पत्रकारिता के उपर चेतना मंच का यह विशेष संपादकीय उसकी निष्पक्षता, स्वतंत्र कलम व सत्ता से सवाल पूछने की जिम्मेदारी तथा अपने ही खेमे की गलतियों पर आवाज उठाने के साहस पर गंभीर विमर्श करता है।

लेखक - आरपी रघुवंशी ( वरिष्ठ पत्रकार तथा चेतना मंच के संपादक है )
Editorial : कभी पत्रकारिता को मिशन कहा जाता था। कभी पत्रकार की पहचान उसके राजनीतिक झुकाव से नहीं, उसकी कलम की विश्वसनीयता से होती थी। कभी पत्रकार सत्ता के दरवाजे पर जाकर सवाल पूछता था और लौटकर जनता को बताता था कि सत्ता ने क्या जवाब दिया। आज तस्वीर बदलती हुई दिखाई देती है। पत्रकारिता के मैदान में जैसे दो अलग-अलग खेमे खड़े हो गए हैं। एक खेमा सत्ता के इतना करीब चला गया है कि उसे सत्ता की गलतियां भी उपलब्धियां दिखाई देती हैं। सरकार कुछ करे तो वाहवाही, कुछ न करे तो भी तर्क। सवाल पूछने की जगह प्रशंसा और पड़ताल की जगह गुणगान। दूसरा खेमा सत्ता से इतना दूर खड़ा है कि उसे सत्ता की कोई उपलब्धि दिखाई ही नहीं देती। सरकार कुछ करे तो उसमें षड्यंत्र, कुछ न करे तो उसमें नाकामी। अच्छी पहल भी संदेह के चश्मे से और हर निर्णय भी विरोध के आईने से देखा जाता है। लेकिन इन दोनों के बीच वह पत्रकार कहां है, जो कह सके—जो अच्छा है, वह अच्छा है और जो गलत है, वह गलत है? यही आज का सबसे बड़ा सवाल है। Editorial
पत्रकारिता का जन्म किसी राजनीतिक दल की सेवा के लिए नहीं हुआ था। न सत्ता की आरती उतारने के लिए। न सत्ता को हर बात में कटघरे में खड़ा करने के लिए।
पत्रकारिता का जन्म इसलिए हुआ था ताकि जनता को सच बताया जा सके। लेकिन जब पत्रकार खबर लिखने से पहले यह तय करने लगे कि खबर से कौन खुश होगा और कौन नाराज, तब पत्रकारिता का चरित्र बदलने लगता है। फिर खबर खबर नहीं रहती। वह किसी पक्ष का बयान बन जाती है और जिस दिन खबर से पहले पक्ष तय हो जाए, उस दिन सच पीछे छूट जाता है। सवाल यह नहीं है कि पत्रकार किसके पक्ष में है। सवाल यह है कि पत्रकार सच के पक्ष में है या नहीं। Editorial
सत्ता को सवाल पसंद नहीं आते यह लोकतंत्र की पुरानी समस्या है। लेकिन इससे भी बड़ी समस्या तब पैदा होती है, जब पत्रकार स्वयं सवाल पूछना छोड़ दे। सत्ता के पास शक्ति होती है। पत्रकारिता के पास सवाल। सत्ता के पास आदेश देने की क्षमता होती है। पत्रकारिता के पास जनता को जानकारी देने की जिम्मेदारी। इसलिए जब पत्रकार सत्ता की हर बात पर सिर झुकाने लगे तो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण प्रहरी स्वयं कमजोर हो जाता है। सरकार ने अच्छा काम किया है? लिखिए। जनता को लाभ मिला है? बताइए। किसी अधिकारी ने अच्छा काम किया है? उसकी प्रशंसा कीजिए। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उसी सरकार, उसी अधिकारी या उसी व्यवस्था से सवाल पूछना बंद कर दिया जाए? बिल्कुल नहीं। प्रशंसा पत्रकारिता को कमजोर नहीं करती। अंधी प्रशंसा करती है। Editorial
यह बात भी उतनी ही कठोरता से कहनी होगी। सत्ता की आलोचना पत्रकारिता का अधिकार ही नहीं, कई बार जिम्मेदारी भी है। लेकिन हर बात में दोष तलाशना पत्रकारिता नहीं है। यदि किसी सरकार ने कोई महत्वपूर्ण काम किया है और पत्रकार केवल इसलिए उसे स्वीकार करने से इनकार कर दे क्योंकि उसकी राजनीतिक पसंद अलग है, तो वह भी पाठक के साथ न्याय नहीं कर रहा। सरकार की उपलब्धि को उपलब्धि कहना सत्ता की चापलूसी नहीं है और सरकार की गलती को गलती कहना विपक्षी राजनीति नहीं है। यह केवल पत्रकारिता है। काश हम इस सरल बात को फिर से समझ पाते। Editorial
मेरे गुरुजी की पत्रकारिता की सबसे बड़ी सीख आज भी मेरे भीतर गूंजती है सच को सच की तरह प्रस्तुत करो। उसके बाद अपनी बात पाठक पर मत थोपो। तथ्य रखो। घटना रखो। संबंधित पक्षों की बात रखो। दस्तावेज सामने रखो। जमीन की हकीकत सामने रखो और फिर फैसला पाठक पर छोड़ दो। क्योंकि पाठक को अपने निष्कर्ष तक पहुंचने का अधिकार है। पत्रकारिता का अर्थ यह नहीं कि पत्रकार पाठक का हाथ पकड़कर कहे - तुम्हें यही मानना है।” पत्रकारिता का अर्थ है “ये तथ्य हैं, इन्हें देखिए, समझिए और अपना फैसला स्वयं कीजिए।” यही स्वतंत्र पत्रकारिता है। Editorial
मेरे गुरुजी की एक पंक्ति आज भी पत्रकारिता के माथे पर लिखे सवाल की तरह खड़ी है “जब सच लिखने और बोलने में घबराहट महसूस हो, तो समझ लेना गुलामी की तरफ कदम बढ़ा रहे हो।” यह केवल सत्ता के भय की बात नहीं है। यह पत्रकार के भीतर पैदा होने वाले उस भय की बात भी है, जिसमें वह सोचता है
अगर यह लिख दिया तो मेरा कौन विरोध करेगा?
अगर यह सरकार के पक्ष में चला गया तो मुझे कौन क्या कहेगा?
अगर मैंने सरकार की आलोचना की तो मुझे किस खेमे में डाल दिया जाएगा?
अगर मैंने किसी विपक्षी नेता की अच्छी बात लिख दी तो क्या मुझे पक्षपाती कह दिया जाएगा?
और यहीं से पत्रकारिता की असली परीक्षा शुरू होती है।
कलम तभी स्वतंत्र है, जब वह अपने ही बनाए हुए डर से भी स्वतंत्र हो। Editorial
यह बात शायद सबसे ज्यादा कड़वी है। पहले पत्रकार सत्ता से सवाल करने से डरता था अब कई बार पत्रकार अपने ही खेमे से सवाल करने से डरता है। कहीं उसके समर्थक नाराज न हो जाएं। कहीं सोशल मीडिया पर ट्रोल न कर दिया जाए। कहीं उसे “सरकारी पत्रकार”, “विपक्षी पत्रकार”, “गोदी मीडिया”, “एंटी...” जैसे तमगों में न बांट दिया जाए। लेकिन पत्रकार का काम तमगा पहनना नहीं है। उसका काम सच तलाशना है। जिस पत्रकार की कलम को हर बार अपने समर्थकों से अनुमति लेनी पड़े, वह स्वतंत्र कैसे रह सकती है? और जो पत्रकार हर खबर से पहले यह देखे कि उसका अपना खेमा क्या सोचेगा, वह पाठक के प्रति ईमानदार कैसे रह सकता है? Editorial
सच्ची पत्रकारिता की सबसे कठिन परीक्षा तब होती है जब तथ्य आपके अपने विचार के खिलाफ खड़े हो जाएं। यदि आप किसी सरकार को पसंद करते हैं और उसी सरकार की कोई नीति गलत निकलती है तो क्या आप लिखेंगे? यदि आप किसी विपक्षी दल के समर्थक हैं और उसी दल का कोई नेता गलत करता है तो क्या आप लिखेंगे? यदि आपके प्रिय नेता का बयान तथ्यात्मक रूप से गलत है तो क्या आप उसे गलत कहेंगे? यदि आपके विरोधी नेता ने कोई अच्छा काम किया है तो क्या आप उसे अच्छा कहने का साहस करेंगे? यहीं तय होता है कि आप पत्रकार हैं या किसी खेमे के प्रवक्ता।
झूठ खतरनाक है। लेकिन आधा सच कई बार उससे भी अधिक खतरनाक होता है। क्योंकि आधा सच सुनने वाले को लगता है कि उसने पूरी सच्चाई जान ली है। एक घटना का केवल एक पक्ष दिखाना। एक बयान का केवल वही हिस्सा दिखाना जो अपनी बात के अनुकूल हो। किसी उपलब्धि को छिपा देना। किसी कमी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना। यह सब भी पत्रकारिता की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाता है। सच केवल वही नहीं है जो हमारी बात साबित करता है। सच वह भी है जो हमारी धारणा को गलत साबित कर दे। इसे स्वीकार करने का साहस ही पत्रकारिता की असली रीढ़ है।
आज खबरों में कई बार ऐसा लगता है जैसे पत्रकार ने खबर लिखने से पहले ही फैसला सुना दिया। आरोप आया दोषी घोषित। विरोध हुआ सरकार कटघरे में। सरकार ने जवाब दिया उसे भी खारिज। फिर पाठक के लिए बचता क्या है? पत्रकारिता को अदालत बनने की आवश्यकता नहीं है। पत्रकार को तथ्य रखने हैं। जांच करनी है। सवाल पूछने हैं। दस्तावेज तलाशने हैं। संबंधित पक्षों को सुनना है और जहां मामला जांच या न्यायिक प्रक्रिया में हो, वहां निष्कर्ष को तथ्य की सीमा से आगे नहीं ले जाना है। फैसला अदालत करे, राजनीतिक फैसला जनता करे और पत्रकार तथ्य सामने रखे। यही स्वस्थ लोकतंत्र है।
कलम तलवार बन जाए तो किसी को घायल कर सकती है। कलम प्रचार बन जाए तो किसी को भ्रमित कर सकती है। लेकिन कलम आईना बन जाए तो समाज को अपना चेहरा दिखा सकती है। हमें ऐसी ही पत्रकारिता चाहिए। ऐसी पत्रकारिता जो सत्ता को भी आईना दिखाए। विपक्ष को भी। प्रशासन को भी। समाज को भी और जरूरत पड़े तो पत्रकारिता को स्वयं को भी। क्योंकि लोकतंत्र में कोई भी पक्ष इतना बड़ा नहीं हो सकता कि उससे सवाल न पूछा जाए।
यह सवाल हमसे भी पूछा जा सकता है। हमारा उत्तर बहुत सरल है चेतना मंच किसी राजनीतिक गिरोह के साथ नहीं, सच के साथ खड़ा होना चाहता है। जहां सरकार अच्छा करेगी, वहां हम अच्छा कहेंगे। जहां सरकार से गलती होगी, वहां सवाल पूछेंगे। जहां विपक्ष जनता की आवाज उठाएगा, वहां उसे स्थान देंगे। जहां विपक्ष गलत होगा, वहां उससे भी सवाल करेंगे। जहां अधिकारी अच्छा काम करेंगे, वहां उनका सम्मान होगा। जहां व्यवस्था विफल होगी, वहां जनता की आवाज उठेगी और जहां सच अभी सामने नहीं आया है, वहां अनुमान को सच बनाकर प्रस्तुत करने से बचेंगे। क्योंकि पत्रकारिता में हमारी निष्ठा व्यक्ति से नहीं, तथ्य से होनी चाहिए।
अगर पत्रकारिता के दो ही विकल्प रह गए एक तरफ सत्ता की आरती,और दूसरी तरफ सत्ता से स्थायी नफरत तो फिर सच कहां जाएगा? अगर हर पत्रकार को किसी न किसी खेमे में खड़ा होना ही पड़ेगा, तो वह पत्रकार कब रहेगा? अगर सरकार की तारीफ करना चापलूसी और सरकार की आलोचना करना विरोध मान लिया जाएगा, तो पत्रकारिता का रास्ता कौन सा बचेगा? एक ही रास्ता बचता है सच का रास्ता। यह रास्ता आसान नहीं है। इस रास्ते पर दोनों तरफ से पत्थर पड़ सकते हैं। अपने नाराज हो सकते हैं। पराए नाराज हो सकते हैं। सत्ता नाराज हो सकती है। विपक्ष नाराज हो सकता है। सोशल मीडिया नाराज हो सकता है। लेकिन यदि तथ्य आपके साथ हैं और आपकी नीयत जनहित में है, तो पत्रकार को डरना नहीं चाहिए। क्योंकि जिस दिन पत्रकार यह सोचकर लिखेगा कि “लोग क्या कहेंगे”, उसी दिन उसकी कलम कमजोर हो जाएगी। जिस दिन पत्रकार यह सोचकर चुप होगा कि “सत्ता क्या करेगी”, उसी दिन लोकतंत्र कमजोर होग और जिस दिन पत्रकार यह सोचकर झूठ लिखेगा कि “मेरे लोग खुश होंगे”, उसी दिन पत्रकारिता की आत्मा घायल हो जाएगी। इसलिए जरूरी है कि हम फिर लौटें उस पत्रकारिता की ओर, जहां खबर का मूल्य इस बात से तय होता था कि वह कितनी सच है, न कि इस बात से कि वह किसके पक्ष में जाती है। हम फिर वही पत्रकारिता करें जिसमें सत्ता की उपलब्धि को उपलब्धि कहने में संकोच न हो और सत्ता की गलती को गलती कहने में डर न हो। जिसमें विरोधी की अच्छी बात स्वीकार करने में शर्म न हो और अपने प्रिय की गलती पर सवाल उठाने में भय न हो। क्योंकि सच का कोई गिरोह नहीं होता। सच का कोई झंडा नहीं होता। सच की कोई पार्टी नहीं होती। सच केवल सच होता है और पत्रकारिता की असली अग्निपरीक्षा यही है क्या हमारी कलम उस सच को भी लिख सकती है, जो हमें स्वयं पसंद नहीं है? यदि जवाब हाँ है, तो पत्रकारिता अभी जिंदा है और यदि जवाब नहीं है, तो फिर हमें सत्ता से पहले अपने भीतर झांकने की जरूरत है। चेतना मंच का संकल्प यही है न सत्ता की आरती, न सत्ता से दुश्मनी; न अंधा समर्थन, न अंधा विरोध।
जो गलत है, उसे गलत कहना और अंतिम फैसला पाठकों की विवेकशील चेतना पर छोड़ देना।** क्योंकि पत्रकार की कलम का सबसे बड़ा धर्म किसी के साथ होना नहीं, सच के साथ होना है।
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