69000 शिक्षक भर्ती में बीएड बनाम बीटीसी विवाद फिर तेज हो गया है। नई चयन सूची, आरक्षण विवाद और सुप्रीम कोर्ट की 8, 9 और 10 सितंबर की सुनवाई से जुड़ी पूरी जानकारी पढ़ें।

उत्तर प्रदेश की चर्चित 69000 सहायक शिक्षक भर्ती एक बार फिर चर्चा में है। भर्ती से जुड़ा आरक्षण विवाद अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और अब संभावित नई चयन सूची को लेकर बीएड और बीटीसी अभ्यर्थियों के बीच नया विवाद सामने आ गया है। बीटीसी अभ्यर्थी मांग कर रहे हैं कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक पद के लिए बीएड डिग्रीधारियों को संभावित नई सूची में शामिल नहीं किया जाए। वहीं बीएड अभ्यर्थी इस मांग का विरोध कर रहे हैं और अपनी पुरानी भर्ती प्रक्रिया के आधार पर चयन का दावा कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को अब और लंबा खींचने के संकेत नहीं दिए हैं। अदालत ने कहा है कि 69000 शिक्षक भर्ती का मामला वर्ष 2020 से लंबित है और अभ्यर्थियों का भविष्य लंबे समय तक अनिश्चितता में नहीं रखा जा सकता। शीर्ष अदालत ने 8, 9 और 10 सितंबर 2026 को लगातार सुनवाई करने का फैसला किया है। ऐसे में इन तारीखों पर होने वाली सुनवाई पर हजारों अभ्यर्थियों की नजर है।
उत्तर प्रदेश में 69000 सहायक शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया 6 दिसंबर 2018 को शुरू हुई थी। प्राथमिक विद्यालयों में सहायक शिक्षकों की भर्ती के लिए लिखित परीक्षा आयोजित की गई। परीक्षा के बाद मेरिट के आधार पर चयन प्रक्रिया आगे बढ़ी और वर्ष 2020 में हजारों अभ्यर्थियों को नियुक्ति भी दी गई।
इसके बाद भर्ती में आरक्षण लागू करने के तरीके को लेकर विवाद सामने आया। कुछ अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि आरक्षण नियमों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया। उनका कहना था कि आरक्षण नियमावली 1994 के प्रावधानों का सही तरीके से पालन नहीं होने के कारण कई योग्य अभ्यर्थी चयन से बाहर रह गए।
मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा। हाईकोर्ट के आदेश के बाद चयन सूची के पुनर्मिलान और आरक्षण नियमावली 1994 के प्रावधानों के अनुसार प्रक्रिया आगे बढ़ाने की स्थिति बनी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और शीर्ष अदालत में भर्ती से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर सुनवाई शुरू हुई।
69000 शिक्षक भर्ती की संभावित नई चयन सूची में नए अभ्यर्थियों के शामिल होने की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज होने के साथ ही बीटीसी अभ्यर्थियों ने अपनी मांग सामने रखी है। उनका कहना है कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक बनने के लिए बीटीसी या डीएलएड जैसी योग्यता को महत्व दिया जाना चाहिए और बीएड डिग्रीधारियों को नई सूची में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
बीटीसी अभ्यर्थी अपनी मांग के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के 11 अगस्त 2023 के देवेश शर्मा मामले के फैसले का हवाला दे रहे हैं। उनका कहना है कि इस फैसले में प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक पद के लिए बीएड को मान्य योग्यता नहीं माना गया था। इसी आधार पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सबमिशन दाखिल कर नई सूची तैयार करते समय इस फैसले को लागू करने की मांग की है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि 69000 शिक्षक भर्ती का मौजूदा विवाद केवल बीएड और बीटीसी की योग्यता तक सीमित नहीं है। आरक्षण, पुरानी चयन प्रक्रिया, पहले से नियुक्त अभ्यर्थियों की स्थिति और संभावित नई सूची में नए अभ्यर्थियों के शामिल होने जैसे कई मुद्दे भी इस मामले से जुड़े हैं।
बीएड अभ्यर्थी बीटीसी अभ्यर्थियों की मांग का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि 69000 शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया वर्ष 2018 में शुरू हुई थी और उन्होंने उस समय लागू प्रक्रिया और नियमों के आधार पर भर्ती में हिस्सा लिया था।
बीएड अभ्यर्थियों की ओर से यह दलील दी जा रही है कि उनका चयन आरक्षण व्यवस्था में कथित गड़बड़ी के कारण प्रभावित हुआ। उनका कहना है कि यदि चयन सूची का दोबारा मिलान किया जा रहा है तो उनके मामले पर भी उसी भर्ती प्रक्रिया के संदर्भ में विचार किया जाना चाहिए।
यही वजह है कि संभावित नई चयन सूची को लेकर बीएड और बीटीसी अभ्यर्थियों के बीच विवाद बढ़ गया है। एक पक्ष प्राथमिक शिक्षक पद पर बीएड को शामिल नहीं करने की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष पुरानी भर्ती प्रक्रिया और अपने चयन के अधिकार की बात कर रहा है।
बीटीसी अभ्यर्थी 11 अगस्त 2023 के देवेश शर्मा मामले के फैसले को अपने पक्ष का महत्वपूर्ण आधार बता रहे हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक स्तर के शिक्षक पद के लिए बीएड को मान्य योग्यता नहीं माना था।
इसी वजह से बीटीसी अभ्यर्थियों की मांग है कि 69000 शिक्षक भर्ती की संभावित नई चयन सूची बनाते समय इस फैसले को ध्यान में रखा जाए। हालांकि, इस भर्ती से जुड़े सभी पक्षों के दावों और उनके कानूनी प्रभाव पर अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आदेश से ही स्पष्ट होगी।
69000 शिक्षक भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब सुनवाई के लिए 8, 9 और 10 सितंबर 2026 की तारीख तय की है। पीठ ने कहा है कि मामले को अब और नहीं टाला जा सकता और अभ्यर्थियों के भविष्य को लंबे समय तक अधर में नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस एवीएम भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि यह मामला वर्ष 2020 से लंबित है। अदालत अब निर्धारित तीन दिनों में मामले को विस्तार से सुनना चाहती है और इसके निस्तारण की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है।
अदालत ने सभी पक्षकारों से यह भी कहा है कि वे समय रहते जानकारी दें कि निर्धारित तारीखों पर कौन-कौन से अधिवक्ता अपनी दलीलें रखना चाहते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इन तीन दिनों में सुनवाई को टालने के लिए किसी तरह के बहाने स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोडल अधिवक्ता को भी बदल दिया। पहले नोडल अधिवक्ता के तौर पर मनदीप कालरा को नियुक्त किया गया था। अब उनकी जगह राज्य सरकार का पक्ष रख रहे एओआर अंकित गोयल को नोडल अधिवक्ता बनाया गया है।
अदालत ने यह भी कहा है कि मामले को अलग-अलग कैटेगरी में बांटकर सुना जाएगा। इससे अलग-अलग वर्गों और पक्षों से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
इस पूरी भर्ती में आरक्षण का मुद्दा सबसे पुराने और अहम विवादों में से एक है। अभ्यर्थियों की ओर से आरोप लगाया गया कि आरक्षण नियमों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया। उनका दावा है कि इसका असर चयन सूची पर पड़ा और कई अभ्यर्थी चयन से बाहर रह गए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद चयन सूची के पुनर्मिलान और आरक्षण नियमावली 1994 के प्रावधानों के अनुसार प्रक्रिया आगे बढ़ाने का मुद्दा सामने आया। लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद यह प्रक्रिया भी कानूनी विवाद में फंस गई।
अब संभावित नई सूची को लेकर भी यही सवाल महत्वपूर्ण है कि यदि चयन सूची में बदलाव होता है तो किन अभ्यर्थियों को इसका लाभ मिलेगा और पहले से नियुक्त शिक्षकों की स्थिति पर इसका क्या असर पड़ेगा।
69000 शिक्षक भर्ती में वर्ष 2020 में हजारों अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिल चुकी है। इनमें से कई शिक्षक तब से परिषदीय विद्यालयों में काम कर रहे हैं। इसलिए इस मामले का असर केवल उन अभ्यर्थियों पर नहीं है जो नई सूची में शामिल होने की उम्मीद कर रहे हैं, बल्कि पहले से नियुक्त शिक्षकों का भविष्य भी इससे जुड़ा हुआ है।
यदि चयन सूची में किसी तरह का बदलाव होता है तो पहले से नियुक्त शिक्षकों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई को सभी पक्ष बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
69000 शिक्षक भर्ती की संभावित नई सूची को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसमें किन अभ्यर्थियों को जगह मिलेगी। आरक्षण नियमों के आधार पर चयन सूची का पुनर्मिलान होने की स्थिति में नए अभ्यर्थियों के चयन की संभावना जताई जा रही है। दूसरी ओर पहले से चयनित और नियुक्त अभ्यर्थियों के हित भी इस मामले में जुड़े हुए हैं।
इसी के साथ बीएड बनाम बीटीसी का विवाद भी नई सूची को लेकर महत्वपूर्ण हो गया है। बीटीसी अभ्यर्थी चाहते हैं कि प्राथमिक शिक्षक पद के लिए बीएड डिग्रीधारियों को नई सूची में शामिल न किया जाए। वहीं बीएड अभ्यर्थी अपनी पुरानी भर्ती प्रक्रिया और आरक्षण से जुड़े विवाद के आधार पर अपने मामले पर विचार की मांग कर रहे हैं।
69000 शिक्षक भर्ती का मामला कई वर्षों से अदालत में चल रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने 8, 9 और 10 सितंबर 2026 को लगातार सुनवाई का फैसला किया है। अदालत के रुख से साफ है कि वह मामले को लंबे समय तक लंबित रखने के पक्ष में नहीं है।
अब यह देखना अहम होगा कि सितंबर में होने वाली सुनवाई के दौरान आरक्षण विवाद, संभावित नई चयन सूची, पहले से नियुक्त शिक्षकों की स्थिति और बीएड बनाम बीटीसी से जुड़े सवालों पर अदालत किस तरह आगे बढ़ती है। फिलहाल हजारों अभ्यर्थियों की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है और नई चयन सूची को लेकर तस्वीर अदालत की आगे की कार्यवाही के बाद ही साफ होगी।
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