लद्दाख के जंस्कार की 24 वर्षीय स्टैनजिन त्सांगयांग भारतीय सेना में अधिकारी बनने वाली पहली महिला बनीं। जानिए 14 साल हॉस्टल में रहकर पढ़ाई से आर्मी ऑफिसर बनने तक का उनका सफर।

लद्दाख के दूरदराज पहाड़ी इलाके जंस्कार की रहने वाली 24 साल की स्टैनजिन त्सांगयांग ने ऐसा मुकाम हासिल किया है, जो उनके क्षेत्र के लिए गर्व की बात है। स्टैनजिन जंस्कार से भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में कमीशन पाने वाली पहली महिला बनी हैं। चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी यानी OTA में आयोजित पासिंग आउट परेड में उन्हें 5 सितंबर को भारतीय सेना में कमीशन प्रदान किया गया। स्टैनजिन की यह उपलब्धि इसलिए खास है क्योंकि सेना में अधिकारी बनने तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। कम उम्र में घर छोड़कर पढ़ाई शुरू करने से लेकर करीब 14 साल हॉस्टल में रहने, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने और फिर NCC के जरिए भारतीय सेना में अधिकारी बनने की राह चुनने तक उन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया।
स्टैनजिन त्सांगयांग लद्दाख के जंस्कार क्षेत्र की रहने वाली हैं। उनके पिता शिक्षक हैं, जबकि उनकी मां गृहणी हैं। स्टैनजिन ने कम उम्र में ही घर छोड़ दिया था और अपनी पढ़ाई के लिए हॉस्टल में रहने लगी थीं। उन्होंने लेह के लैमडन मॉडल स्कूल से अपनी शुरुआती शिक्षा हासिल की। करीब 14 साल तक हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए असम की तेजपुर यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। यहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। पढ़ाई के साथ ही उन्होंने अपने करियर को लेकर एक ऐसा रास्ता चुना, जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय सेना तक पहुंचाया।
यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान स्टैनजिन ने नेशनल कैडेट कोर यानी NCC ज्वाइन किया। NCC में रहते हुए उन्हें भारतीय सेना में अधिकारी के तौर पर शामिल होने के अवसर के बारे में जानकारी मिली। यहीं से उनके मन में सेना में अधिकारी बनने का लक्ष्य मजबूत हुआ। इसके बाद उन्होंने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मेहनत शुरू कर दी। सेना में अधिकारी बनने के लिए उन्हें कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज यानी CDS परीक्षा और उसके बाद एसएसबी इलाहाबाद की चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। उन्होंने दोनों चरणों को पार किया और ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई में प्रशिक्षण हासिल करने की राह बनाई।
भारतीय सेना में अधिकारी बनने का सफर स्टैनजिन के लिए बिल्कुल नया और चुनौतीपूर्ण था। CDS परीक्षा पास करने के बाद उन्हें SSB इलाहाबाद की कठिन चयन प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। अपनी मेहनत और तैयारी के दम पर उन्होंने इस प्रक्रिया को भी सफलतापूर्वक पार किया। इसके बाद चेन्नई की ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में उनका प्रशिक्षण हुआ। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद 5 सितंबर को आयोजित पासिंग आउट परेड में उन्हें कमीशन प्रदान किया गया। इसके साथ ही वह जंस्कार से भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में कमीशन पाने वाली पहली महिला बन गईं।
सेना में जाने से पहले स्टैनजिन खेल के मैदान में भी अपनी पहचान बना चुकी थीं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह 2016 तक राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी रहीं। खेलों से जुड़े रहने के दौरान उनके अंदर अनुशासन, मेहनत और टीम के साथ काम करने की भावना मजबूत हुई। सेना में अधिकारी बनने के लिए भी अनुशासन और टीम भावना बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में वॉलीबॉल से जुड़े उनके अनुभव ने सैन्य प्रशिक्षण के दौरान भी उन्हें मदद की।
स्टैनजिन की इस उपलब्धि से उनके माता-पिता भी बेहद खुश हैं। पासिंग आउट परेड में शामिल होने के लिए उनके माता-पिता चेन्नई पहुंचे थे। उनके लिए यह खास मौका इसलिए भी था क्योंकि वे पहली बार चेन्नई आए थे और इसकी वजह उनकी बेटी की बड़ी उपलब्धि थी। स्टैनजिन के माता-पिता के लिए अपनी बेटी को भारतीय सेना में अधिकारी बनते देखना गर्व का पल रहा। उनकी बेटी ने न सिर्फ अपने परिवार का नाम रोशन किया, बल्कि जंस्कार क्षेत्र के लिए भी एक नई मिसाल कायम की।
स्टैनजिन त्सांगयांग की कहानी सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है। जंस्कार जैसे दूरदराज पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर भारतीय सेना में अधिकारी बनना उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि है। उनकी सफलता क्षेत्र की दूसरी लड़कियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है। कम उम्र में घर से दूर रहकर पढ़ाई करना, उच्च शिक्षा हासिल करना, NCC ज्वाइन करना और फिर CDS तथा SSB की प्रक्रिया को पार कर सेना में अधिकारी बनना उनके संघर्ष और मेहनत को दिखाता है।
चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में आयोजित पासिंग आउट परेड में स्टैनजिन के साथ कुल 342 कैडेट्स को अलग-अलग सैन्य सेवाओं में कमीशन दिया गया। इनमें 313 पुरुष और 29 महिला कैडेट्स शामिल थीं। इसके अलावा मित्र देशों के 17 कैडेट्स ने भी अपना सैन्य प्रशिक्षण पूरा किया। इनमें सेशेल्स, तंजानिया, युगांडा, जिम्बाब्वे, इस्वातिनी, भूटान और लेसोथो के कैडेट्स शामिल थे। इनमें 7 पुरुष और 10 महिला कैडेट्स थीं। स्टैनजिन त्सांगयांग के लिए यह दिन उनके लंबे संघर्ष और मेहनत का परिणाम था। लद्दाख के जंस्कार से निकलकर भारतीय सेना में अधिकारी बनने वाली पहली महिला के रूप में उन्होंने अपने क्षेत्र के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
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