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केरल का नाम देश के सबसे शिक्षित राज्यों में लिया जाता है। यहां लंबे समय से शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। खास बात यह रही कि यहां लड़कियों की पढ़ाई को भी बराबर प्राथमिकता मिली। यही कारण है कि मेडिकल और नर्सिंग एजुकेशन धीरे-धीरे मजबूत होती चली गई।

जब भी भारत की हेल्थ सर्विस की बात होती है डॉक्टरों के साथ नर्सों का नाम सबसे पहले आता है। अस्पतालों में मरीजों की देखभाल से लेकर इमरजेंसी हालात तक नर्सें हर जगह सबसे अहम भूमिका निभाती हैं। यही वजह है कि दुनियाभर में भारतीय नर्सों की मांग लगातार बढ़ रही है। खास बात यह है कि भारत की सबसे ज्यादा नर्सें एक ऐसे राज्य से आती हैं जिसे आज “नर्सों का गढ़” कहा जाता है यह राज्य कोई और नहीं बल्कि केरल है। इंटरनेशनल नर्सेस डे के मौके पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है कि आखिर केरल कैसे देश का सबसे बड़ा नर्सिंग हब बन गया। महाराष्ट्र में भले सबसे ज्यादा नर्सिंग कॉलेज हों लेकिन सबसे ज्यादा प्रशिक्षित और विदेशों में काम करने वाली नर्सों की पहचान आज भी केरल से जुड़ी हुई है।
केरल का नाम देश के सबसे शिक्षित राज्यों में लिया जाता है। यहां लंबे समय से शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। खास बात यह रही कि यहां लड़कियों की पढ़ाई को भी बराबर प्राथमिकता मिली। यही कारण है कि मेडिकल और नर्सिंग एजुकेशन धीरे-धीरे मजबूत होती चली गई। जब दूसरे राज्यों में महिलाएं सीमित क्षेत्रों तक ही रुक जाती थीं तब केरल की महिलाएं हेल्थ सेक्टर में आगे बढ़ रही थीं। समय के साथ नर्सिंग यहां सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि सम्मानजनक करियर बन गया। परिवारों ने भी अपनी बेटियों को इस प्रोफेशन में जाने के लिए प्रोत्साहित किया। यही सोच आगे चलकर केरल को देश का सबसे बड़ा नर्सिंग केंद्र बनाने में मददगार बनी।
केरल में नर्सिंग सेक्टर को बढ़ाने में चर्च और मिशनरियों का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है। अंग्रेजों के दौर में यहां मिशनरी संस्थाओं ने अस्पताल और नर्सिंग स्कूल शुरू किए। इससे महिलाओं के लिए हेल्थ सेक्टर में रोजगार के नए रास्ते खुले। ईसाई समुदाय की महिलाओं ने बड़ी संख्या में नर्सिंग को अपनाया। धीरे-धीरे यह प्रोफेशन पूरे समाज में स्वीकार होने लगा। जहां कई जगहों पर नर्सिंग को कम प्रतिष्ठित माना जाता था वहीं केरल में इसे सेवा और सम्मान दोनों से जोड़कर देखा गया।
1970 के दशक के बाद खाड़ी देशों में हेल्थ सेक्टर तेजी से बढ़ने लगा। वहां अस्पतालों और मेडिकल सुविधाओं के विस्तार के कारण प्रशिक्षित नर्सों की मांग बढ़ी। इसी समय केरल की नर्सों को विदेशों में बड़े अवसर मिलने शुरू हुए। केरल की नर्सें अंग्रेजी बोलने में अच्छी थीं और प्रोफेशनल ट्रेनिंग भी मजबूत थी। यही वजह रही कि उन्हें विदेशों में आसानी से नौकरी मिलने लगी। पहले कुछ नर्सें बाहर गईं फिर उनके जरिए दूसरी महिलाओं को भी रास्ता मिला। धीरे-धीरे यह एक मजबूत नेटवर्क बन गया। आज मिडिल ईस्ट से लेकर यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक भारतीय नर्सें अपनी सेवाएं दे रही हैं जिनमें बड़ी संख्या केरल की महिलाओं की है।
केरल में नर्सिंग कॉलेजों और मेडिकल संस्थानों का नेटवर्क काफी मजबूत है। यहां सरकारी और निजी दोनों स्तर पर अच्छी ट्रेनिंग दी जाती है। पढ़ाई के दौरान ही छात्रों को अस्पतालों में काम करने का अनुभव भी मिलता है। इससे वे जल्दी प्रोफेशनल माहौल में ढल जाती हैं। अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ ने भी केरल की नर्सों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया। विदेशों में काम करने के लिए भाषा सबसे बड़ी जरूरत होती है और इस मामले में केरल की नर्सें हमेशा मजबूत रही हैं।
एक समय ऐसा भी था जब नर्सिंग को महिलाओं के लिए ज्यादा सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था। लेकिन केरल में यह सोच ज्यादा समय तक नहीं रही। यहां नर्सिंग को सुरक्षित, स्थिर और सम्मानजनक करियर के रूप में देखा गया। जब विदेशों में काम करने वाली नर्सों ने अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति बदली तब समाज में इस पेशे को लेकर सम्मान और बढ़ गया। इसके बाद बड़ी संख्या में लड़कियों ने इस क्षेत्र को अपनाना शुरू कर दिया।
आज भारत में लाखों रजिस्टर्ड नर्सिंग कर्मचारी हैं और उनमें बड़ी हिस्सेदारी दक्षिण भारत के राज्यों की है। हालांकि महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा नर्सिंग कॉलेज हैं लेकिन अनुभव, विदेशों में मौजूदगी और लंबे इतिहास के मामले में केरल अब भी सबसे आगे माना जाता है।
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