूरत नहीं है। हमें उसकी दिशा सही करने की जरूरत है। हमें विकास और प्रकृति के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि संवाद स्थापित करना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि धरती केवल हमारी जरूरतें पूरी करने के लिए नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों की भी विरासत है। वास्तविक प्रगति वही है, जिसमें आज की पीढ़ी की जरूरतें पूरी हों और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहे। इसलिए विकास के पंख मत काटिए। उन पंखों को विवेक की दिशा दीजिए। क्योंकि संस्कारहीन विकास विनाश बन जाता है और संस्कारित विकास ही सच्ची प्रगति है। Editorial
वीरेंद्र हीरालाल पथरिया
स्वतंत्र लेखक
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