UPSC CSE Prelims 2026 के आठ सवालों पर विवाद के बीच CAT ने UPSC को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ताओं ने 16 से अधिक अंकों पर असर का दावा करते हुए उत्तर कुंजी में सुधार की मांग की है।

संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2026 के आठ सवालों को लेकर विवाद अब केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट तक पहुंच गया है। इन सवालों के जवाब और उनकी तथ्यात्मक शुद्धता को लेकर अभ्यर्थियों ने आपत्ति जताई है। मामले में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने यूपीएससी को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विवादित सवालों में कुछ के दिए गए उत्तर आधिकारिक और प्रामाणिक स्रोतों से मेल नहीं खाते, जबकि दो सवालों में दिए गए विकल्पों में से कोई भी तथ्यात्मक या कानूनी रूप से सही नहीं है।
यह मामला सचिन तिवारी और अन्य अभ्यर्थियों ने यूपीएससी तथा भारत संघ के खिलाफ दायर किया है। याचिकाकर्ता यूपीएससी सिविल सर्विसेज प्रारंभिक परीक्षा 2026 में शामिल हुए थे। उन्होंने सामान्य अध्ययन पेपर एक के सेट ए में सवाल संख्या 7, 11, 45, 60, 62, 82, 86 और 96 को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन सवालों और उनकी उत्तर कुंजी में ऐसी कमियां हैं, जिनका असर अभ्यर्थियों के प्राप्त अंकों और मुख्य परीक्षा के लिए उनके चयन पर पड़ सकता है।
याचिका में सवाल संख्या 7, 45, 60, 82, 86 और 96 के लिए यूपीएससी की ओर से बताए गए उत्तरों को आधिकारिक स्रोतों के आधार पर गलत बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इन सवालों के उत्तर प्रामाणिक और आधिकारिक सामग्री से मेल नहीं खाते हैं। दूसरी ओर, सवाल संख्या 11 और 62 को लेकर तर्क दिया गया है कि उनके चारों विकल्पों में से कोई भी तथ्यात्मक या कानूनी रूप से सही नहीं था।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि विवादित सवालों में तथ्यात्मक गलतियां थीं और कुछ सामग्री यूपीएससी की ओर से निर्धारित सिलेबस से बाहर थी। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में उत्तर कुंजी के आधार पर किया गया मूल्यांकन अभ्यर्थियों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
यूपीएससी ने 27 मई 2026 को सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा की प्रोविजनल आंसर की जारी की थी और अभ्यर्थियों से आपत्तियां मांगी थीं। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक उन्होंने निर्धारित समय के भीतर क्वेश्चन पेपर रिप्रजेंटेशन पोर्टल के जरिए विवादित सवालों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
इसके बाद 2 जून को यूपीएससी को ईमेल के जरिए विस्तृत अभ्यावेदन भी भेजा गया। इसमें सवाल-दर-सवाल आपत्तियां दर्ज की गई थीं और उनके समर्थन में आधिकारिक दस्तावेज तथा अन्य प्रमाण भी दिए गए थे। याचिका में कहा गया है कि अभ्यर्थियों ने यूपीएससी के सामने आठों सवालों से जुड़ी कमियों को विस्तार से रखा था।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्हें यह नहीं बताया गया कि उनकी आपत्तियों पर यूपीएससी ने क्या फैसला लिया। उनका दावा है कि बाद में प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम घोषित होने के बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का रुख किया।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि यूपीएससी यह बताए कि अभ्यर्थियों की आपत्तियों पर विचार किया गया था या नहीं। अगर आपत्तियों को खारिज किया गया था तो याचिकाकर्ताओं ने इसके कारण बताए जाने की भी मांग की है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार विवादित आठ सवालों का असर नेगेटिव मार्किंग को ध्यान में रखते हुए 16 से अधिक अंकों पर पड़ सकता है। उनका तर्क है कि यूपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में इतने अंकों का अंतर काफी महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि इससे उम्मीदवार के मुख्य परीक्षा के लिए क्वालिफाई करने की संभावना प्रभावित हो सकती है।
याचिकाकर्ताओं ने इसी आधार पर विवादित सवालों और उत्तर कुंजी की दोबारा समीक्षा की मांग की है। उनका कहना है कि अगर सवालों या उत्तरों में वस्तुनिष्ठ रूप से सत्यापित की जा सकने वाली गलतियां हैं, तो उन्हें ठीक किया जाना चाहिए।
याचिका में अभ्यर्थियों ने यूपीएससी को उनके द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियों पर विचार करने और जरूरत पड़ने पर प्रोविजनल आंसर की में सुधार करने का निर्देश देने की मांग की है। इसके साथ ही विवादित सवालों को मूल्यांकन से हटाने की मांग भी की गई है।
अंतरिम राहत के तौर पर याचिकाकर्ताओं ने ट्रिब्यूनल से यह निर्देश देने की मांग की थी कि यूपीएससी उनकी आपत्तियों से निपटने के तरीके की जानकारी दे। इसमें यह भी बताया जाए कि विवादित सवालों को लेकर उनकी आपत्तियां स्वीकार की गईं या खारिज, और अगर खारिज की गईं तो इसके पीछे क्या कारण थे।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी मांग को केवल आठ विवादित सवालों तक सीमित बताया है। याचिका में पूरी प्रारंभिक परीक्षा की प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने की मांग नहीं की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों के समर्थन में उत्तर कुंजी से जुड़े न्यायिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया है। उनका तर्क है कि जहां किसी प्रश्न या उत्तर में वस्तुनिष्ठ रूप से सत्यापित की जा सकने वाली गलती हो, वहां न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़ सकती है।
इस मामले में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने यूपीएससी को नोटिस जारी किया है। अब यूपीएससी की ओर से जवाब दाखिल किए जाने के बाद मामले में आगे की कार्रवाई पर निर्णय होगा। अगली सुनवाई 8 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है।
फिलहाल इस मामले में यह तय नहीं हुआ है कि विवादित आठ सवालों की उत्तर कुंजी में कोई बदलाव होगा या इन सवालों को मूल्यांकन से हटाया जाएगा। इस पर आगे की स्थिति कैट में होने वाली सुनवाई और यूपीएससी के जवाब के बाद स्पष्ट होगी।
यूपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कुछ अंकों का अंतर भी अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यही वजह है कि याचिकाकर्ताओं ने आठ सवालों को लेकर उठाई गई आपत्तियों को गंभीर बताया है। उनका कहना है कि विवादित सवालों और उत्तर कुंजी में सुधार होने पर उन अभ्यर्थियों के अंकों पर असर पड़ सकता है, जिनका मूल्यांकन इन सवालों के आधार पर हुआ है।
अब सबकी नजर 8 अक्टूबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर है। इस सुनवाई में यूपीएससी के जवाब और विवादित सवालों को लेकर आगे की न्यायिक प्रक्रिया से यह स्पष्ट हो सकता है कि इन प्रश्नों और उत्तर कुंजी को लेकर याचिकाकर्ताओं की मांग पर क्या कार्रवाई होती है।
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