जानिए क्यों भारत में रविवार को साप्ताहिक छुट्टी घोषित की गई। इस आर्टिकल में नारायण मेघाजी लोखंडे के मजदूर आंदोलन, सात साल के संघर्ष और ब्रिटिश शासन के समय से जुड़ी दिलचस्प कहानी बताई गई है। साथ ही रविवार के धार्मिक महत्व और 1700 साल पुराने इतिहास के बारे में भी जानकारी मिलेगी।

रविवार का नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। यह दिन परिवार के साथ समय बिताने और काम से ब्रेक लेने के लिए होता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमेशा से रविवार ही छुट्टी का दिन नहीं था। इसका इतिहास मजदूरों की मेहनत, संघर्ष और ब्रिटिश शासन से जुड़ा हुआ है।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में खासकर मुंबई की कपड़ा मिलों में मजदूरों की स्थिति बहुत दयनीय थी। उन्हें सप्ताह के सातों दिन लगातार काम करना पड़ता था। लंबे समय तक लगातार काम करने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता था। इसी मुश्किल समय में मजदूरों के नायक बने नारायण मेघाजी लोखंडे जिन्होंने उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
लोखंडे ने 1881 से 1884 तक लगातार विरोध प्रदर्शन और आंदोलन किए। हजारों मजदूर उनके साथ आए और उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन को कई पत्र लिखे। यह लड़ाई आसान नहीं थी। सात साल की लगातार मेहनत और संघर्ष के बा, अंत में ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। 10 जून 1890 को भारत में रविवार को आधिकारिक रूप से साप्ताहिक छुट्टी घोषित कर दिया गया।
रविवार को छुट्टी के लिए चुनने के पीछे धार्मिक और व्यावहारिक कारण दोनों थे। उस समय ब्रिटिश हुकूमत ईसाई धर्म मानती थी। उनके लिए रविवार चर्च जाने का दिन था। भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के अनुसार भी रविवार सूर्य देव और कुछ क्षेत्रों में भगवान खंडोबा को समर्पित है। इस दिन मजदूरों को आराम और पूजा करने का अवसर मिला।
दिलचस्प बात यह है कि रविवार को आराम का दिन बनाने की शुरुआत भारत से नहीं हुई थी। साल 321 ईस्वी में रोमन सम्राट कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने पूरे रोमन साम्राज्य में रविवार को आराम का दिन घोषित किया था। धीरे-धीरे यह परंपरा यूरोप और ब्रिटेन के प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा बन गई जिसे वे भारत लेकर आए।