फॉक्सवैगन (Volkswagen) में 1 लाख नौकरियों पर संकट के बीच कंपनी लागत घटाने और उत्पादन क्षमता कम करने की तैयारी में है। यूनियन ने हड़ताल की चेतावनी दी है।

जर्मनी की मशहूर कार कंपनी फॉक्सवैगन (Volkswagen) इन दिनों बड़े कारोबारी दबाव से गुजर रही है। कंपनी लागत कम करने और अपने कारोबार का आकार छोटा करने की तैयारी में है। इस प्रस्तावित योजना का असर करीब 1 लाख कर्मचारियों की नौकरियों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। कंपनी के सीईओ ओलिवर ब्लूम कर्मचारियों के सामने लागत घटाने और उत्पादन क्षमता में बदलाव की योजना रखने वाले हैं। इस बीच यूनियन ने कंपनी के प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और जरूरत पड़ने पर हड़ताल की चेतावनी भी दी है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक फॉक्सवैगन के सीईओ ओलिवर ब्लूम मंगलवार को कंपनी के कर्मचारियों के साथ बैठक कर लागत कम करने और कंपनी का आकार घटाने की योजना पर चर्चा करेंगे। उनकी पहली बड़ी बैठक जर्मनी के वोल्फ्सबर्ग स्थित कंपनी के मुख्य कारखाने में होगी। इसके बाद जर्मनी की दूसरी फैक्ट्रियों में भी कर्मचारियों के साथ बैठकें होने की बात सामने आई है।
फॉक्सवैगन की इस योजना के बीच करीब 1 लाख कर्मचारियों की नौकरियों को लेकर चिंता बढ़ गई है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह कहना सही नहीं होगा कि कंपनी ने सीधे तौर पर 1 लाख कर्मचारियों को नौकरी से निकालने का अंतिम फैसला कर लिया है। फिलहाल कंपनी लागत और उत्पादन क्षमता में बड़ी कटौती की योजना पर काम कर रही है, जिसका रोजगार पर बड़ा असर पड़ सकता है।
फॉक्सवैगन के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में बढ़ती लागत और कमजोर बिक्री शामिल हैं। चीन में कंपनी की बिक्री पर दबाव बढ़ा है, जबकि जर्मनी में उत्पादन लागत लगातार ज्यादा बनी हुई है। इसके अलावा कंपनी की कई फैक्ट्रियां अपनी पूरी उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पा रही हैं।
इन परिस्थितियों के कारण फॉक्सवैगन अपने कई प्रतिस्पर्धियों की तुलना में करीब 30 फीसदी ज्यादा लागत उठा रही है। कंपनी के प्रबंधन का अनुमान है कि उसे कम से कम 10 अरब यूरो की अतिरिक्त लागत में कटौती करनी होगी। यही वजह है कि कंपनी अपने उत्पादन, कर्मचारियों और प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव पर विचार कर रही है।
फॉक्सवैगन यूरोप में अपनी सालाना उत्पादन क्षमता को करीब 5 लाख वाहनों तक कम करने की योजना बना रही है। इसका मतलब है कि कंपनी अपनी मौजूदा उत्पादन व्यवस्था को छोटा करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
इसके साथ ही अधिकारियों की संख्या कम करने और कारों के मॉडल तथा उनके अलग अलग विकल्पों की संख्या घटाने पर भी विचार किया जा रहा है। कंपनी का मानना है कि इससे परिचालन लागत कम करने और कारोबार को अधिक कुशल बनाने में मदद मिल सकती है।
फॉक्सवैगन के सामने सिर्फ लागत का संकट नहीं है। इलेक्ट्रिक वाहनों, सॉफ्टवेयर और चीन की तेजी से बदलती ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री ने पूरी कारोबारी तस्वीर बदल दी है।
पारंपरिक कार कंपनियों को अब इलेक्ट्रिक वाहनों में निवेश के साथ सॉफ्टवेयर तकनीक पर भी भारी खर्च करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ चीन में स्थानीय कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ी है। ऐसे माहौल में फॉक्सवैगन के लिए पुराने कारोबारी मॉडल के साथ मुनाफा बढ़ाना चुनौती बन गया है।
ओलिवर ब्लूम कंपनी के मुनाफे का मार्जिन बढ़ाकर करीब 9 फीसदी करने का लक्ष्य रखते हैं। लेकिन इस लक्ष्य को लेकर कर्मचारियों और यूनियन नेताओं की ओर से कड़ा विरोध सामने आया है।
आईजी मेटल की प्रमुख क्रिस्टियाने बेनर ने फॉक्सवैगन के करीब 9 फीसदी मुनाफे के लक्ष्य को खारिज करते हुए इसे सपनों की दुनिया बताया है। यूनियन का कहना है कि कंपनी की मौजूदा चुनौतियों का पूरा बोझ कर्मचारियों पर डालना सही नहीं है।
एक स्थानीय यूनियन नेता ने चेतावनी दी है कि अगर ओलिवर ब्लूम ने अपनी योजना वापस नहीं ली तो मामला हड़ताल तक पहुंच सकता है। इससे फॉक्सवैगन के प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच टकराव बढ़ने की आशंका है।
कर्मचारी प्रतिनिधियों और यूनियन नेताओं का आरोप है कि फॉक्सवैगन की सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रिक कारों और चीन से जुड़ी रणनीति में हुई गलतियों का असर अब कर्मचारियों पर डाला जा रहा है। यूनियन रोजगार की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट भरोसा चाहती है।
फॉक्सवैगन की प्रमुख श्रम प्रतिनिधि डैनियला कैवालो ने भी जर्मनी के सभी प्लांट्स के कर्मचारियों को भविष्य में रोजगार की सुरक्षा का भरोसा देने की मांग की है। ऐसे में कंपनी के लिए लागत घटाने और कर्मचारियों की मांगों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती बन गया है।
फॉक्सवैगन में बदलाव लागू करना कंपनी के प्रबंधन के लिए आसान नहीं होगा। इसकी एक बड़ी वजह जर्मनी में यूनियनों का मजबूत प्रभाव है। इसके अलावा लोअर सैक्सनी राज्य की भी कंपनी में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है और कई अहम फैसलों पर उसका प्रभाव रहता है।
कैसल यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर वोल्फगैंग श्रोएडर के मुताबिक ओलिवर ब्लूम के सामने विरोध करने वाले कई समूह हैं। इनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनके पास कंपनी के फैसलों को रोकने की ताकत है। वहीं ब्लूम की योजना का समर्थन करने वाले पक्ष अपेक्षाकृत कम हैं।
इस स्थिति से साफ है कि फॉक्सवैगन के लिए लागत कम करने की योजना सिर्फ कारोबारी फैसला नहीं है। इसे लागू करने के लिए प्रबंधन को यूनियन, कर्मचारियों, शेयरधारकों और कंपनी से जुड़े दूसरे प्रभावशाली पक्षों के साथ सहमति बनाने की जरूरत होगी।
फॉक्सवैगन की प्रमुख शेयरधारक कंपनी पोर्शे एसई ने भी प्रबंधन से तेजी से कदम उठाने की मांग की है। उसका कहना है कि फॉक्सवैगन एक ऐतिहासिक चौराहे पर खड़ी है।
पोर्शे पीएच परिवार के लिए भी फॉक्सवैगन की घटती कमाई चिंता का विषय है। फॉक्सवैगन और पोर्शे एजी के कमजोर मुनाफे का असर लंबे समय से मिलने वाले लाभांश पर पड़ रहा है। यही वजह है कि परिवार कंपनी के कारोबार को जल्द पटरी पर लाने की उम्मीद कर रहा है।
ओलिवर ब्लूम को फॉक्सवैगन का नेतृत्व इसलिए दिया गया था क्योंकि उन्हें कंपनी के अलग अलग ताकतवर समूहों के बीच समझौता कराने में सक्षम व्यक्ति माना जाता है। लेकिन मौजूदा हालात में यही क्षमता उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है।
एक तरफ कंपनी का प्रबंधन लागत और उत्पादन क्षमता घटाना चाहता है। दूसरी तरफ यूनियन कर्मचारियों की नौकरियां और रोजगार सुरक्षा बचाने की मांग कर रही है। शेयरधारक मुनाफे में जल्द सुधार चाहते हैं, जबकि फॉक्सवैगन को इलेक्ट्रिक कारों, सॉफ्टवेयर और चीन की बदलती प्रतिस्पर्धा के मुताबिक खुद को ढालना है।
आने वाले दिनों में ओलिवर ब्लूम की कर्मचारियों के साथ होने वाली बैठकें बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। इन बैठकों में कंपनी की लागत घटाने और उत्पादन क्षमता कम करने की योजना को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि फॉक्सवैगन प्रबंधन अपनी लागत कम करने की योजना को यूनियन और कर्मचारियों के विरोध के बीच किस तरह लागू करता है। अगर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती है तो हड़ताल की चेतावनी के कारण श्रमिक विवाद बढ़ सकता है।
फिलहाल फॉक्सवैगन के सामने एक साथ कई चुनौतियां हैं। कंपनी को बढ़ती लागत कम करनी है, चीन में कमजोर बिक्री से निपटना है, इलेक्ट्रिक वाहनों और सॉफ्टवेयर में बदलाव के साथ आगे बढ़ना है और साथ ही अपने कर्मचारियों तथा यूनियनों के विरोध को भी संभालना है। ऐसे में ओलिवर ब्लूम की आने वाली बैठकें यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं कि फॉक्सवैगन अपने बड़े बदलाव को बिना बड़े श्रमिक संघर्ष के आगे बढ़ा पाएगी या नहीं।
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