135 नए IPS अफसरों की पासिंग आउट परेड के बाद मार्चिंग में तालमेल को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी। जानें आलोचना, समर्थन और केंद्रीय गृह सचिव की सलाह।

हैदराबाद स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में हाल ही में आईपीएस के 78वें नियमित भर्ती बैच की पासिंग आउट परेड आयोजित की गई। इस समारोह के साथ देश को 135 नए भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी मिले। इस खास मौके पर नए अधिकारियों ने परेड में हिस्सा लिया, जबकि नेपाल, भूटान और मालदीव के 16 विदेशी अधिकारी भी कार्यक्रम का हिस्सा बने। यूपीएससी की कठिन परीक्षा पास कर आईपीएस बनने तक का सफर तय करने वाले इन युवा अधिकारियों के लिए यह दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा। हालांकि, समारोह के बाद इस परेड को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गई। देखते ही देखते नए आईपीएस अधिकारियों की पासिंग आउट परेड लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई। चलिए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस परेड को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई और लोग नए आईपीएस अधिकारियों पर सवाल उठाने लगे।
पासिंग आउट परेड के बाद सोशल मीडिया पर कुछ आईपीएस प्रशिक्षु अधिकारियों की मार्चिंग को लेकर सवाल उठने लगे। लोगों ने खास तौर पर मार्चिंग के दौरान हाथों के स्विंग और कदमों के तालमेल पर टिप्पणियां कीं। कुछ यूजर्स ने इसे अनुशासन और प्रशिक्षण से जोड़कर देखा, जबकि कई लोगों ने परेड में एकरूपता की कमी बताई।
मान अमन सिंह छीना नाम के एक यूजर ने परेड की आलोचना करते हुए कहा कि मार्चिंग का स्तर काफी खराब था। उन्होंने लेफ्ट मार्कर और उसके पीछे खड़े विदेशी अधिकारी का जिक्र करते हुए अकादमी में बेहतर ड्रिल प्रशिक्षकों की जरूरत बताई। उनके मुताबिक, परेड में सटीकता और तालमेल दिखाई देना चाहिए। वहीं, विवेक थॉमस ने मार्चिंग को अनुशासन से जोड़ते हुए टिप्पणी की। संजय कपूर ने भी कदमों के तालमेल और सिंक्रोनाइजेशन की कमी पर सवाल उठाए। कुछ अन्य यूजर्स ने नए आईपीएस अधिकारियों की मार्चिंग की तुलना सैनिक स्कूलों और राष्ट्रीय कैडेट कोर यानी एनसीसी के कैडेट्स से करते हुए तंज कसा।
रिटायर्ड रियर एडमिरल एमडी सुरेश ने भी परेड को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षु अधिकारियों को ड्रम की थाप के साथ कदम मिलाने में परेशानी दिखाई दी और उन्हें एक जूनियर कमीशंड अधिकारी यानी जेसीओ स्तर के ड्रिल प्रशिक्षक की जरूरत है। अंबुज शर्मा ने तंज कसते हुए कहा कि अधिकारियों ने यूपीएससी पास कर लिया है और अब मानो यही हर चीज का पैमाना बन गया है। वहीं, अजीत राय ने भी नए अधिकारियों के लिए बेहतर प्रशिक्षण की जरूरत बताई।
सोशल मीडिया पर आलोचना के बीच कुछ लोगों ने नए आईपीएस अधिकारियों का समर्थन भी किया। उनका कहना था कि आईपीएस अधिकारियों की जिम्मेदारियां सशस्त्र बलों से अलग होती हैं, इसलिए केवल मार्चिंग के आधार पर उनकी क्षमता या अनुशासन का आकलन करना सही नहीं है। मेजर निर्मेश दहिया ने एक्स पर कहा कि आईपीएस अधिकारियों की मुख्य भूमिका मार्च करना नहीं है। उन्होंने पुलिस सेवा और सशस्त्र बलों के कर्तव्यों में अंतर बताते हुए कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को उन चीजों के लिए दूसरों का मजाक उड़ाने से बचना चाहिए, जिनमें वे स्वयं विशेषज्ञ नहीं हैं।
अरविंद माहेश्वरी ने आईपीएस अकादमी के मानकों के हिसाब से परेड को ठीक-ठाक बताया। उन्होंने कहा कि इसकी तुलना सशस्त्र बलों की परेड से करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दोनों की प्रशिक्षण पद्धतियां और जिम्मेदारियां अलग हैं। इस तरह नए आईपीएस अधिकारियों की मार्चिंग को लेकर सोशल मीडिया पर दो तरह की राय सामने आई। कुछ लोगों ने प्रशिक्षण और तालमेल में सुधार की जरूरत बताई, तो कुछ ने अधिकारियों की भूमिका को समझने और परेड के आधार पर उनकी आलोचना करने से बचने की अपील की।
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