PhD में एडमिशन के लिए मान्य डिग्री नौकरी में भी मान्य, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जिस डिग्री से PhD में एडमिशन मिला वही डिग्री असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में भी मान्य होगी, उम्मीदवारों को राहत।

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़ा एक बेहद अहम फैसला सुनाया है, जिससे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा से जुड़े उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिस डिग्री को किसी विश्वविद्यालय ने पीएचडी में दाखिले के लिए मान्य माना है, वही डिग्री उसी विश्वविद्यालय में नौकरी के लिए भी अमान्य नहीं ठहराई जा सकती। यह फैसला सोलन स्थित डॉ वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री से जुड़े एक मामले में आया है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला यूनिवर्सिटी में गेस्ट फैकल्टी के रूप में कार्यरत सीमा शर्मा द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। सीमा शर्मा ने वनस्पति विज्ञान यानी बॉटनी में एमएससी की डिग्री हासिल की थी। इसी डिग्री के आधार पर विश्वविद्यालय ने उन्हें फॉरेस्ट्री, मेडिसिनल एवं एरोमेटिक प्लांट विषय में पीएचडी कोर्स में दाखिला दिया था। इसके बाद वह विश्वविद्यालय के फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स विभाग में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर भी कार्यरत रहीं।
असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में क्यों हुआ विवाद
9 जून 2022 को विश्वविद्यालय ने असिस्टेंट प्रोफेसर फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स पद के लिए भर्ती निकाली। जब चयन प्रक्रिया के दौरान सीमा शर्मा की उम्मीदवारी पर विचार किया गया, तो उन्हें एमएससी बॉटनी की डिग्री के लिए कोई अंक नहीं दिए गए। विश्वविद्यालय का तर्क था कि उन्होंने फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स में मास्टर डिग्री नहीं की है, इसलिए उनकी एमएससी बॉटनी डिग्री को मान्य नहीं माना जा सकता। इसी कारण उनका नाम मेरिट लिस्ट में शामिल नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता की दलील
सीमा शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव भूषण ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जिस एमएससी बॉटनी डिग्री के आधार पर विश्वविद्यालय ने उन्हें पीएचडी में प्रवेश दिया, उसी डिग्री को अब नौकरी के लिए नकारना पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि बॉटनी को पीएचडी के लिए एलाइड विषय माना गया था और इसी वजह से याचिकाकर्ता को प्रवेश मिला था। ऐसे में साक्षात्कार समिति के पास उसी डिग्री के लिए अंक न देने का कोई वैध कारण नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने अपने आदेश में साफ शब्दों में कहा कि जब विश्वविद्यालय ने स्वयं एमएससी बॉटनी डिग्री को पीएचडी में दाखिले के लिए मान्य माना था, तो असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती के दौरान उसी डिग्री को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि गेस्ट फैकल्टी के रूप में नियुक्ति के समय भी विश्वविद्यालय ने याचिकाकर्ता की एमएससी बॉटनी डिग्री को स्वीकार किया था।
दोहरा मापदंड नहीं अपना सकता विश्वविद्यालय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की कि विश्वविद्यालय एक ही डिग्री के मामले में अलग अलग नजरिया नहीं अपना सकता। यदि किसी डिग्री को पीएचडी के लिए एलाइड विषय मानकर स्वीकार किया गया है, तो असिस्टेंट प्रोफेसर जैसे पद के चयन में उसी योग्यता को नकारा नहीं जा सकता। अदालत ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिए कि वह रिक्त असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर दोबारा विचार करे और एमएससी डिग्री के लिए उन्हें उचित अंक दे।
फैसले का असर
इस फैसले को उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालय भर्तियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन उम्मीदवारों को राहत मिलेगी, जिनकी डिग्रियों को कभी दाखिले के लिए तो कभी नौकरी के लिए अलग अलग तरीके से आंका जाता रहा है। हाईकोर्ट के इस आदेश से अब विश्वविद्यालयों को डिग्री की मान्यता को लेकर स्पष्ट और एक समान रवैया अपनाना होगा।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़ा एक बेहद अहम फैसला सुनाया है, जिससे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा से जुड़े उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिस डिग्री को किसी विश्वविद्यालय ने पीएचडी में दाखिले के लिए मान्य माना है, वही डिग्री उसी विश्वविद्यालय में नौकरी के लिए भी अमान्य नहीं ठहराई जा सकती। यह फैसला सोलन स्थित डॉ वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री से जुड़े एक मामले में आया है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला यूनिवर्सिटी में गेस्ट फैकल्टी के रूप में कार्यरत सीमा शर्मा द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। सीमा शर्मा ने वनस्पति विज्ञान यानी बॉटनी में एमएससी की डिग्री हासिल की थी। इसी डिग्री के आधार पर विश्वविद्यालय ने उन्हें फॉरेस्ट्री, मेडिसिनल एवं एरोमेटिक प्लांट विषय में पीएचडी कोर्स में दाखिला दिया था। इसके बाद वह विश्वविद्यालय के फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स विभाग में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर भी कार्यरत रहीं।
असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में क्यों हुआ विवाद
9 जून 2022 को विश्वविद्यालय ने असिस्टेंट प्रोफेसर फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स पद के लिए भर्ती निकाली। जब चयन प्रक्रिया के दौरान सीमा शर्मा की उम्मीदवारी पर विचार किया गया, तो उन्हें एमएससी बॉटनी की डिग्री के लिए कोई अंक नहीं दिए गए। विश्वविद्यालय का तर्क था कि उन्होंने फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स में मास्टर डिग्री नहीं की है, इसलिए उनकी एमएससी बॉटनी डिग्री को मान्य नहीं माना जा सकता। इसी कारण उनका नाम मेरिट लिस्ट में शामिल नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता की दलील
सीमा शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव भूषण ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जिस एमएससी बॉटनी डिग्री के आधार पर विश्वविद्यालय ने उन्हें पीएचडी में प्रवेश दिया, उसी डिग्री को अब नौकरी के लिए नकारना पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि बॉटनी को पीएचडी के लिए एलाइड विषय माना गया था और इसी वजह से याचिकाकर्ता को प्रवेश मिला था। ऐसे में साक्षात्कार समिति के पास उसी डिग्री के लिए अंक न देने का कोई वैध कारण नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने अपने आदेश में साफ शब्दों में कहा कि जब विश्वविद्यालय ने स्वयं एमएससी बॉटनी डिग्री को पीएचडी में दाखिले के लिए मान्य माना था, तो असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती के दौरान उसी डिग्री को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि गेस्ट फैकल्टी के रूप में नियुक्ति के समय भी विश्वविद्यालय ने याचिकाकर्ता की एमएससी बॉटनी डिग्री को स्वीकार किया था।
दोहरा मापदंड नहीं अपना सकता विश्वविद्यालय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की कि विश्वविद्यालय एक ही डिग्री के मामले में अलग अलग नजरिया नहीं अपना सकता। यदि किसी डिग्री को पीएचडी के लिए एलाइड विषय मानकर स्वीकार किया गया है, तो असिस्टेंट प्रोफेसर जैसे पद के चयन में उसी योग्यता को नकारा नहीं जा सकता। अदालत ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिए कि वह रिक्त असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर दोबारा विचार करे और एमएससी डिग्री के लिए उन्हें उचित अंक दे।
फैसले का असर
इस फैसले को उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालय भर्तियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन उम्मीदवारों को राहत मिलेगी, जिनकी डिग्रियों को कभी दाखिले के लिए तो कभी नौकरी के लिए अलग अलग तरीके से आंका जाता रहा है। हाईकोर्ट के इस आदेश से अब विश्वविद्यालयों को डिग्री की मान्यता को लेकर स्पष्ट और एक समान रवैया अपनाना होगा।


