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Barrel Meaning: "कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल बढ़ गई" या "प्रति बैरल इतनी डॉलर हो गई है।" लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि तेल की दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले "बैरल" शब्द का मतलब क्या होता है।

What is Barrel : तेल की कीमतों की बात जब भी होती है खबरों में अक्सर सुनने को मिलता है कि "कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल बढ़ गई" या "प्रति बैरल इतनी डॉलर हो गई है।" लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि तेल की दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले "बैरल" शब्द का मतलब क्या होता है। अगर आपका जवाब न है तो यह आर्टिकल आपके बेहद काम आने वाला है। चलिए जानते हैं कि आखिर बैरल होता क्या है?
बैरल एक माप की इकाई है जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कच्चे तेल (Crude Oil) की मात्रा को मापने के लिए किया जाता है। एक तेल का बैरल लगभग 159 लीटर के बराबर होता है। अगर किसी खबर में कहा जाए कि कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल है तो इसका मतलब है कि 159 लीटर कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर है। हालांकि आम बोलचाल में लोग बैरल को एक बड़े ड्रम के रूप में भी जानते हैं लेकिन तेल उद्योग में यह सिर्फ एक कंटेनर नहीं बल्कि मात्रा मापने का एक अंतरराष्ट्रीय मानक है।
बैरल शब्द की शुरुआत कई सौ साल पहले यूरोप और अमेरिका में हुई थी। उस समय शराब, तेल और अन्य तरल पदार्थों को लकड़ी के पीपों में रखा जाता था। बाद में जब तेल उद्योग का विस्तार हुआ तो व्यापार में एक समान माप की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद बैरल को आधिकारिक माप इकाई के रूप में अपनाया गया और आज भी तेल बाजार में इसका उपयोग किया जाता है।
बैरल का उपयोग सबसे ज्यादा कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के लिए किया जाता है। इसके अलावा कुछ देशों में बीयर, वाइन और अन्य तरल पदार्थों की मात्रा भी बैरल में मापी जाती है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैरल शब्द सबसे ज्यादा तेल उद्योग से जुड़ा हुआ है।
जब लोग पहली बार प्रति बैरल शब्द सुनते हैं तो उनके मन में सबसे बड़ा सवाल यही आता है कि आखिर एक बैरल में कितना तेल होता है। इसका जवाब जानना जरूरी है क्योंकि तेल की वैश्विक कीमतें इसी आधार पर तय होती हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार 1 बैरल कच्चे तेल में लगभग 159 लीटर तेल होता है। अमेरिका में इसे 42 गैलन के बराबर माना जाता है। पूरी दुनिया में कच्चे तेल की खरीद-बिक्री इसी मानक के आधार पर की जाती है।
एक बैरल कच्चे तेल को रिफाइनरी में प्रोसेस करने के बाद उससे अलग-अलग उत्पाद बनाए जाते हैं। सामान्य तौर पर एक बैरल से लगभग 70 से 75 लीटर पेट्रोल, 40 से 45 लीटर डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद प्राप्त होते हैं। हालांकि यह मात्रा तेल की गुणवत्ता और रिफाइनिंग प्रक्रिया पर निर्भर करती है।
तेल का कारोबार दुनिया के लगभग हर देश में होता है। ऐसे में सभी देशों के लिए एक समान माप प्रणाली जरूरी थी। इसी वजह से बैरल को अंतरराष्ट्रीय मानक बनाया गया ताकि तेल की कीमतों और मात्रा को लेकर किसी तरह की भ्रम की स्थिति न बने।
दुनिया के अधिकांश देशों में कच्चे तेल की खरीद और बिक्री अंतरराष्ट्रीय बाजारों के जरिए होती है। अगर हर देश अपनी अलग माप इकाई इस्तेमाल करे तो व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए बैरल को एक वैश्विक मानक बनाया गया। ब्रेंट क्रूड, डब्ल्यूटीआई (WTI) और इंडियन बास्केट क्रूड जैसे सभी प्रमुख तेल बेंचमार्क की कीमतें डॉलर प्रति बैरल में घोषित की जाती हैं। इससे निवेशकों, कंपनियों और सरकारों को कीमतों की तुलना करने में आसानी होती है।
लीटर एक सामान्य माप इकाई है जिसका उपयोग रोजमर्रा के जीवन में किया जाता है। हम पेट्रोल पंप पर पेट्रोल और डीजल लीटर में खरीदते हैं। वहीं बैरल एक बड़ी मात्रा को दर्शाने वाली अंतरराष्ट्रीय इकाई है जिसका उपयोग तेल उद्योग में होता है। उदाहरण के लिए यदि कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल है तो इसका मतलब 159 लीटर तेल की कीमत 100 डॉलर है। इसी आधार पर आगे रिफाइनिंग, टैक्स और अन्य खर्च जोड़कर पेट्रोल-डीजल की कीमत तय होती है।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में बैरल की कीमत बढ़ने या घटने का सीधा असर भारत पर पड़ता है। जब कच्चे तेल का भाव बढ़ता है तो तेल कंपनियों की लागत बढ़ जाती है जिसका असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इसी तरह जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है तो सरकार और तेल कंपनियों के पास कीमतों में राहत देने की संभावना बढ़ जाती है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं में से एक है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला बदलाव भारत पर भी असर डालता है। जब तेल की कीमत बढ़ जाती है तो परिवहन की लागत बढ़ सकती है। इसका असर कई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि सरकार, उद्योग और आम लोग सभी तेल की कीमतों पर नजर रखते हैं।
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