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Muharram: इस घटना को इस्लामिक इतिहास में एक नई शुरुआत माना गया। इसी हिजरत को आधार बनाकर हिजरी कैलेंडर की शुरुआत हुई और मुहर्रम उसका पहला महीना बना। इसलिए जैसे ही मुहर्रम का चांद दिखाई देता है इस्लामिक नए साल का आगाज़ हो जाता है।

इस्लाम धर्म में मुहर्रम का महीना बेहद खास और सम्मानित माना जाता है। यह इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी) साल का पहला महीना होता है और इसी महीने से मुस्लिम समुदाय के नए साल की शुरुआत होती है लेकिन जहां नया साल आमतौर पर खुशियों और उत्सव का प्रतीक माना जाता है वहीं मुहर्रम का महीना गम, सब्र, त्याग और इंसाफ की याद दिलाता है। यही वजह है कि मुस्लिम समाज, खासकर शिया समुदाय इस पूरे महीने को शोक और इबादत के साथ बिताते हैं। मुहर्रम सिर्फ एक महीना नहीं है बल्कि यह सच और इंसाफ के लिए दी गई उस महान कुर्बानी की याद है जिसने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि अत्याचार के सामने झुकने से बेहतर है कि इंसान सच्चाई के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दे।
इस्लामिक कैलेंडर को हिजरी कैलेंडर कहा जाता है। इसकी शुरुआत पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की उस ऐतिहासिक यात्रा से जुड़ी है जिसे "हिजरत" कहा जाता है। जब मक्का में मुसलमानों पर अत्याचार बढ़ गए तब अल्लाह के हुक्म से पैगंबर मुहम्मद साहब ने मक्का से मदीना की ओर हिजरत किया। इस घटना को इस्लामिक इतिहास में एक नई शुरुआत माना गया। इसी हिजरत को आधार बनाकर हिजरी कैलेंडर की शुरुआत हुई और मुहर्रम उसका पहला महीना बना। इसलिए जैसे ही मुहर्रम का चांद दिखाई देता है इस्लामिक नए साल का आगाज़ हो जाता है।
इस्लाम में साल के बारह महीनों में से चार महीनों को विशेष रूप से पवित्र माना गया है। इनमें मुहर्रम, रजब, ज़िलक़ादा और ज़िलहिज्जा शामिल हैं। कुरान और हदीस में इन महीनों की विशेष अहमियत बताई गई है। मुहर्रम को कई इस्लामिक विद्वान "शहरुल्लाह" यानी "अल्लाह का महीना" भी कहते हैं। इस महीने में नेक कामों, इबादत, रोज़े और आत्मचिंतन को विशेष महत्व दिया जाता है।
मुहर्रम का सबसे बड़ा संबंध इराक के कर्बला शहर में हुई उस ऐतिहासिक घटना से है जिसने इस्लामिक इतिहास की दिशा बदल दी। करीब 1400 साल पहले उमय्यद शासक यज़ीद सत्ता में था। इतिहास में उसका नाम ऐसे शासक के रूप में दर्ज है जिसके शासन को लेकर उस समय कई धार्मिक और नैतिक सवाल उठे। पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने यज़ीद की बैअत यानी उसके शासन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इमाम हुसैन का मानना था कि सत्ता से बढ़कर इंसाफ, सच्चाई और इंसानी मूल्यों की रक्षा जरूरी है। उन्होंने किसी भी कीमत पर अन्याय का समर्थन नहीं किया। यही कारण था कि वे अपने परिवार और कुछ वफादार साथियों के साथ कर्बला पहुंचे जहां उन्हें घेर लिया गया।
कर्बला की घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि इमाम हुसैन और उनके परिवार पर फरात नदी का पानी भी बंद कर दिया गया। छोटे-छोटे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग कई दिनों तक प्यास की तकलीफ झेलते रहे। इतिहास बताता है कि तमाम मुश्किलों और भूख-प्यास के बावजूद इमाम हुसैन ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उन्होंने अत्याचार के सामने झुकने के बजाय सत्य के रास्ते पर डटे रहने का फैसला किया।
मुहर्रम की 10वीं तारीख को "यौमे आशूरा" कहा जाता है। इसी दिन कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन और उनके साथियों ने शहादत हासिल की थी। इस्लामिक इतिहास के अनुसार, इमाम हुसैन के साथ उनके परिवार के सदस्य और साथी भी शहीद हुए। इस घटना को सिर्फ एक युद्ध नहीं बल्कि इंसाफ, मानवता और सच्चाई के लिए दी गई महान कुर्बानी माना जाता है। यही वजह है कि दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान हर साल आशूरा के दिन इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं। शिया समुदाय मजलिसें आयोजित करता है, काले कपड़े पहनता है और कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि देता है। वहीं सुन्नी मुस्लिम भी आशूरा के दिन रोज़ा रखकर और इबादत करके इस दिन की अहमियत को याद करते हैं।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी इस्लामिक मान्यताओं पर आधारित है। चेतना मंच इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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