देश में जब भी कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन होता है तो कई बार प्रदर्शनकारियों के हाथों में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर दिखाई देती है। कभी आपने सोचा है क्यों अगर नहीं तो इस आर्टिकल में आपके सवाल का जवाब मिल जाएगा।

देश में जब भी कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन होता है तो कई बार प्रदर्शनकारियों के हाथों में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर दिखाई देती है। हाल के दिनों में भी जब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों ने जश्न मनाया उस दौरान भी बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर प्रमुख रूप से नजर आई। प्रदर्शनकारियों के बीच ‘जय भीम’ के नारे लगाए गए और अंबेडकर की तस्वीर को आगे रखा गया। यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं बल्कि अधिकार, समानता और संविधान में विश्वास का प्रतीक बन चुकी है।
देश के कई बड़े आंदोलनों में बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर देखने को मिली है। चाहे किसान आंदोलन हो या नागरिकता कानून को लेकर हुए प्रदर्शन, कई मौकों पर आंदोलनकारियों ने अंबेडकर को अपने प्रतीक के रूप में सामने रखा। जानकारों के अनुसार, आज की युवा पीढ़ी अंबेडकर के विचारों से इसलिए जुड़ाव महसूस करती है क्योंकि उन्होंने शिक्षा, संगठन और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का संदेश दिया था। उनका संदेश "शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो" आज भी युवाओं और सामाजिक आंदोलनों को प्रेरित करता है।
बाबा साहेब अंबेडकर भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माताओं में से एक थे। जब प्रदर्शनकारी उनकी तस्वीर लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि उनका विरोध संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में है। लंबे समय तक आंदोलनों के प्रतीक के रूप में महात्मा गांधी की तस्वीर प्रमुख रही है लेकिन समय के साथ अंबेडकर की तस्वीर भी विरोध और अधिकारों की लड़ाई से जुड़ गई। कई आंदोलनकारी उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जिन्होंने असमानता और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष किया।
बाबा साहेब अंबेडकर का पूरा जीवन संघर्षों से भरा रहा। बचपन से ही उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा हासिल की और आगे चलकर देश के बड़े नेताओं में शामिल हुए। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को समाज के बड़े मुद्दों से जोड़ा और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उनका मानना था कि शिक्षा और जागरूकता के जरिए समाज में बदलाव लाया जा सकता है।
अंबेडकर ने सामाजिक भेदभाव के खिलाफ कई बड़े आंदोलन किए। 1927 का महाड़ सत्याग्रह इसी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस आंदोलन के जरिए उन्होंने सार्वजनिक जल स्रोतों पर समान अधिकार की मांग उठाई। इसके अलावा मंदिर प्रवेश आंदोलन और मनुस्मृति दहन जैसे कदम भी सामाजिक समानता के लिए उनके संघर्ष का हिस्सा रहे। उन्होंने समाज में बराबरी और सम्मान के अधिकार को सबसे ज्यादा महत्व दिया।
आज के दौर में बाबा साहेब अंबेडकर सिर्फ एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की आवाज के रूप में देखे जाते हैं। युवाओं और सामाजिक समूहों के लिए उनके विचार आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। विरोध प्रदर्शनों में उनकी तस्वीर का इस्तेमाल इस बात का संकेत माना जाता है कि आंदोलनकारी अपने अधिकारों, संविधान और समानता के मुद्दों को सामने रखना चाहते हैं। यही वजह है कि समय बदलने के साथ भी अंबेडकर की तस्वीर आंदोलनों में लगातार दिखाई देती है।
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