क्या यूपी में वर्चुअल कैंपेन पर भारी पड़ेगा चुनाव प्रचार का यह नया तरीका
Assembly Election 2022
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 04:48 PM
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में आगामी 10 फरवरी से 7 मार्च के बीच चुनाव होने हैं। 10 मार्च को परिणामों की घोषणा के साथ चुनावी प्रक्रिया की औपचारिक समाप्ति होगी। यानी, चुनावी प्रक्रिया को खत्म होने में अभी दो महीने से भी ज्यादा का वक्त बचा है।
चुनाव की घोषणा के साथ ही चुनाव आयोग (Election Commission) ने आगामी 15 जनवरी तक किसी भी प्रकार की रैली, जनसभा या रोड शो पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। वजह साफ है कि पिछले तीन दिन से भारत में कोरोना (Covid-19) संक्रमितों की संख्या लगातार एक लाख से ऊपर है और शनिवार को तो इसने डेढ़ लाख का भी आंकड़ा पार कर दिया।
चुनाव आयोग ने इन देशों से सीखा सबक
कोरोना (Covid-19) महामारी की शुरुआत नवंबर 2019 में चीन से हुई और तब से लेकर आज तक इसका प्रकोप लगातार बना हुआ है। इस दौरान अमेरिका से लेकर सिंगापुर, म्यांमार, श्रीलंका, चिली, जॉर्डन और पोलैंड सहित 51 देशों में चुनाव हो चुके हैं। इनमें से 22 देशों में कई तरह के प्रतिबंधों के साथ चुनाव प्रचार की अनुमति दी गई ताकि, कोरोना (Covid-19) संक्रमण की गति को अनियंत्रित होने से रोका जा सके।
इन देशों में चुनाव प्रचार के परंपरागत तरीकों पर रोक लगाई गई और वर्चुअल चुनाव प्रचार (Virtual Campaign) के दिशा-निर्देश जारी किए गए। हालांकि, यह देखने में आया कि रैलियों या जनसभाओं में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए जारी गाइडलाइन का अमेरिका सहित किसी भी देश में कड़ाई से पालन नहीं किया गया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव (American Presidential Election) के दौरान रैलियों के चलते 30,000 से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित हुए और 700 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई। शायद यही वजह है कि भारत में चुनाव आयोग ने तारीखों की घोषणा के साथ ही किसी भी प्रकार की चुनावी सभा या रैली पर अंतरिम रोक लगा दी है।
चुनाव आयोग भी कर चुका है गलती
पिछले साल दूसरी लहर के दौरान भारत में पश्चिम बंगाल विधानसभा और यूपी पंचायत चुनाव कराए गए जिसके बाद कोरोना के डेल्टा वैरिएंट (Delta Variant) का विस्फोट हुआ और स्थिति काबू से बाहर हो गई। शायद चुनाव आयोग (Election Commission) ने अपने पिछले अनुभवों से भी सीख लेते हुए यह फैसला लिया है।
बदलते हालात में चुनाव प्रचार का तरीका बदलना समय की जरूरत है। भारत जैसे देश में वर्चुअल चुनाव प्रचार (Virtual Campaign) के माध्यमों का उपयोग करना बहुत से राजनीतिक दलों और मतदाताओं के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है। हालांकि, देश को महामारी के प्रकोप से बचाने के लिए इस चुनौती का सामना करने के अलावा और कोई रास्ता फिलहाल नजर नहीं आता।
लोगों को वर्चुअल कैंपेन के बारे में है यह गलतफहमी
आमतौर पर वर्चुअल चुनाव प्रचार (Virtual Campaign) के बारे में यह गलत प्रचार किया जाता है कि यह उन मततदाताओं को ही सूट करता है जिनके पास स्मार्ट फोन और इंटरनेट की सुविधा होती है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव आयोग (Election Commission) ने केवल चुनावी सभाओं, रैलियों और रोड शो पर रोक लगाई है। इसका यह मतलब नहीं है कि चुनाव प्रचार को ही प्रतिबंधित कर दिया गया है। सोशल मीडिया (Social Media), वर्चअुल मीटिंग, टीवी, रेडियो और अखबार माध्यमों सहित डोर टू डोर कैंपेन (door to door campaign) करने के रास्ते सभी राजनीतिक दलों के लिए खुले हुए हैं। डोर टू डोर कैंपेन (door to door campaign) सुनने में नया लग सकता है लेकिन, आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) ने दिल्ली में अपने शुरुआती चुनाव प्रचार में इसका जमकर इस्तेमाल किया था।
साथ ही, हमें नहीं भूलना चाहिए कि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कोरोना (Covid-19) न होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी (BJP) और आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) ने अपने चुनाव अभियान में वर्चुअल माध्यमों का जमकर उपयोग किया था। ज्यादातर विशेषज्ञ इन चुनावों में आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया के इस्तेमाल को इन दोनों पार्टियों की सफलता की बड़ी वजह मानते हैं।
क्या ग्रामीण भारत में वर्चुअल कैंपेन संभव है
फिलहाल, भारत में लगभग 116 करोड़ से ज्यादा लोगों के पास मोबाइल फोन है। साथ ही, लगभग 80 करोड़ लोग ब्राडबैंड इंटरनेट कनेक्शन का इस्तेमाल कर रहे हैं और देश की करीब 62% आबादी इंटरनेट का उपयोग करती है। यहां देखें ट्राई (TRAI) की रिपोर्ट।
यह बात सही है कि इन माध्यमों के उपयोगकर्ता शहरी क्षेत्रों में ज्यादा हैं लेकिन, पिछले कुछ सालों में अर्ध-शहरी या ग्रामीण क्षेत्रों में इन माध्यमों की मांग और उपयोग शहरों की अपेक्षा बहुत तेजी से बढ़ी है।
किस राजनीतिक दल को होगा ज्यादा फायदा
समय के बदलाव को समझने में जिन राजनीतिक दलों ने सक्रियता दिखाई है उनके लिए यह अवसर मुफीद है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) ने चुनाव आयोग (Election Commission) की घोषणा वाले दिन, आठ जनवरी को ही फेसबुक लाइव (Facebook Live) पर मीटिंग कर वर्चुअल कैंपेन (Virtual Campaign) में पहला कदम रख दिया। यह तब हुआ जब यूपी के अन्य राजनीतिक दल रैली, जनसभा और रोड शो की तैयारी में लगे हुए थे।
भारत में चुनाव का इतिहास बैलेट पेपर से होते हुए ईवीएम (EVM) तक पहुंचा है और अब वर्चुअल वोटिंग तक की बात हो रही है। टेक्नॉलजी के बढ़ते दखल के साथ राजनीतिक प्रचार का तरीका भी तेजी से बदला है। इसका अंदाजा नेताओं के ट्वीटर (Twitter) पेज और उनके फॉलोवर की संख्या देख कर लगाया जा सकता है।
गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के ट्वीटर पेज पर 16 लाख (16.8M) से ज्यादा फॉलोवर हैं जबकि, उनके प्रतिद्वंदी अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav), प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) और मायावती (Mayawati) के फॉलोवर की संख्या क्रमश: 15.4M, 4.4M और 2.3M है।
राजनीतिक दल इस आधार पर तय करेंगे चुनावी प्रचार का तरीका
नेताओं की सोशल मीडिया (Social Media) पर उपस्थिति इस बात का सबूत है कि वह मतदाताओं को प्रभावित करने वाले हर मंच की उपयोगिता समझते हैं और उसका भली-भांती इस्तेमाल भी करते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हर राजनीतिक दल की वर्चुअल माध्यमों पर उपस्थिति का स्तर अलग-अलग है। यह अंतर ही राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार की आगामी रणनीति तय करेंगे। कोई राजनीतिक दल ट्वीटर (Twitter), फेसबुक (Facebook), वाट्सऐप (WhatsApp) जैसे प्लेटफॉर्म पर ज्यादा सक्रीय हो सकता है। कोई टीवी, रेडियो, अखबारों या डोर टू डोर चुनावी रणनीति को अपना मुख्य माध्यम बना सकता है।
देखना दिलचस्प होगा कि नए ढंग से होने जा रहे इस चुनाव में वर्चुअल कैंपेन (Virtual Campaign) या डोर टू डोर कैंपेन (door to door campaign) में से कौन सा तरीका भारी पड़ेगा। कौन सा दल अपनी रणनीति में किस माध्यम को प्राथमिकता देता है और चुनाव परिणामों पर उनका क्या असर होता है।