यूपीएससी के 100 साल पूरे होने पर जानिए 1926 में पब्लिक सर्विस कमीशन के रूप में हुई शुरुआत से 1950 में संघ लोक सेवा आयोग बनने तक का पूरा इतिहास और इसकी महत्वपूर्ण भूमिका।

किसी छोटे से गांव का एक कमरा हो या दिल्ली के मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर के पीजी, या फिर प्रयागराज का कोई छात्रावास, रात के सन्नाटे में किताबों के बीच जागती लाखों आंखों में बस एक ही सपना पल रहा होता है। यह सपना है देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में सफल होने का सपना। सिविल सेवा परीक्षा पास करना आसान नहीं है लेकिन हर साल लाखों युवा देश की सबसे कठिन परीक्षा में सफल होने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत करते हैं। आईएएस और आईपीएस बनने की इस कठिन राह में यूपीएससी (UPSC) का नाम हर युवा के लिए उम्मीद, मेहनत और जुनून से जुड़ा है। लेकिन जिस संस्था को आज देश का हर प्रतियोगी छात्र जानता है, उसकी कहानी आज से 100 साल पहले शुरू हुई थी। 1 अक्टूबर 1926 को रखी गई इसकी नींव ने समय के साथ कई बदलाव देखे। अंग्रेजों के दौर से शुरू हुआ यह सफर आजाद भारत के संवैधानिक ढांचे तक पहुंचा और यूपीएससी देश की अहम संस्थाओं में शामिल हो गया।
संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी का इतिहास करीब एक सदी पुराना है। आज 1 अक्टूबर 2026 को इस संस्था के 100 साल पूरे हो गए हैं। यह वही आयोग है जिसके जरिए देश के लाखों युवा आईएएस, आईपीएस और केंद्र सरकार की कई महत्वपूर्ण सेवाओं में जाने का सपना देखते हैं। लेकिन यूपीएससी हमेशा से इसी नाम से नहीं जाना जाता था। इसकी शुरुआत उस समय हुई थी जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। उस दौर में भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी सीमित थी। इसी पृष्ठभूमि में भारत में एक ऐसी संस्था की जरूरत महसूस हुई जो सार्वजनिक सेवाओं में नियुक्ति से जुड़े काम को देख सके।
इस संस्था की शुरुआत 1 अक्टूबर 1926 को हुई थी। उस समय इसे पब्लिक सर्विस कमीशन यानी लोक सेवा आयोग के नाम से जाना जाता था। यह भारत में अपनी तरह की पहली ऐसी संस्था थी। इसके पहले चेयरमैन के रूप में सर रॉस बार्कर को जिम्मेदारी दी गई थी। वह यूनाइटेड किंगडम की होम सिविल सर्विस से जुड़े अनुभवी अधिकारी थे। ब्रिटिश शासन के समय शुरू हुई यह संस्था आगे चलकर स्वतंत्र भारत में एक संवैधानिक संस्था के रूप में विकसित हुई। उस समय शायद किसी ने यह कल्पना नहीं की होगी कि प्रशासनिक सेवाओं से जुड़ी यह शुरुआती व्यवस्था आने वाले दशकों में देश के लाखों युवाओं के सपनों से जुड़ जाएगी।
समय के साथ भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव होते रहे और इसी क्रम में आयोग की पहचान भी बदली। 1937 में इसका नाम बदलकर फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन कर दिया गया। नाम में हुआ यह बदलाव उस दौर की प्रशासनिक व्यवस्था में आए परिवर्तन को दर्शाता था। हालांकि, संस्था का मूल उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी भर्ती और प्रशासनिक मामलों में भूमिका निभाना ही रहा। इसके बाद भारत के इतिहास में एक ऐसा दौर आया, जिसने इस संस्था की पहचान को हमेशा के लिए बदल दिया।
26 जनवरी 1950 भारत के इतिहास का बेहद महत्वपूर्ण दिन था। इसी दिन देश का संविधान लागू हुआ और भारत गणतंत्र बना। इसी के साथ लोक सेवा आयोग की व्यवस्था को भी नए संवैधानिक ढांचे में जगह मिली। इसी दौर में फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन का नाम यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन यानी संघ लोक सेवा आयोग रखा गया। आज यही संस्था यूपीएससी के नाम से देशभर में जानी जाती है। यूपीएससी का संवैधानिक आधार भारतीय संविधान के भाग 14 में मिलता है। संविधान के अनुच्छेद 315 से 323 तक लोक सेवा आयोगों से जुड़े प्रावधान किए गए हैं। इन प्रावधानों में आयोग की भूमिका, शक्तियों और उससे जुड़े महत्वपूर्ण नियमों का उल्लेख किया गया है।
जब भी यूपीएससी का नाम सामने आता है, ज्यादातर लोगों के दिमाग में सबसे पहले सिविल सेवा परीक्षा यानी सीएसई आती है। इसकी वजह भी साफ है। देश के लाखों युवा हर साल इस परीक्षा के जरिए आईएएस, आईपीएस समेत कई महत्वपूर्ण सेवाओं में जाने की कोशिश करते हैं। लेकिन यूपीएससी की भूमिका केवल परीक्षा कराने तक सीमित नहीं है। यह केंद्र सरकार के अधीन विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर भर्ती से जुड़े कार्यों में भी अहम भूमिका निभाता है। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार आयोग सरकार को भर्ती के तरीकों से जुड़े मामलों में सलाह देता है। इसके अलावा नियुक्तियों से जुड़े नियम, अधिकारियों के प्रमोशन और अनुशासन से संबंधित मामलों में भी आयोग की भूमिका रहती है।
यूपीएससी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में उसका संवैधानिक आधार शामिल है। संविधान के भाग 14 में अनुच्छेद 315 से 323 तक लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था की गई है। इस संवैधानिक ढांचे में आयोग की भूमिका और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं को स्पष्ट किया गया है। यही वजह है कि यूपीएससी केवल एक परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था नहीं, बल्कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका निभाने वाला आयोग है।
यूपीएससी की 100 साल की कहानी केवल नाम बदलने की कहानी नहीं है। यह भारत के प्रशासनिक और संवैधानिक विकास के साथ आगे बढ़ने वाली संस्था की कहानी भी है। 1926 में पब्लिक सर्विस कमीशन के रूप में शुरू हुआ यह सफर 1937 में फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन तक पहुंचा और 1950 में भारत के गणतंत्र बनने के साथ इसे यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन यानी यूपीएससी के रूप में नई पहचान मिली। आज एक सदी बाद यूपीएससी का नाम देश के उन लाखों युवाओं की मेहनत और सपनों से जुड़ा हुआ है, जो सिविल सेवाओं में अपना भविष्य देखते हैं। 100 साल का यह सफर बताता है कि समय और व्यवस्था बदलने के साथ इस संस्था की भूमिका भी विकसित होती गई।
1 अक्टूबर 2026 का दिन यूपीएससी के इतिहास में इसलिए खास है क्योंकि इसी दिन इस संस्था की स्थापना के 100 साल पूरे हुए हैं। एक ऐसी संस्था, जिसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी, उसने स्वतंत्र भारत के संवैधानिक ढांचे के साथ अपना लंबा सफर तय किया। आज यूपीएससी सिर्फ एक परीक्षा का नाम नहीं है। यह उन युवाओं के सपनों से जुड़ा नाम है जो देश की प्रशासनिक सेवाओं में जाकर जिम्मेदारी निभाने की तैयारी करते हैं। 1926 से शुरू हुई यह कहानी 2026 में अपनी एक सदी पूरी कर चुकी है और इसके साथ जुड़ा इतिहास भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के विकास की एक महत्वपूर्ण कहानी भी है।
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